Opinion: जब मुसीबत के समय मोदी होते हैं संकटमोचक, दुख की घड़ी में देते हैं साथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुसीबत के समय लाखों लोगों के लिए निजी तौर पर भी मददगार साबित हुए हैं. (फाइल)

पीएम नरेंद्र मोदी की छवि उनके सियासी दुश्मनों और पेशेवर आलोचकों ने उस नेता की बना रखी है, जिसके दिल में किसी के लिए हमदर्दी नहीं हो सकती है. लेकिन मोदी की असल तस्वीर आलोचकों की तरफ से गढ़ी गई उस छवि से काफी अलग है, जो मोदी के आंसू में भी राजनीतिक दांव देखते हैं. मोदी मुसीबत के समय लाखों लोगों के लिए नीतिगत-आधिकारिक तौर पर ही नहीं, निजी तौर पर भी मददगार साबित हुए हैं. दुख की घड़ी में हौसला बढ़ाने वाले रहे हैं. ऐसे किस्से हजारों हैं, लेकिन शायद ही वो कभी सामने आ पाते हैं. मोदी खुद अपने व्यक्तित्व के इस पहलू का प्रचार भी नहीं करना चाहते और उनके स्नेह और सहारे का गवाह बने लोग इसे जाहिर करने से परहेज करते है कि पता नहीं दुनिया इसे किस तरह से ले या फिर मोदी को ही बुरा न लग जाए.

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हाल ही में टीवी एंकर और पत्रकार रुबिका लियाक़त के एक ट्वीट पर नजर पड़ी. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पत्र को उद्धृत करते हुए ट्वीट किया था और आभार जताया था दुख की घड़ी में उनका साथ देने के लिए, हौसला बढ़ाने के लिए. दरअसल रुबिका की मां डॉक्टर फ़ातमा लियाक़त का इसी 28 मई को देहांत हो गया और पीएम मोदी ने इस सिलसिले में जो शोक संदेश भेजा था, वो महज खानापूर्ति नहीं, संवेदनशीलता से भरा हुआ था, दिवंगत फ़ातमा लियाक़त के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए था. रुबिका और मेरी जान-पहचान बहुत पुरानी नहीं रही है. चार साल पहले हम लोग एक ही मीडिया संस्थान के अलग-अलग चैनलों के लिए काम कर रहे थे, आते-जाते लिफ्ट में मुलाकात हो जाया करती थी. सोचा कि रुबिका को फोन कर लूं, किसी के लिए भी अपनी मां को खोना एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती.

पत्रकार रुबिका की मां की तबीयत खराब हुई, मदद के लिए आगे आए पीएम मोदी
रुबिका को फोन किया तो पीएम मोदी के पत्र के पीछे की कहानी समझ में आई. पिछले महीने की दो तारीख को रुबिका की मां फ़ातमा लियाक़त अचानक बीमार हो गई थीं. रुबिका को मां की बीमारी के बारे में पता चला तो वो नोएडा से भागकर उदयपुर पहुंचीं, जहां उनका परिवार रहता है. मां फ़ातमा लियाक़त जीव विज्ञान में पीएचडी करने के बाद पानी में रहने वाले जीव-जंतुओं पर हानिकारक धातुओं के असर पर लंबे समय से शोध करती रही थीं. मां की बीमारी के शुरुआती दिनों में रुबिका को ऐसा लगा मानो रमजान के उपवास के कारण गैस्ट्रोइंटेटाइटिस हो गई है, जिसमें सामान्य तौर पर लोग उल्टियां कर देते हैं. लेकिन तबीयत तेजी से खराब होती चली गई, किडनी, लीवर और हृदय पर भी गंभीर असर दिखने लगा, हालात मल्टी ऑर्गन फेल्योर जैसे बनने लगे. कोरोना के दौर में ऐसा लगा मानो ये सब कहीं कोरोना की वजह से तो नहीं हो रहा है. अस्पताल में दाखिल कराने की नौबत आई, जहां बाद में ये पता चला कि रुबिका की मां को पैंक्रेटाइटिस हो गया है यानी पैंक्रियाज को गंभीर नुकसान हो जाने वाली बीमारी.

