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Exclusive: दुश्मन की गोलियां नहीं, घर की बीमारी से मारे जा रहे हमारे सैनिक...

फाइल फोटो

फाइल फोटो

मोर्चे पर तो वो मुस्तैदी से डटे हुए हैं. आतंकवादियों और नक्सलियों के ज्यादातर हमलों को नाकाम कर रहे हैं. लेकिन मोर्चे पर ही वो एक मच्छर से हार रहे हैं. मच्छर के काटने से बीमारी की चपेट में आकर दम तोड़ रहे हैं.

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मोर्चे पर तो वो मुस्तैदी से डटे हुए हैं. आतंकवादियों और नक्सलियों के ज्यादातर हमलों को नाकाम कर रहे हैं. लेकिन मोर्चे पर ही वो एक मच्छर से हार रहे हैं. मच्छर के काटने से बीमारी की चपेट में आकर दम तोड़ रहे हैं.

परेशान करने वाली बात ये है कि जितने जवान दुश्मन की गोली से घायल और शहीद नहीं हुए, उससे कई गुना जवानों ने मच्छर के काटने से होने वाली बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट से मोर्चे पर बीमारी की चपेट में आकर जवानों की हो रही मौत का खुलासा हुआ है.

खास बात ये है कि जिन मोर्चों पर जवान आतंकवादियों और नक्सलियों से लड़ रहे हैं, उसी मोर्चे पर जवानों की ये मौत हुई हैं. रिपोर्ट के अनुसार सीआरपीएफ, एसएसबी, सीआईएसएफ, असम राइफल्स, बीएसएफ और आईटीबीपी के जवान बीमारी की चपेट में आकर मर रहे हैं.

Soldiers

वर्ष 2014 से 2017 तक बीमारी के चलते 3221 जवान और अधिकारियों की मौत हो चुकी है. मोर्चे पर बीमारी के चलते मरने वाले जवानों में सबसे बड़ी संख्या सीआरपीएफ के जवानों की है. अलग-अलग मोर्चे पर 1489 जवान अभी तक दम तोड़ चुके हैं.

फाइल फोटो

प्लाज्मोडियम मच्छर के काटने से जवानों को सेरेब्रल मलेरिया हो रहा है. इसे दिमागी मलेरिया भी कहा जाता है. जबकि इन तीन वर्ष में दुश्मन की गोली से मरने या घायल होने वाले जवान और अधिकारियों की संख्या सिर्फ 961 है.

सीआरपीएफ के पीआरओ डिप्टी कमांडेंट राजीव बताते हैं कि हमारे जवान और अधिकारी जंगल और उससे लगे क्षेत्रों में डयूटी दे रहे हैं. जिसके चलते उन्हें तरह-तरह के मच्छर और दूसरे कीड़े-मकोड़े का सामना करना पड़ता है. लेकिन इस वक्त तो सबसे ज्यादा मौत दिमागी मलेरिया के चलते हो रही हैं.

फोर्स के जवान और अधिकारियों को ये दी जाती हैं हिदायत

पूरे शरीर को अच्छी तरह से ढक कर रहें.

टोपी पर मच्छरदानी लगाई जाती है,  जिसके चलते चेहरे को ढका जाता है.

शरीर पर लगाने के लिए दवाई दी जाती है.

जंगल की बीमारियों से बचाने के लिए जवानों को सात दिन में एक बार एक खास दवाई खिलाई जाती है.

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