Analysis: पहली बार सच साबित हुईं नड्डा को लेकर अटकलें

जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया है और सूत्रों की मानें तो संगठनात्मक चुनावों के बाद नड्डा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना तय है.

Anil Rai | News18Hindi
Updated: June 18, 2019, 3:49 PM IST
Anil Rai
Anil Rai | News18Hindi
Updated: June 18, 2019, 3:49 PM IST
भारतीय जनता पार्टी ने अपने नए कार्यकारी अध्यक्ष के नाम का ऐलान कर दिया है और उम्मीद के मुताबकि वह नाम जेपी नड्डा का ही है. केंद्रीय मंत्रिमंडल के गठन के समय जब नड्डा को मंत्री नही बनाया गया तबसे नड्डा का नाम की अटकले तेज हो गई थीं. नड्डा साल 2014 में भी बीजेपी अध्यक्ष पद दौड़ में शामिल थे, लेकिन उस बार बाजी अमित शाह के हाथ लगी. नड्डा का नाम हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री चेहरे रुप में भी चर्चा में रहा, लेकिन उस समय पार्टी ने ऐन वक्त पर प्रेम कुमार धुमल को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया. हालांकि धूमल चुनाव हार गए और उनकी उम्मीदें धूमिल हो गईं. इस बार लंबे इंतजार के बाद जेपी नड्डा के बारे में जो अटकले लगीं वो पहली बार सही साबित होती दिख रही हैं. नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया है और सूत्रों की मानें तो संगठनात्मक चुनावों के बाद नड्डा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना तय है.

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कार्यकारी अध्यक्ष के सामने चुनौतियों का पहाड़
जेपी नड्डा के सामने चुनौतियो का बड़ा पहाड़ है. अमित शाह ने बीजेपी को जिस मुकाम पर पहुंचाया है उससे आगे ले जाना आसान नहीं है, क्योंकि आने वाली चुनौती गैर हिन्दी भाषी राज्यों में है, जहां संघ से लकेर बीजेपी तक के सभी प्रयोग असफल रहे हैं. हालांकि पश्चिम बंगाल में अमित शाह की टीम ने बीजेपी के राह आसान कर दी है और लोकसभा चुनावों में ममता का किला दरका दिया है और अब एक धक्के से वो किला टूट सकता है लेकिन केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडू जैसे राज्यों में विस्तार करना नए अध्यक्ष के लिए बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि इन राज्यों में बीजेपी बीजेपी अपनी स्थापना के बाद से अब तक तमाम कोशिशों के बाद भी जमीन तलाश नहीं पाई.

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ऐसे में कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा का सामने पार्टी के नए अध्यक्ष के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ गृह मंत्री और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ तालमेल रखने के साथ साथ संघ के साथ तालमेल रखना भी बड़ी चुनौती होगी क्योंकि तीनों के तालमेल के बिना इन राज्यों में बीजेपी का विस्तार संभव नहीं है
विरोधियों से ज्यादा सहयोगियों से चुनौती
जेपी नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि उनके सहयोगी दलों से आने वाली है. महाराष्ट्र में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में सीटों का बंटवारा बड़ी चुनौती है जिस तरह शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे अयोध्या का दौरा कर मंदिर मुद्दे पर शिवसेना को फ्रंटफुट पर ऱके की कोशिश कर रहे हैं. उससे एक बात तो तय है शिव सेना महाराष्ट्र में इतनी आसानी सो छोटे भाई का दर्जा लेने को तौयार नहीं ऐसे में नड्डा के सामने शिवसेना को कम से कम सीट देकर गठबंधन में शामिल रखने की चुनौती होगी.

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बिहार से भी बीजेपी के लिए संकेत ठीक नही आ रहे हैं. केन्द्रीय मंत्रिमंडल के गठन के बाद से ही नीतीश एंड टीम, बीजेपी के विरोध के बहाने अपने अल्पसंख्यक वोटों को बचाने में जुटी है. लोकसभा चुनावों में सभी सीटे जीतने के बाद पार्टी का स्थानीय संगठन भी अब नीतीश कुमार को बहुत दिनों तक को नेता नहीं मानना चाहता.

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