ये बीमारी काफी खतरनाक होती है, रुबिका और उनकी छोटी बहन अंजुम को भी इसका अहसास हो चला था, अहसास तो मां फ़ातमा को भी था, खुद विज्ञान की स्कॉलर रही थीं वो. ऐसे ही माहौल के बीच ईद का त्योहार आ गया. जाहिर है ईद क्या मनती, पिता लियाक़त अमर को दोनों बहनों ने घर पर रहने के लिए कहा हुआ था, खुद उदयपुर के पारस जेके अस्पताल के आईसीयू में अपनी मां के बिस्तर के पास खड़ी थीं दोनों. शुक्रवार, 14 मई 2021 को ईद के उस दिन, जब खुशियों की बजाय मां की बीमारी की वजह से दोनों बहनों के चेहरों पर मनहूसियत छाई हुई थी, रुबिका के फोन की घंटी बजी. कोई नंबर नहीं, स्क्रीन पर लिखा हुआ था नो कॉलर आईडी. समझ में नहीं आया कि फोन उठाएं या नहीं, फिर उठाया तो सामने से कहा गया प्रधानमंत्री जी बात करना चाहते हैं.

रुबिका लियाकत को पीएम मोदी का पत्र


रुबिका ने कल्पना नहीं की थी कि पीएम मोदी करेंगे सीधे फोन
रुबिका सन्न रह गईं. ईद के उस दिन, कोरोना के खौफनाक माहौल और मां की बीमारी के बीच जब किसी नाते-रिश्तेदार का भी फोन नहीं आया था, तब देश के प्रधानमंत्री का फोन आना. कुछ समझतीं, उससे पहले आवाज आई- रुबिका जी, आपको ईद की ढेर सारी शुभकामनाएं. रुबिका ने मां की बीमारी की बात बताई, तो पीएम नरेंद्र मोदी ने उनके बारे में विस्तार से पूछताछ की और पूरा केस जानने के बाद आईसीयू की बेड पर पड़ी फ़ातमा लियाक़त से बात करने की इच्छा जताई. रुबिका ने अपनी मां को फोन दिया, मां खुद बोल पाने की हालत में नहीं थीं, उपर से पीएम मोदी के लाइन पर होने के बारे में सुना तो आंखें फटी की फटी रह गईं. दूसरी तरफ से पीएम मोदी कह रहे थे कि मुझे पूरा यकीन है कि आप पूरी हिम्मत से लड़ेंगी और इस बीमारी को मात देंगी.

फ़ातमा लियाक़त कुछ बोल तो नहीं पाईं, लेकिन हाथ उठाकर बेटी की तरफ ये इशारा जरूर किया कि वो पूरी हिम्मत से ये लड़ाई लड़ेंगी. पीएम मोदी के फोन का ये सिलसिला ईद के उस दिन करीब पांच-सात मिनट तक चला. पीएम ने फोन रखने के पहले रुबिका को आश्वस्त किया कि किसी किस्म की चिंता न करें, हर संभव मदद की जाएगी.

रुबिका की मां के बेहतरीन इलाज की व्यवस्था करवाई मोदी ने
उस दिन के बाद पीएम मोदी का फोन तो नहीं आया, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से रोजाना रुबिका के पास फोन आते रहे, मां के स्वास्थ्य की जानकारी ली जाती रही. यही नहीं, बीमारी से लड़ाई के लिए जितना भी श्रेष्ठ परामर्श और दवाईयां संभव हो सकती थीं, सब कुछ मुहैया कराया गया. यहां तक कि एम्स दिल्ली के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया और इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर एंड बिलियरी साइंसेज के डायरेक्टर डॉक्टर एस के सरीन भी उदयपुर के अस्पताल में भर्ती फ़ातमा लियाक़त की चिकित्सा करने वाले डॉक्टरों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे. उदयपुर के डॉक्टरों के आश्चर्य की सीमा नहीं थी कि आखिर ये हो क्या रहा है, एक तरफ इतने नामी-गिरामी डॉक्टर मार्गदर्शन कर रहे थे तो दूसरी तरफ ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया का कार्यालय किसी भी जरूरी दवा की सप्लाई करने के लिए तैयार बैठा था. जितना भी बेहतर इलाज संभव था, उसके सहारे फ़ातमा लियाक़त ने 26 दिन तक अपनी बीमारी के साथ संघर्ष किया. लेकिन होनी को टालना किसी के लिए भी संभव नहीं. आखिरकार 28 मई को उन्होंने दम तोड़ दिया, जब उन्हें एयर एंबुलेंस के जरिये उदयपुर से दिल्ली लाने की तैयारी की जा रही थी. फ़ातमा लियाक़त की मौत स्वाभाविक तौर पर पूरे परिवार के लिए गहरे सदमे और दुख का कारण रही. लेकिन रुबिका ही नहीं, उनके पिता को भी इस बात से काफी संतोष मिला कि दुख की इस घड़ी में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके साथ खड़े रहे. हर तरीके से मदद की, लगातार हिम्मत बंधाते रहे.

