OPINION: तीन कारण- क्यों मायावती ने सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को नहीं शामिल किया?

सवर्ण मतदाता कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा है. एस-एसटी का जो वर्ग मायावती से नाराज़ चल रहा है वह भी कांग्रेस में जा सकता है.

News18.com
Updated: February 11, 2019, 11:15 AM IST
OPINION: तीन कारण- क्यों मायावती ने सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को नहीं शामिल किया?
मायावती और अखिलेश यादव की फाइल फोटो
News18.com
Updated: February 11, 2019, 11:15 AM IST
बद्री नारायण

बीजेपी को हराने के लिए महागठबंधन की कवायद जारी है. लेकिन अभी इस मामले में पूरी तरह से सहमति नहीं बन पाई है. अगर बात करें यूपी की तो वहां महागठबंधन जैसी कोई स्थिति नहीं लगती. यूपी में मायावती और अखिलेश के बीच गठबंधन सिर्फ दो पार्टियों के बीच का गठबंधन है, महागठबंधन नहीं है क्योंकि इसमें कांग्रेस को किनारे कर दिया गया है.

पर यूपी में कांग्रेस चुनाव को त्रिकोणीय बनाने में लगी हुई है. हाल ही में प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया जाना इस बात का सबूत है कि कांग्रेस अपने कदम पीछे खींचने के मूड में नहीं है.



फिर क्या कारण है कि यूपी मे सपा-बसपा ने कांग्रेस को गठबंधन से बाहर रखा. और इसके क्या परिणाम होंगे? क्या यह सिर्फ इसलिए है क्योंकि कांग्रेस यूपी में कमज़ोर है या कुछ और कारण है?

लखनऊ में इस रूट से गुजरेगा प्रियंका गांधी का रोड शो, 28 जगहों पर होगा स्वागत

अपने पूर्व के अनुभवों से मायावती ने सीखा है कि कांग्रेस का वोट गठबंधन के बावजूद किसी और को ट्रांसफर नहीं होता. या तो ये कांग्रेस को जाता है और या तो ये कई पार्टियों में बंट जाता है. मायावती को दूसरा डर है कि कांग्रेस से हाथ मिलाने पर उनका एससी-एसटी वोट कांग्रेस की तरफ खिसक सकता है. क्योंकि एक लंबे समय तक एससी-एसटी वोट कांग्रेस को मिलता रहा है. अगर एससी-एसटी मतदाताओं को लगता है कि कांग्रेस फिर से उभर रही है तो उनका वे फिर से कांग्रेस के साथ जा सकते हैं.

तीसरी बात कांग्रेस के साथ गठबंधन करके मायावती राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में स्वीकृति नहीं देना चाहती थीं. अखिलेश यादव को भी ऐसा लगता है कि बिना मायावती के साथ के वह 2019 के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे. इसलिए वह भी गठबंधन में कांग्रेस को शामिल न करने के मायावती के फैसले पर सहमत हो गए.
Loading...

यह बात सही है कि इस वक्त यूपी में कांग्रेस का वोट बैंक बहुत ज़्यादा नहीं है और यह सिर्फ 7 से 9 फीसदी तक ही सीमित है. लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि पीएम नरेंद्र मोदी के सामने अब राहुल गांधी एक बेहतर नेता के रूप में उभर रहे हैं.

फिर, हाल ही में कांग्रेस की तीन हिंदी भाषी राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा है और जनता में यह संदेश गया है कि कांग्रेस फिर से मज़बूत हो रही है. ऐसी स्थिति में अगर अल्पसंख्यक मुसलमानों को लगता है कि कांग्रेस, बीजेपी को हटाने में सफल हो सकती है तो यह सारा वोट कांग्रेस पार्टी को जा सकता है. यूपी में मुसलमानों की संख्या 20 फीसदी है.

यह पढ़ें- तो जल्द ही सियासी पारी शुरू करेंगे कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ!

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण भी योगी सरकार से कई बातों को लेकर नाराज़ चल रहे हैं. यूपी में ब्राह्मणों का प्रतिशत काफी अधिक है. साथ ही एससी/एसटी एक्ट को लेकर केंद्र सरकार से भी ब्राह्मण नाराज़ चल रहे हैं. इस स्थिति में ब्राह्मण मतदाता एक गैर-बीजेपी पार्टी की तलाश करेंगे. बसपा को ब्राह्मण मतदाता पसंद करते रहे हैं लेकिन सपा से गठबंधन करने के बाद अब वे बसपा में जाने से कतराएंगे. अंत में उनके पास बेहतर विकल्प के रूप में कांग्रेस ही बचती है.

सामान्य वर्ग के लोगों को दस फीसदी का आरक्षण दिया जाना भी शायद इन घावों को नहीं भर पाएगा. फिर सवर्ण मतदाता कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा है. एस-एसटी का जो वर्ग मायावती से नाराज़ चल रहा है वह भी कांग्रेस में जा सकता है. हालांकि, उनका एक वर्ग बीजेपी के साथ भी जा सकता है क्योंकि आरएसएस उनको अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश कर रही है.

इन स्थितियों में मुसलमान, एससी-एसटी और ब्राह्मण के साथ-साथ कांग्रेस के कुछ वोटर्स मिलकर पार्टी की स्थिति को बेहतर बना सकते हैं. ऐसा होने पर कांग्रेस या तो सपा-बसपा गठबंधन के लिए बड़ी 'वोट-कटवा' के रूप में उभर सकती है और या तो काफी संख्या में सीटों को भी जीत सकती है. इन दोनों ही स्थितियों में कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन के सामने बड़ी समस्या खड़ी कर सकती है.

(बद्री नारायण जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद में सोशल साइंटिस्ट हैं. व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं)
एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पाससब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स

Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर