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5 हजार बच्चों वाला एक नीम का पेड़, जहां जल-जंगल-जमीन की है ढेरों कहानियां

5 हजार बच्चों वाला एक नीम का पेड़, जहां जल-जंगल-जमीन की है ढेरों कहानियां

गांधी आश्रम और नीम का पेड़ (Photo: News18)

गांधी आश्रम और नीम का पेड़ (Photo: News18)

जब आप श्योपुर शहर से आदिवासी सहरियाओं के गांव बरदाबुजुर्ग जाएंगे, तो वहां एसएन सुब्बाराव जी के सबसे पहले स्थापित महात्मा गांधी सेवा आश्रम की जमीन पर सैकड़ों की संख्या में नीम के कतारबद्ध लहलहाते वृक्ष पाएंगे. गांव के भीतर जगह-जगह चौबारों पर श्री जय सिंह जादौन की फेंकी, लगाईं निम्बोलियां नीम का वृक्ष बनकर लहरा रही हैं. अब इन्हीं चौबारों के नीचे गांव के लोग बैठते हैं, सुख-दुख बांटते हैं.

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हजारों बच्चों, नाती-पोतों वाला पेड़? यह वाक्य पढ़कर आश्चर्य होता है न कि क्या ऐसा भी कहीं होता है? तो हम आपसे यही कहेंगे जी हां, ऐसा हो सकता है, लेकिन यह तभी संभव है, जब कुदरत से प्यार करने वाला, उसमें जीने-रचने-बसने वाला कोई जुनूनी बागवान उसे मिल जाए. मध्यप्रदेश के श्योपुर स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम में ऐसा ही एक नीम का पेड़ है, जिसकी निंबोलियों से जन्मे करीब 5 हजार बच्चे गांव-गली, उसके चौबारों में छायादार वृक्ष के रूप में लहलहाते हुए बयार बनकर सांसों में समा रहे हैं, जिंदगी मेंं सुकून घोल रहे हैं.
कहते हैं न कि अच्छे बागवान के बगैर कोई बगीचा या फुलवारी नहीं खिलती. बता दें इस पूरे नीम खानदान के बागवान हैं जय सिंह जादौन, जो पैदा तो जमींदार घराने में हुुए हैं, लेकिन सादा जीवन, सबकी चिंता, सबसे प्यार उनकी जीवन शैली है. वह महात्मा गांधी सेवा आश्रम और वहां संचालित कार्यों के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालते हैं. यह वही आश्रम है, जिसकी स्थापना गांधीवादी विचारक, पद्मश्री एस.एन.सुब्बाराव ने की थी और इसी आश्रम से वंचितों, आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के संघर्ष की शुरूआत एकता परिषद के प्रमुख और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता पी.वी. राजगोपाल, जिन्हें प्यार से सब राजा जी या राजू भैया कहकर पुकारते हैं, ने की थी.

neem ka ped

ढेरों योजनाओं की गवाही है ये पेड़

महात्मा गांधी सेवा आश्रम के आंगन में उम्र की करीब आधी सदी पार कर चुके नीम के इस पेड़ के तले जल-जंगल-जमीन के अधिकार को लेेकर संघर्ष की न जाने कितनी गाथाएं लिखी गई हैं. यह नीम का पेड़ न जाने कितने आदिवासियों, वंचितों को बसेरा देकर उनके दुःख, दर्द, आंसुओं या खुशियों का गवाह रहा है.

इस तरह बढ़ा नीम का खानदान

इस नीम के खानदान बढ़ने की कहानी 20वीं सदी के आखिरी दशक के मध्य से शुरू होती है, जब बुढ़ेरा गांव में दबंगों की बंधुआ मजदूरी से छुडाए गए सैकड़ों सहरिया आदिवासियों डॉ. एसएन सुब्बारावजी नेे श्योपुर जिले के बरदा बुजुर्ग गांव में बने अपने पहले महात्मा गांधी सेवा आश्रम की जमीनों पर बसाया था. तब एकता परिषद के संस्थापक पीवी राजगोपाल के सानिध्य में रहते हुए आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत साथियों के समूह में एक नौजवान ऐसा था, जो श्योपुर के इस गांधी आश्रम से नीम के पेड़ से गिरी निम्बोलियों को बीनकर झोले में भरकर ले जाता और बरसात के मौसम में जगह-जगह फेंकता, बोता जाता. उस नौजवान का नाम था जय सिंह जादौन.