रुबिका लियाकत ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर दिया धन्यवाद


मुस्लिमों के बीच मोदी की स्थापित छवि से उलट रहा रुबिका का अनुभव
रुबिका और उनके पिता या फिर छोटी बहन के लिए पीएम मोदी का ये रूप सर्वथा नया था. खुद रुबिका का भी परिचय मोदी से कोई ज्यादा पुराना नहीं था. पहली बार 20 फरवरी 2019 को ही पीएम मोदी से रुबिका का आमने-सामने मिलना हुआ था, जब सउदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सुलेमान के सम्मान में आयोजित लंच पर रुबिका को आमंत्रित किया गया था. रुबिका और उनके परिवार को समझ में नहीं आया कि जिस नरेंद्र मोदी की छवि उनके अपने मुस्लिम समाज में पिछले दो दशक से खलनायक की बनाई गई है, जहां ये बात की जाती है कि मुसलमानों को मोदी से डर लगता है, वैसी छवि के उलट मुसीबत की घड़ी में, जब परिवार के लिए सबसे मुश्किल दौर था, पीएम मोदी उनके साथ चट्टान की तरह खड़े रहे, हर तकलीफ को दूर करने की कोशिश की. जिस मोदी के नाम को सामने कर मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी करने वाले नेता देश के करोड़ों मुस्लिमों को डराते हैं, उस मोदी ने फ़ातमा लियाक़त की बीमारी से डरे परिवार को हिम्मत देने की हर कोशिश की.

रुबिका की मां का इंतकाल होने पर मोदी ने लिखा खत
रुबिका और उनके परिवार के लिए मोदी का ये वो रूप था, जिसे कभी उन्होंने देखा नहीं था और न ही किसी से सुना था. इसी बीच फ़ातमा लियाकत की मौत की खबर मिलने के बाद पीएम मोदी ने शोक संदेश भेजा, जिसमें न सिर्फ रुबिका की मां के बारे में विस्तार से लिखा था, बल्कि परिवार को ढांढस भी बंधाया गया था. पीएम मोदी का ये पत्र पाते ही रुबिका के पिता भावनाओं के आवेग में बह गये, उन्होंने बेटियों को कहा कि दुख के इस दौर में पहले फोन और फिर पत्र का आना, लियाक़त परिवार कभी भूल नहीं पाएगा. भला परिवार का कोई सदस्य सोच भी कैसे सकता था कि पिछले सात साल से देश की बागडोर संभालने वाले पीएम मोदी अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच उदयपुर के इस साधारण परिवार के दुख की घड़ी में इस तरह से संबल बनकर उभरेंगे. भावनाओं के इसी ज्वार में रुबिका ने पीएम मोदी को धन्यवाद देते हुए पत्र लिखा – मेरी मां घर की प्रधान थीं, जब देश के प्रधान ने उनका हाल लिया तो वो पल पूरे परिवार के लिए बड़ा आत्मीय था. -- इतने व्यस्त समय में आपने मेरी मां के लिए वक्त निकाला, ये कोई घर का बड़ा ही कर सकता है.

बिना हल्ला मचाए लोगों की मदद करना है मोदी का पुराना स्वभाव
ऐसा नहीं है कि मुसीबत की घड़ी में देश के प्रधानमंत्री के साथ ही घर के बड़े की तरह व्यवहार करने का मोदी का ये कोई अकेला किस्सा है. ऐसे सैकड़ों किस्से हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इसलिए सामने नहीं आते, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर पीएम मोदी के मानवीय और करुणामय स्वरूप को बताने वाले किस्से उन्होंने सार्वजनिक किए, तो ऐसा लगेगा मानों वो लोग पीएम मोदी से अपनी निकटता को साबित करने में लगे हैं. खुद पीएम मोदी ने भी कभी इसका सार्वजनिक तौर पर जिक्र नहीं किया. लोगों की मदद करते रहे, बिना किसी को बताए. लेकिन जिसकी भी मदद की, उसके लिए ये जीवन का अमिट हिस्सा बन गया.

