Analysis: 'भाभी' और 'बहू' की छवि से डिंपल कन्नौज से क्या 'हैट्रिक' लगा पाएंगी?

Analysis: 'भाभी' और 'बहू' की छवि से डिंपल कन्नौज से क्या 'हैट्रिक' लगा पाएंगी?
डिंपल यादव

कन्नौज से सपा के टिकट पर दो बार सांसद चुनी जा चुकीं डिंपल यादव 44वीं ऐसी प्रत्याशी हैं, जो लोकसभा तक निर्विरोध पहुंचने में कामयाब रही हैं. इस बार मुकाबला पहले से मुश्किल होने के आसार हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 29, 2019, 4:39 PM IST
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डिंपल यादव समाजवादी पार्टी की तरफ से दो बार सांसद रह चुकी हैं और फिलहाल कन्नौज से सांसद हैं. पिछले तीन दशकों में इकलौती और इतिहास में 44वीं ऐसी प्रत्याशी हैं, जिन्हें भारत में किसी लोकसभा सीट से बगैर किसी विरोध के चुना गया.

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल को पहली जीत 2012 में मिली थी, जब अखिलेश ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभालने के लिए कन्नौज लोकसभा सीट छोड़ी थी. लेकिन इससे पहले डिंपल को सियासत का एक कड़वा अनुभव मिल चुका था.

2009 में अखिलेश यादव ने कन्नौज और फिरोज़ाबाद, दो सीटों से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता था. अखिलेश ने कन्नौज से अपनी दावेदारी बरकरार रखते हुए फिरोज़ाबाद सीट छोड़ी और यहां से डिंपल यादव का चुनाव में पदार्पण हुआ. लेकिन, डिंपल अपने पहले चुनाव में कांग्रेस के राज बब्बर से वोटों के अच्छे खासे अंतर से हार गई थीं.



मोदी लहर के बावजूद जीती थीं डिंपल
हालांकि 2014 में, मोदी लहर के बावजदू डिंपल ने अपनी सीट बचाने में कामयाबी हासिल की. उस साल उत्तर प्रदेश में कुल 7 सांसद गैर भाजपाई थे, जिनमें से 5 सपा के सांसद थे.

डिंपल की इमेज को लेकर खुद डिंपल और पार्टी ने पिछले दो सालों में काफी एहतियात के साथ काम किया और अब वो 'भाभी' व 'बहू' की इमेज में खुलकर जनता के सामने आ रही हैं और हाल में उन्होंने अभिनय से राजनीति में आने वाली भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा के खिलाफ दिए गए सपा के कद्दावर नेता आज़म खान की टिप्पणी के समर्थन में बयान देकर सियासत में अपने दमखम का भी सबूत देने की कोशिश की. उन्होंने आज़म के बयान को 'छोटी सी बात' कहकर नज़रअंदाज़ करने का बयान दिया.

मायवती के पैर छूकर रहीं सुर्खियों में
इसके अलावा, पिछले दिनों महागठबंधन के रूप में बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव एक साथ सालों बाद एक मंच पर दिखे. इसके बाद एक मंच पर डिंपल ने मायावती के पैर छूकर इस महागठबंधन को जनता के सामने ऐतिहासिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

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हालांकि डिंपल के इस कदम को लेकर यूट्यूब पर उनका मज़ाक उड़ाते हुए मीम वीडियो भी बने और भाषणों के दौरान उनके अटकने के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए लेकिन डिंपल इसे दरकिनार करते हुए लगातार चुनाव और पार्टी में अपनी छवि बेहतर करने के सफर पर हैं. पहले डिंपल कागज़ पर लिखा भाषण देखकर पढ़ती थीं, मंच पर घबराई दिखती थीं, लेकिन अब कुशल वक्ता हैं और अपनी 'बहू' व 'भाभी' की इमेज को पार्टी के हक में इस्तेमाल करने का हुनर विकसित कर चुकी हैं.