सांसों से संस्कारों तक नीम

जब आप श्योपुर शहर से आदिवासी सहरियाओं के गांव बरदाबुजुर्ग जाएंगे, वहां सुब्बारावजी के सबसे पहले आश्रम की जमीन सैकड़ों की संख्या में नीम के कतारबद्ध लहलहाते वृक्ष पाएंगे. गांव के भीतर जगह-जगह चौबारों पर जय सिंह जादौन की फेंकी, लगाईं निम्बोलियां नीम के वृक्ष बनकर लहरा रही हैं. अब इन्हीं चौबारों के नीचे गांव के लोग बैठते हैं, सुख-दुख बांटते हैं. गांवों के छोटे-मोटे झगड़े निपटा लेते हैं. इन चौबारों को आप गांव की छोटी अदालतें कह सकते हैं. 56 वर्षीय जय सिंह जादौन अब इन नीम के वृक्षों को देख कर खूुशी से फूले नहीं समाते और गर्व से इन नीम वृक्षों के जन्म की कहानी सबको सुनाकर प्रेरित करते हैं.

सियाराम नामक सहरिया आदिवासी अपने घर के सामने चौबारे पर लगे नीम के पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि हमने यहीं गांव वालों के साथ शराब न पीने, न पीने देने, न गांव के भीतर शराब बिकने देने की शपथ ली थी. सुब्बाराव जी ने यह शपथ दिलाई थी. इसी नीम के नीचे बारातें ठहरती हैं, उनकी अगवानी होती है, बेटियां विदा होती हैं. जन्म से मौत तक के बहुत से संस्कार यहीं पूरे किए जाते हैं. पेड़ के नीचे पड़ीं रस्सियों से बुनी दो खटियां, जो हर आने वाले से कहती सी लगती हैं कि सुस्ता तो लो जरा. सांस ले लो दो घड़ी.

जय सिंह जादौन कहते हैं कि श्योपुर आश्रम में लगे नीम के एक पेड़ के कम से कम 5 हजार बच्चे हो गए हैं. निम्बोलियों को झोले में भरना और जहां-तहां जगह देखकर लगाना मेरी आदत, मेरे स्वभाव का हिस्सा बन गया. बरदाबुजुर्ग, एकता पुरा समेत कई गांवों में इस नीम के पेड़ के बच्चे, नाती-पोते बड़े हो चुके हैं.

नीम को ही क्यों चुना

जादौन कहते हैं कि नीम एक ऐसा पेड़ है, जो हवा को शुद्ध करता है, जिसके बीज से लेकर पत्तियां, छाल सब कुछ काम आता है. नीम का प्रमुख औषधीय गुण संक्रमण को दूर करना है. इसके अलावा नीम का कीटनाशक, डेंगू -मलेरिया से बचाव, बाल झड़ने से रोकने, जहरीले कीड़े के काटने पर दवा के रूप में, फोड़े-फुंसी हो जाने पर, ज्वर हो जाने पर, रक्त साफ करने, त्वचा रोगों से लेकर पूजा-पाठ तक हर कार्य में इस्तेमाल होता है. वह कहते हैं कि हमने सोचा कि ऐसा गुणकारी पेड़ लोककल्याण के लिए लगाना चाहिए, सो चल पड़े मिशन नीम पर. वह कहते हैं कि मुझे खुशी है कि मैं नीम का परिवार बढ़ाने का माध्यम बना. मैं चाहता हूं कि इस नीम के पेड़ की कहानी दुनिया जाने. मेरा यही संदेश है कि युवा पीढ़ी इस काम को संस्कार की तरह अपनाए, आगे बढ़ाए.

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