ऐसा ही एक ताजा अनुभव वरिष्ठ पत्रकार और फिलहाल देश के सूचना आयुक्त के तौर पर काम कर रहे उदय माहूरकर को हुआ. माहूरकर का मोदी से रिश्ता पुराना है, करीब साढ़े तीन दशक से एक-दूसरे को जानते हैं. हुआ यूं कि अप्रैल के महीने में उनकी पत्नी स्मिता माहूरकर को कोरोना हो गया. महीने की शुरुआत में ही कोरोना ने स्मिता को अपनी जकड़ में ले लिया था, उसी समय देश में कोरोना की दूसरी लहर बलवती हुई थी. ऑक्सीजन लेवल अचानक तेजी से गिरना शुरू हो गया, सामान्य तौर पर शरीर में 95 से ऊपर रहने वाला एसपीओ2 का लेवल 55 तक आ गिरा. ऑक्सीजन के इस कम स्तर में अक्सर लोग कोमा में चले जाते हैं, जीवन जाने की आशंका बनी रहती है. उदय माहूरकर को भी अनिष्ट की आशंका सताने लगी. कुछ समझ में नहीं आया, दिल्ली में अस्पतालों की हालत वैसे भी गंभीर थी, कहां जाएं, क्या करें. बदहवासी की हालत में पीएम मोदी के निजी सहायक को सूचना दी, पत्नी की खराब हालत के बारे में ब्रीफ किया. जाहिर है, पीएम मोदी को इसकी सूचना तत्काल दी गई.

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मुस्लिमों के बीच स्थापित छवि से उलट है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्‍वभाव. (फाइल फोटो)


वरिष्ठ पत्रकार उदय माहूरकर की पत्नी की जान बचाई मोदी ने
अगले पांच मिनट में इसका असर क्या हुआ, उसका अंदाजा उदय माहूरकर को तब लगा, जब स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के अलावा खुद राम मनोहर लोहिया अस्पताल के अधीक्षक एके सिंह राणा का भी फोन आया. सात अप्रैल को स्मिता माहूरकर को अस्पताल में भर्ती कराया गया, 19 दिन के उपचार के बाद 26 अप्रैल को वो अस्पताल से स्वस्थ होकर घर आईं, उनके लिए ये नया जीवन ही था. इस दौरान खुद पीएम मोदी ने फोन करके दो-तीन बार हाल जाना, उनके कार्यालय के अधिकारी लगातार सूचना लेकर पीएम को पहुंचाते रहे. माहूरकर भला ये भी कैसे भूल सकते हैं कि पिछले साल जब उनके पिता का देहांत हुआ, तो महज कुछ घंटों के अंदर पीएम मोदी ने सीधा उन्हें फोन कर सांत्वना दी थी और फिर बाद में शोक संदेश भी भेजा था, जिसमें उनके पिता जेजी माहूरकर के व्यक्तित्व की खासियतों का जिक्र था. माहूरकर इस अनुभव को कभी भूल नहीं सकते. माहूरकर मोदी के प्रशासनिक कामकाज पर दो किताब लिख चुके हैं, दूसरों की मदद करने के मोदी के कई किस्से उनके पास हैं, यहां तक कि मोतियाबिंद का शिकार हुए हजारों पशुओं का इलाज कराने का भी.

कोरोना काल में सैकड़ों लोगों को फोन कर हालचाल जानते रहे मोदी
कोरोना के करीब सवा साल लंबे कालखंड में देश के हजारों लोगों को मोदी के व्यक्तित्व के इस खास हिस्से का अनुभव हुआ है. खास तौर पर वैसे लोगों को, जो मोदी को किसी भी किस्म का फायदा नहीं पहुंचा सकते, जिनको फोन करना मोदी के लिए सियासी तौर पर कतई जरूरी नहीं है. लेकिन दशकों पुराने मानवीय संबंधों की उष्मा कैसी होती है, इसका अहसास मोदी ने इस बार लोगों को लगातार कराया. कभी जमशेदपुर में जनसंघ के जमाने के किसी पुराने कार्यकर्ता को फोन किया, जो जीवन के आखिरी पड़ाव में हैं, तो कभी संघ जीवन के सहयोगी रहे उन प्रचारकों को फोन किया, जो कोरोना ग्रस्त हुए. अकेले गुजरात में ही ऐसे संघ अधिकारियों और प्रचारकों में शुमार होने वाले कई नाम हैं, मसलन प्रवीणभाई ओतिया, मुकुंदराव देवभानकर, भगीरथभाई देसाई और हरीशभाई रावल, जिनको फोन कर लगातार हालचाल जानते रहे मोदी. लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ विचारों में साम्यता रखने वाले लोगों को ही मुसीबत के समय हिम्मत देते हैं पीएम मोदी. ऐसे लोगों की भी तादाद बड़ी है, जिनसे वैचारिक तौर पर कोई साम्यता नहीं है, लेकिन अगर मोदी को उस व्यक्ति के मुसीबत में होने का पता चला, तो सीधे फोन कर लिया और हर तरह की मदद करने का आश्वासन देने के साथ ही सांत्वना भी दी.

