OPINION: बेहाल कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए सोनिया गांधी को चाहिए जादू की छड़ी

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के लिए कांग्रेस अध्‍यक्ष (Congress President) के रूप में दूसरी पारी पहली पारी से ज्‍यादा कठिन होने वाली है. उस समय पार्टी में बिखराव तो इसी तरह का था, लेकिन कांग्रेस के पास आज से ज्‍यादा वोट और सीटें थीं. दूसरी पारी में सोनिया को नेताओं के शक्ति प्रदर्शन जैसी नई चुनौतियों और खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बीच बहुत ही कठिन डगर पर चलना है. ऐसे में उनकी पहली प्राथमिकता सरकार पर हमला करना या चुनाव जीतना शायद ही हो पाए. उनकी पहली प्राथमिकता तो अपना कुनबा संभालना ही होगा.

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: September 6, 2019, 1:16 PM IST
OPINION: बेहाल कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए सोनिया गांधी को चाहिए जादू की छड़ी
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी
Piyush Babele
Piyush Babele | News18Hindi
Updated: September 6, 2019, 1:16 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Election 2019) के परिणाम आने के बाद से कांग्रेस पार्टी (Congress) एक अजीब माहौल से गुजर रही है. यह हार भले ही 2014 लोकसभा चुनाव की हार से बड़ी न रही हो, लेकिन इसका सदमा ज्‍यादा बड़ा लगा है. इस सदमे का असर तब और गहरा गया, जब राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने पार्टी की कमान छोड़ दी और करीब ढाई महीने तक भारत की सबसे पुरानी और पूरे देश में अपना वजूद रखने वाली पार्टी नेतृत्‍वविहीन बनी रही. मुखियाविहीन दौर में ही कांग्रेस को कर्नाटक जैसे महत्‍वपूर्ण राज्‍य की सत्‍ता से हाथ धोना पड़ा. इसी बीच बाकी राज्‍यों में जहां उसकी सरकार है या जहां वह मुख्‍य विपक्षी पार्टी के तौर पर मैदान में उतरने वाली है, वहां के नेताओं में असमंजस और खुद को सुरक्षित करने की होड़ मच गई. यह होड़ हद से बाहर न चली जाए, इसलिए आनन-फानन में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कांग्रेस की कमान संभाल ली, लेकिन नेताओं की महत्‍वाकांक्षाओं को काबू करने में उन्‍हें भी मेहनत करनी पड़ रही है.

सोनिया गांधी के सामने पहली चुनौती हरियाणा से आई थी, जहां उनके वफादार होने के बावजूद 10 साल तक राज्‍य के मुख्‍यमंत्री रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupendra Singh Hooda) सोनिया गांधी की फोटो के नीचे होने वाले कार्यक्रमों में ही शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे. अपने पड़ोसी राज्‍य के मुख्‍यमंत्री अमरिंदर सिंह (Amrinder Singh) के नक्‍शेकदम पर चलते हुए हुड्डा ने पार्टी नेतृत्‍व पर खासा दबाव डाला और अंत में प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर को हटवाकर ही दम लिया. चूंकि इस बीच सोनिया गांधी ने कमान संभाल ली थी, इसलिए बात बिगड़ने से बच गई और कुमारी शैलजा को हरियाणा का प्रदेश अध्‍यक्ष बना दिया गया. लेकिन इस पूरी कवायद से कांग्रेस को भारी नुकसान हो चुका है. राज्‍य में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले के जिन महत्वपूर्ण दिनों में पार्टी नेताओं को सत्‍ता वापसी के लिए संघर्ष करना चाहिए था और संगठन को मजबूत करना चाहिए था, तब वे आपस में सिर फुटव्‍वल कर रहे हैं.

मुश्किल है डगर!


