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OPINION: राहत पैकेज की कामयाबी के लिए सामाजिक मदद की भी जरूरत पड़ेगी

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: March 26, 2020, 4:15 PM IST
OPINION: राहत पैकेज की कामयाबी के लिए सामाजिक मदद की भी जरूरत पड़ेगी
इस समय सबसे ज्‍यादा जरूरत भूखे और खुले आसमान के नीचे रह रहे लोगों का जीवन बचाने की है

भारत से एक तिहाई आबादी वाला अमेरिका (America) 2 ट्रिलियन डॉलर का राहत पैकेज दे रहा है, यह पैकेज भारत सरकार के सालाना बजट से 6 गुना बड़ा है.

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  • Last Updated: March 26, 2020, 4:15 PM IST
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कोरोना वायरस (Coronavirus)  के कारण 21 दिन तक पूरे देश में लॉकडाउन हो जाने के बाद तत्‍परता दिखाते हुए सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है. यह पैकेज दो तरह का है, पहला तो सरकार की ओर से की गई नई घोषणाएं और दूसरा सरकार की ओर से पहले से चल रही योजनाओं के पैसे की किश्‍त का तेजी से भुगतान. इसके अलावा आवश्‍यक सेवाओं में जुटे कर्मचारियों के लिए 50 लाख रुपये तक का जीवन बीमा.

वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण की प्रेस कांन्‍फ्रेंस से जो बातें प्रमुख रूप से सामने आईं उनमें राशनकार्ड धारकों को 5 किलो अतिरिक्त खाद्यान्‍न, तीन महीने तक सिलेंडर का पैसा न लगना, कर्मचारियों के ईपीएफ में कंपनी के हिस्‍से का भुगतान भी सरकार द्वारा किया जाना और महिलाओं के जनधन खाते में अतिरिक्‍त रकम डालना शामिल हैं.

देश की वर्तमान आर्थिक हालत में सरकार के पास जो रकम हो सकती थी उस लिहाज से सरकार ने काफी अच्‍छा पैकेज दिया है. लेकिन महामारी के समय में जो विपदा उत्‍पन्‍न होती है, उससे कोई भी सरकार सिर्फ पैसे देकर नहीं निपट सकती क्‍योंकि सरकार के काम करने का एक तरीका होता है. यह तरीका उतना तेज हो ही नहीं सकता जितनी तेजी से चुनौतियां सामने आती हैं.

राहत की उम्मीद




जैसे इस सारे पैकेज से अब भी उस समस्‍या का हल होते नहीं दिखता जहां से सारी बात शुरू हुई. लॉकडाउन के बाद सबसे बड़ी समस्‍या यह आई है कि बहुत से मजदूर रातों रात बेरोजगार और बेघरबार हो गए. ये लोग कंस्‍ट्रक्‍शन साइट या ऐसे ही स्‍थलों पर ठेकेदार के नीचे काम करते थे. लॉकडाउन के बाद काम ठप हो गया, ठेकेदार गायब हो गए, जरूरी सामान का मिलना बंद हो गया, घर जाने के लिए गाड़ियां भी बंद हो गईं और नतीजा यह हुआ कि लाचार लोग पैदल ही घर जाने लगे. इनके पास खाने पीने को भी सामान नहीं है. इनकी तस्‍वीरें भारत विभाजन के समय की तस्‍वीरों जैसी दिखाई दे रही हैं.

जाहिर है इस तरह सड़क पर आ गए लोगों के पास न तो बैंक खाते हैं, न उनके रुपे कार्ड चालू हालत में हैं, न उनके पास राशन कार्ड हैं जहां से वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें. सरकारी तंत्र के पास भी ऐसा कोई सिस्‍टम नहीं है जिससे वह पैकेज का लाभ इन लोगों तक पहुंचा सके.

लेकिन एक चीज सरकार और समाज दोनों के पास है क्‍योंकि अंतत: दोनों में इंसान ही वास करते हैं. इसलिए जरूरत इस बात की है कि इस तरह सड़क पर आए लोगों की मदद के लिए सामाजिक संगठन सामने आएं. नवरात्रि के इस पवित्र समय में समाज की ओर से तत्‍काल चंदा जुटाकर खाने पीने का सामान और अस्‍थायी शिविर बनाने का इंतजाम किया जाए. समाज जब यह इंतजाम कर रहा हो तो जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन हर संभव मदद दे. इस मदद के दौरान जान बूझकर लाल फीताशाही के अड़ंगे न डाले जाएं. लॉकडाउन को कानूनी बाध्‍यता की जगह उसके मूल उद्देश्‍य के हिसाब से अगर प्रशासन लेगा तो लोगों में भय कम और सुरक्षा ज्‍यादा फैलेगी.

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सरकार से उम्मीदें


यह बात इसलिए भी जरूरी है कि हम अमेरिका या यूरोप की तरह अमीर देश नहीं हैं. भारत से एक तिहाई आबादी वाला अमेरिका 2 ट्रिलियन डॉलर का राहत पैकेज दे रहा है, यह पैकेज भारत सरकार के सालाना बजट से 6 गुना बड़ा है. दूसरी बात यह कि अमेरिका हमारी तरह ग्रामीण और कस्‍बाई समाज नहीं है. वहां खाते में गया पैसा जल्‍द से जल्‍द वस्‍तुओं में बदल सकता है, जबकि हमारे यहां तालाबंदी में यह प्रक्रिया बहुत जटिल हो जाती है. हमें इस बात को स्‍वीकार करना चाहिए कि जब अमेरिका अपने एक नागरिक पर 120 रुपये खर्च करेगा, तब हमारी सरकार की माली हालत एक रुपये खर्च करने की होगी.

वैसे भी इस समय सबसे ज्‍यादा जरूरत भूखे और खुले आसमान के नीचे रह रहे लोगों का जीवन बचाने की है. उनमें छोटे-छोटे बच्‍चे भी शामिल हैं. सरकार और समाज की पहली और आखिरी जिम्‍मेदारी यही है कि कोरोना से बचाने के चक्‍कर में लोग कहीं भूख या गफलत से न मर जाएं. यह राहत पैकेज इसी दिशा में एक शुरुआत है, लेकिन इसकी कामयाबी जनता के संपन्‍न और समाजसेवी तबके के हाथ में है.

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(लेखक न्यूज़ 18 के एसोसिएट एडिटर हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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First published: March 26, 2020, 3:28 PM IST
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