अपने आलोचकों की सेहत का भी ध्यान रखते हैं मोदी, देते हैं हौसला
ऐसा ही अनुभव पिछले साल दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार को हुआ. सत्ता विरोधी रुख के लिए मशहूर एक अंग्रेजी अखबार के स्थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे ये पत्रकार एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. किसी साथी के जरिये उनके बीमार होने की खबर पीएम मोदी तक पहुंची. अचानक एक सुबह इस पत्रकार के फोन पर नो कॉलर आईडी वाले कॉल आने लगे. बीमारी से परेशान पत्रकार ने फोन नहीं उठाया. अस्पताल में घुसते आखिरकार उन्होंने फोन उठा लिया, सामने से आवाज आई प्रधानमंत्री जी बात करना चाहते हैं. इस पत्रकार के लिए भी ये पहला ही अनुभव था इस तरह का. पीएम मोदी से 2014 के बाद ही कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में मिलना हुआ था, लेकिन पीएम ने पहले कभी फोन किया हो ऐसा नहीं था. वैसे भी विचारों के स्तर पर भी दोनों में कोई साम्यता नहीं थी, अमूमन मोदी की आलोचना करते हुए बड़ी-बड़ी रिपोर्ट्स खुद इस पत्रकार ने ही लिखी थीं. भौंचक पत्रकार को समझ में नहीं आया कि ये हो क्या रहा है. दूसरी तरफ पीएम मोदी ने उनका प्रेम से हालचाल पूछा, शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की, हिम्मत बंधाई और किसी भी किस्म की सहायता की जरूरत होने पर मदद का आश्वासन दिया.

टफ मोदी की संवेदनशीलता चौंकाती है लोगों को
पीएम ने एक दो दफा और फोन किया इस पत्रकार को. मोदी की राजनीति की कई बार आलोचना कर चुके इस पत्रकार के लिए आज भी इस गुत्थी को सुलझा पाना संभव नहीं है कि पीएम के तौर पर अपनी इतनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद मोदी ने उनसे बातचीत करने के लिए कैसे समय निकाला. आम तौर पर होता नहीं है कि भारत का प्रधानमंत्री किसी पत्रकार को फोन करे, वो भी बिना किसी स्वार्थ के. इस पत्रकार के जीवन में किसी भी पीएम की तरफ से ये पहला ही फोन था. जाहिर है, पीएम मोदी के फोन से इस पत्रकार का अपनी बीमार से लड़ने का हौसला बढ़ा, काफी अच्छा लगा. लेकिन आश्चर्य आज भी है कि पीएम मोदी दुख की घड़ी में शामिल होने के लिए इतनी तेजी से आ कैसे जाते हैं, वो भी जबकि छवि ये है कि पत्रकारों को वो मुंह लगाते नहीं. इस पत्रकार को ये भी पता है कि मोदी आज देश ही नहीं, दुनिया की सियासत में वो मुकाम हासिल कर चुके हैं, जहां उनके जैसे पत्रकार को पटाने की उन्हें कोई जरूरत भी नहीं, उस स्थिति से काफी उपर उठ चुके हैं मोदी.

गरीब बच्चों की सेहत की चिंता भी करते हैं मोदी
देश में जिम्मेदारी के एक महत्वपूर्ण पद पर काम करने वाले एक और वरिष्ठ पत्रकार के भी ऐसे कई किस्से हैं, निजी अनुभव से जुड़े. पद की मर्यादा के कारण नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते, लेकिन बताते हैं कि जब अपनी पत्नी की गंभीर बीमारी के कारण परेशान थे वो, तब मोदी ने सामने से पहल कर उन्हें बेंगुलुरु के स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान में इलाज के लिए जाने की सलाह दी थी, जो संस्थान अपने संक्षिप्त नाम व्यासा के तौर पर देश-दुनिया में योग और नेचुरोपैथी से जुड़े उपचार और ट्रेनिंग के लिए मशहूर है. संघ के वरिष्ठ प्रचारक और विवेकानंद केंद्र के संस्थापक स्वर्गीय एकनाथ रानाडे की प्रेरणा से स्थापित इस योग केंद्र में जब ये पत्रकार पहुंचे, तो मोदी की सूचना के मुताबिक सारे इंतजाम पहले से किये जा चुके थे. पत्रकार के आश्चर्य की सीमा नहीं रही, जब उन्होंने पाया कि उनके जैसे कितने ही लोगों को मोदी यहां भिजवाकर इलाज की व्यवस्था करवा रहे हैं, जिसमें गुजरात से आया एक बच्चा भी था, जिसका परिवार गरीब था, लेकिन जिसका पूरा खर्चा मोदी ने उठा रखा था. इस बच्चे का इलाज कराकर मोदी को कोई सियासी फायदा नहीं होने वाला था, बल्कि ये उनके करुणामय व्यक्तित्व की झलक दिखाने वाला था, जबकि मोदी के ज्यादातर आलोचकों को मोदी हमेशा वैसे कठोर राजनीतिज्ञ ही लगते हैं, जिनके दिल में दया, करुणा जैसे भाव हैं ही नहीं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक वक्त जब खांसी से जूझ रहे थे, तब पीएम मोदी ने इससे निजात पाने का उपाय बताया था. (फाइल)