अखिलेश और मायावती से ज़्यादा भीड़ जुटाती हैं डिंपल!
डिंपल को सपा के भीतर अच्छा प्रभाव रखने वाला नेता माना जाने लगा है. सोशल सेक्टर की योजनाओं, खास तौर से महिलाओं के लिए लॉंच की जाने वाली योजना के दौरान वो सीएम अखिलेश के साथ प्रचार में नज़र आ चुकी हैं. शहरी क्षेत्रों में भी उनका दबदबा बढ़ता हुआ बताया जाता है.

2017 के यूपी इलेक्शन के दौरान डिंपल पार्टी के लिए स्टार प्रचारक के तौर पर उभरीं. अगर प्रचार अभियानों की बात की जाए तो युवाओं में 'भाभी' की छवि रखने वाली डिंपल ने अपने पति के लिए वोट मांगकर कई नेताओं से ज़्यादा प्रभाव पैदा किया. अखिलेश ने तो मीडिया में यहां तक कह दिया था कि रैलियों में उनसे ज़्यादा भीड़ डिंपल खींचती हैं. सोशल मीडिया में भी ये दावा किया गया कि डिंपल की रैलियों में आ रही भीड़, मायावती की रैलियों में आने वाली भीड़ से ज़्यादा दिखती है.

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डिंपल की छवि कुशल वक्ता की रही है लेकिन तीखे प्रहार के लिए वो नहीं जानी जातीं. इसके बावजूद उन्होंने कांग्रेस, सपा व बसपा के गठबंधन के पक्ष में बीजेपी की 'कसाब' की व्याख्या को 'अपवित्र' कहा और अपना वर्जन एक नारे के तौर पर दिया 'कंप्यूटर, स्मार्टफोन और बच्चे'. ये कहकर उन्होंने सपा को विकासोन्मुख पार्टी के रूप में प्रोजेक्ट किया.

डिंपल की इमेज बनाम इस बार की मुश्किल!
डिंपल अक्सर 'बहू' की इमेज लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और वोटरों के बीच जाती हैं और 'मुंह दिखाई' के तौर पर वोट मांगती हैं. पूर्व सैनिक की तीन बेटियों में से एक डिंपल कई राज्यों में पढ़ाई करने के बाद बीकॉम डिग्रीधारी हैं. 1995 में एक पार्टी में अखिलेश से मुलाकात के बाद 1999 में दोनों ने शादी की थी और उसके बाद से ही उनका राजनीतिक जीवन शुरू हुआ था.

कन्नौज संसदीय क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से चार पर फिलहाल बीजेपी का कब्ज़ा है और एक पर सपा की. 2014 में जब सपा के पास सभी विधानसभा सीटें थीं, तब डिंपल ने कन्नौज से भाजपा प्रत्याशी सुब्रत पाठक को कम वोटों के अंतर से हराया था. एक बार फिर डिंपल कन्नौज से लोकसभा चुनाव मैदान में हैं. राममनोहर लोहिया, मुलायम सिंह और अखिलेश जैसे समाजवादी नेताओं को संसद तक पहुंचाने वाली इस सीट पर 1998 से सपा का वर्चस्व माना जाता है.

लोकसभा चुनाव 2019 में नामांकन दाखिल करने वाली डिंपल के पक्ष में कई बार अखिलेश रैलियां कर चुके हैं और इस बार बसपा व रालोद के साथ महागठबंधन भी डिंपल के लिए कन्नौज सीट को बचाने की मुहिम में लगा हुआ है. केंद्र और उप्र में जब बीजेपी सरकार है, ऐसे में कन्नौज में इस बार मुकाबला और भी मुश्किल होने वाला है क्योंकि डिंपल के खिलाफ बीजेपी ने फिर पाठक को मैदान में उतारा है.

डिंपल का भविष्य इस बार का चुनाव इसलिए तय करेगा क्योंकि अगर तीसरी बार डिंपल जीत जाती हैं तो पुरुष प्रधान सोच वाले उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख पार्टी सपा में उनका कद बढ़ेगा और वो यादव परिवार की छाया से निकलकर अपनी एक पहचान बना पाएंगी. सोमवार को चौथे चरण के मतदान के दौरान कन्नौज में डिंपल का भाग्य ईवीएम में बंद हो रहा है.

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