यही हाल मध्‍य प्रदेश का है. वहां दिग्विजय सिंह, ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, अजय सिंह जैसे नेता मुख्‍यमंत्री कमलनाथ को अपनी ताकत दिखाने में लगे हैं. जबकि ये सभी नेता हाल ही में लोकसभा चुनाव हार चुके हैं. इन सब नेताओं को पता है कि जिस तरह से पूरे देश में विपक्ष के नेता पाला बदलकर बीजेपी में जा रहे हैं, ऐसे में छोटे से बहुमत वाली उनकी सरकार बहुत स्‍थायी नहीं कही जा सकती. इन्‍हें कोशिश तो ये करनी चाहिए थी कि और लोगों को पार्टी से जोड़ें और अपने जनाधार को मजबूत करें, लेकिन हो यह रहा है कि वे पार्टी को मिली सत्‍ता की आधी रोटी को ही आपस में नोचने में लगे हैं.

हरियाणा की तरह ही यहां भी सोनिया गांधी ने नेताओं को फटकार लगाई है. हो सकता है इससे नेता फौरी तौर पर खुला शक्ति प्रदर्शन करने से बाज आ जाएं.

राजस्‍थान से कुछ दिन से खबरें भले ही न आ रही हों, लेकिन मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मनमुटाव किसी से छुपा नहीं है.

छत्‍तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार में कांग्रेस से अलग हो गए पूर्व मुख्‍यमंत्री अजित जोगी पर ही फंदा कसा जा रहा है.
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अगर केंद्र का रुख करें तो पार्टी के संकटमोचन ही इस समय संकट में हैं. पी चिदंबरम (P Chidambaram) जेल जा चुके हैं. अहमद पटेल के बेटे को पूछताछ के लिए ईडी बुला रही है. कर्नाटक में पार्टी के कद्दावर नेता डी.के. शिवकुमार खुद हिरासत में हैं. महाराष्‍ट्र में आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की क्‍या रणनीति है, यह लोगों को बहुत ज्‍यादा पता नहीं है.

पार्टी संभालने की चुनौती


पार्टी नेता ऐसा क्‍यों कर रहे हैं, क्‍या उन्‍हें पता नहीं है कि अगर वे एकजुट होकर चुनाव में जाएंगे तभी कुछ कर पाएंगे या फिर उनके मन में कुछ और ही बात चल रही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि इनमें से ज्‍यादातर नेता लोकसभा चुनाव की हार से हताश हैं और उन्‍हें लग रहा है कि निकट भविष्‍य में पार्टी के सितारे बदलने वाले नहीं हैं. ऐसे में फिलहाल पार्टी पर किसी तरह कब्‍जा कर लिया जाए और जब अच्‍छे दिन आएं तो लड़ाई का नेतृत्‍व उनके हाथ में हो.

अगर नेताओं की यही सोच है, जो कि पूरे भारत में काफी हद तक नजर आ रही है तो सोनिया गांधी के लिए अध्‍यक्ष की दूसरी पारी पहली पारी से ज्‍यादा कठिन होने वाली है. उस समय पार्टी में बिखराव तो इसी तरह का था, लेकिन कांग्रेस के पास आज से ज्‍यादा वोट और सीटें थीं. यही नहीं उनके सामने पीएम नरेंद्र मोदी जैसा विशालकाय प्रतिद्वंद्वी नहीं था. इसके अलावा सोनिया गांधी उस समय राजनीतिक उम्र के पैमानों पर युवा ही थीं. तब कांग्रेस के नेताओं के सामने पार्टी छोड़ने का विकल्‍प तो था, लेकिन ऐसा कोई लालच नहीं था जिसके लिए वे दूसरी पार्टी में चले जाएं. उस दौर में भले ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही हो, लेकिन कांग्रेस नेताओं के सामने जेल जाने का भी संकट नहीं था. इसके अलावा पार्टी की माली हालत भी ठीक थी.

नेताओं की महत्‍वाकांक्षाओं को काबू करने में सोनिया गांधी को मेहनत करनी पड़ रही है.


इन सारी नई चुनौतियों और खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बीच सोनिया गांधी को बहुत ही कठिन डगर पर चलना है. ऐसे में उनकी पहली प्राथमिकता सरकार पर हमला करना या चुनाव जीतना शायद ही हो पाए. उनकी पहली प्राथमिकता अपना कुनबा संभालना ही होगा, ताकि दो साल बाद जो चुनावों की कतार शुरू हो, उसमें तो पार्टी बेहतर कर सके.

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First published: September 6, 2019, 12:55 PM IST
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