जब मीडिया जगत की एक बड़ी हस्ती मोदी के फोन से चौंक उठी
मोदी अपने व्यक्तित्व के नर्म और मखमली पहलू से अक्सर लोगों को चौंकाते हैं. चौंकने की बारी तो मीडिया जगत की उस बड़ी हस्ती की भी थी, जिन्होंने बतौर पत्रकार-संपादक अपने कार्यकाल में लगातार मोदी के खिलाफ हमलावर रुख रखा, जेएनयू में पढ़ाई के कारण साम्यवादी सोच से उनकी चिंतन धारा प्रभावित होती रही, लेकिन जब दुनिया के एक बड़े इंटरटेनमेंट समूह की वो एशिया में अगुआई कर रहे थे, तो पीएम मोदी ने उनकी हर मुसीबत को हल करने की कोशिश की. उन्हें भी बड़ा झ़टका तब लगा, जब अगस्त 2019 में उनके पिता का देहांत हुआ और जिन शुरुआती लोगों ने उन्हें फोन कर सांत्वना दी, उनमें से एक प्रधानमंत्री मोदी थे. मीडिया जगत के उस महारथी ने भी उस दिन मोदी के फोन की कल्पना नहीं की थी, बल्कि जब नो कॉलर आईडी वाली कॉल आ रही थी कि तो उन्हें लग रहा था कि उनके एक शागिर्द पत्रकार का फोन आ रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि मोदी के व्यक्तित्व के ये अनछुए पहलू प्रधानमंत्री बनने के बाद सामने आए हैं. पहले जब वो बीजेपी के पदाधिकारी थे, या फिर जब गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना पौने तेरह साल लंबा कार्यकाल पूरा किया, उस दौरान भी उन्होंने हजारों लोगों की मदद की, बिना शोर मचाए, मुसीबत की घड़ी में साथ खड़े हो गये, गार्जियन की तरह, तारणहार बने.

गुजरात के एक पत्रकार की जान बचाने के लिए भेजा सरकारी विमान
अहमदाबाद के एक पत्रकार निर्णय कपूर भला कैसे ये भूल सकते हैं कि उनकी जान अगर 2004 में बची तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका नरेंद्र मोदी ने निभाई थी, जो उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 20 जनवरी 2004 का वो दिन था, निर्णय कच्छ के जिला मुख्यालय भुज में अपने कैमरामैन उमेश चौहाण के साथ रिपोर्टिंग करने पहुंचे थे. 26 जनवरी 2001 को कच्छ में आए भयावह भूकंप के तीन साल पूरे होने के मौके पर वहां के हालात का जायजा लेने पहुचे थे निर्णय. टीवी के लिए वो अपनी विशेष रिपोर्ट बना पाते, उसके पहले ही छाती में दर्द होना शुरु हो गया. निर्णय को कुछ गड़बड़ लगी, दर्द बढ़ता जा रहा था. अहमदाबाद में अपने नियमित चिकित्सक को फोन किया, उस डॉक्टर ने विवरण जानकर भुज के ही एक डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी. निर्णय जब तक वहां पहुंचते, हालत खराब हो चली थी. बेहोशी छाने लगी थी, दर्द बढ़ने लगा था. भुज में उनकी चिकित्सा करने वाले डॉक्टर को अंदाजा लग गया कि हार्ट अटैक हुआ है, खून को पतला करने वाली दवा देनी शुरु की. भुज में आगे का अच्छा उपचार संभव नहीं था. उसी दौरान निर्णय के संस्थान से फोन आया. साथ में मौजूद कैमरामैन उमेश ने हालात को बयान किया. दिल्ली के एसाइनमेंट डेस्क से सूचना संस्थान के अगुआ और वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा को दी गई. रजत शर्मा की मोदी से जान-पहचान काफी पुरानी थी. रजत शर्मा का फोन आया, निर्णय की खराब हालत के बारे में जानकारी देते हुए मोदी से मदद की मांग की. मोदी ने बिना ने बिना देरी किये तत्काल मदद पहुंचाने का वादा किया.

रजत शर्मा का फोन रखते ही अपने मातहत अधिकारियों को मोदी ने निर्देश दिया, अहमदाबाद के स्टर्लिंग अस्पताल से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम को जरूरी लाइफ सपोर्ट उपकरणों के साथ एयरपोर्ट भेजने के लिए कहा, साथ में राज्य सरकार के विमान के लिए भी भुज के लिए उड़ान भरने को तैयार रहने का आदेश जारी किया. डॉक्टरों की टीम के पहुंचते ही अहमदाबाद से गुजरात सरकार के विमान ने उड़ान भरी, कच्छ जिला प्रशासन के अधिकारियों को पहले ही तैयारी रखने के लिए कहा गया था. भुज के अस्पताल से निर्णय को राज्य सरकार के विशेष विमान में शिफ्ट किया गया, डॉक्टर अपनी निगरानी के तहत अहमदाबाद एयरपोर्ट लेकर आए और फिर वहां से स्टर्लिंग अस्पताल में शिफ्ट कर इलाज किया गया, जरूरी ऑपरेशन हुए और इस तरह निर्णय की जान बची. ठीक हो जाने के बाद मोदी का निर्णय पर फोन आया, कैसे क्या हुआ था, इसकी जानकारी मांगी. निर्णय ने कहा कि अचानक तबीयत खराब हो गई, मोदी ने काटते हुए कहा कि अचानक कुछ नहीं होता, अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए, परिवार को आपकी जरूरत है. निर्णय 17 साल बाद भी उस वाकये को नहीं भूल सकते, आखिर मोदी ने अगर तत्परता से कदम नहीं उठाए होते, तो निर्णय की जान नहीं बच सकती थी. 2002 के गुजरात दंगों के बाद मीडिया जिस तरह से मोदी पर हमलावर था, कोई कल्पना नहीं कर सकता कि किसी पत्रकार की जान बचाने के लिए मोदी ने राज्य सरकार का विशेष विमान भेज दिया हो, सारे इंतजाम करने की पहल खुद की हो.

मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करनी होती है मोदी की सबसे बड़ी प्राथमिकता
मोदी के व्यक्तित्व के इस खास पहलू का अंदाजा मुझे भी 2004 में ही हुआ था, मार्च के महीने के आखिरी दिन. एक दिन पहले ही यानी तीस मार्च को तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की भारत उदय यात्रा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मस्थल पोरबंदर से शुरु हुई थी. यात्रा के दूसरे दिन आडवाणी का गुजरात में आखिरी कार्यक्रम साबरकांठा जिले के मुख्यालय हिम्मतनगर में था. गर्मी के दिन थे, लगातार दो दिनों से लू के थपेड़ों के बीच यात्रा की कवरेज करते-करते कब मुझे लू लग गई, पता ही नहीं चला. आडवाणी की यात्रा हिम्मनगर पहुंचे, उससे पहले ही मैं हिम्मतनगर पहुंच गया था, सोचा था कि यहां से कार्यक्रम कवर कर वापस अहमदाबाद निकल जाउंगा. लेकिन आडवाणी की सभा हिम्मतनगर में शुरु हो, उससे पहले ही मेरी तबीयत बिगड़ने लगी. 31 मार्च 2004 की उस शाम तेज बुखार के साथ ही उल्टी का सिलसिला शुरु हुआ, शरीर में सिहरन बढ़ने लगी. साथ में मौजूद कैमरामैन राममणि पांडे ने पास के ही एक लॉज में कमरा खुलवाया और मैं बिस्तर पर गिर पड़ा. हालत बिगड़ती चली गई, ज्वर, सिहरन और उल्टियों ने शरीर को तोड़ दिया. कमजोरी के साथ ही बेहोशी छाती जा रही थी. उसी दौरान नरेंद्र मोदी के पीए ओमप्रकाश का फोन आया. टीवी पत्रकारों की दुनिया तब काफी छोटी हुआ करती थी, गिनती के चैनल और गिनती के ही पत्रकार होते थे. हिम्मतनगर की सभा में ओमप्रकाश ने मुझे नहीं देखा, तो हालचाल जानने के लिए फोन किया. ढंग से बोला भी नहीं जा रहा था मुझसे, ओमप्रकाश को मैंने कहा कि तबीयत ठीक नहीं है, काफी बुखार है. ये सुनते ही ओमप्रकाश ने तुरंत मोदी को सूचना दी, जो आडवाणी के साथ मौजूद थे, हिम्मतनगर में. फोन हाथ में लिया, मोदी ने हालचाल पूछा और कहा कि घबराएं नहीं, कुछ नहीं होगा, मैं व्यवस्था करता हूं.

मोदी से बातचीत खत्म होने के बाद मेरी हालत और बिगड़ी, मैं बेहोश जैसा ही हो गया, मेरे सहयोगी कैमरामैन सोच ही रहे थे कि क्या किया जाए. इसी दौरान कमरे में कुछ लोग घुसे, मुझे इतना सा याद रहा कि कुछ लोग जबरदस्ती मुझे कंधे पर उठाकर कही ले जा रहे थे और मैं विरोध कर रहा था. आखिरकार रात के तीन बजे मेरी आंख खुली, तो मैं एक अस्पताल के बिस्तर पर था. नर्स ने जानकारी दी कि आपको रात में दस बजे के करीब लेकर आया गया है, आपकी हालत खराब थी, समय से उपचार नहीं किया जाता, तो डिहाइड्रेशन की वजह से अनिष्ट हो सकता था. देखा तो बांह में ग्लुकोज की बोतल से जुड़ी सुई लगी हुई थी. सुबह डॉक्टर आए, मेरी सेहत का मुआयना किया, कहा कि आपको कुछ और दिनों के लिए यहां रहना पड़ेगा. लेकिन मैं जिद कर अपने को डिस्चार्ज करा बैठा. अहमदाबाद के लिए निकलते समय डॉक्टर ने कड़ी चेतावनी दी, अगर दोबारा लू लगी, तो आप बचेंगे नहीं, इसलिए घर में ही रहिएगा. अहमदाबाद आया, तो पत्नी परेशान हो उठीं बीती रात की घटना जानकारी दी.

वर्ष 2010 आते-आते इस घटना को मैं भूलने सा लगा. गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह को इशरत जहां मुठभेड़ मामले में सीबीआई की तरफ से आरोपी बनाए जाने के कारण इस्तीफा देना पड़ा, प्रफुल्ल पटेल को तब सीएम रहे मोदी ने अपना नया गृह राज्य मंत्री बनाया, जो फिलहाल तीन केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक हैं. 2010 में विधानसभा के शीत सत्र के दौरान प्रफुल्ल पटेल से मुलाकात हुई. मैंने औपचारिकता के नाते उनसे कहा कि आपसे कभी मिलना नहीं हुआ, समय लेकर मिलने आउंगा. लेकिन लिफ्ट में साथ ही घुसते हुए प्रफुल्लभाई ने कहा कि मैं तो आपसे छह साल पहले मिल चुका हूं, आपको अच्छे से जानता हूं. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, अपनी स्मरण शक्ति पर पूरा भरोसा था, इसलिए प्रतिवाद किया. तब जाकर प्रफुल्ल पटेल ने बताया कि 31 मार्च 2004 की उस शाम नरेंद्र मोदी ने हिम्मतनगर में आडवाणी की सभा की व्यवस्था करने में लगे प्रफुल्ल पटेल को सब कुछ छोड़कर तत्काल मुझे ढूंढकर अस्पताल में भर्ती करा उचित उपचार कराने का आदेश दिया था.

मोदी के निर्देश पर अस्पताल में भर्ती कराने पहुंचे थे प्रफुल्ल पटेल
प्रफुल्ल पटेल तब छोटे से कस्बे रहे हिम्ममतगर में मुझे ढूंढते हुए लॉज के कमरे में पहुंचे थे और मेरे प्रतिरोध के बावजूद मुझे अपने कंधे पर लादकर सीढियों से उतरे थे और अस्पताल में पहुंचाया था. अस्पताल में भर्ती कराने के बाद रात दो बजे तक मेरे सिरहाने बैठे रहे थे प्रफुल्लभाई और मेरे उपर जो खतरा मंडरा रहा था, वो टल जाने के बाद रात के उस प्रहर में मोदी को मेरी कुशलता की सूचना देकर अपने घर लौटे थे. मोदी का ये वो रूप था, जिसकी चर्चा मैंने कभी सार्वजनिक तौर पर नहीं की. तब करता तो शायद ये मोदी के लिए प्रोपेगंडा माना जाता, क्योंकि उनके बारे में कुछ भी सकारात्मक बोलना लंबे समय तक इस देश में कुफ्र रहा है. अब शायद मोदी जिस उंचाई पर पहुंच चुके हैं, वहां ऐसे तमाम किस्सों के सार्वजनिक होने या न होने से उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन करोड़ों देशवासियों को ये मोदी के उस रूप से परिचय कराने में मददगार हो सकता है, जहां वो आक्रामक राजनेता नहीं, बल्कि गहरी मुसीबत में फंसे लोगों के लिए संकटमोचक रहे हैं, उन्हें हिम्मत बंधाते आए हैं, हर किस्म की मदद करते आए हैं. देश को मोदी का ये रूप भी जानना चाहिए और इसलिए ये कुछ चुनिंदा किस्से हजारों सच्ची घटनाओं की प्रतिनिधि तस्वीर माने जा सकते हैं.

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