जन्मदिन विशेष: गाय के बदले की गई थी फूलन की शादी

विद्रोहिणी फूलन.. बहुजन नायिका फूलन.. या दस्यु फूलन के अपमान,आत्मसम्मान और हत्या का अजीबोगरीब त्रिकोण


Updated: August 10, 2017, 5:48 PM IST
जन्मदिन विशेष: गाय के बदले की गई थी फूलन की शादी
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Updated: August 10, 2017, 5:48 PM IST
बात वर्ष 2011 की है. इस वर्ष प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर प्रकाशित अपने अंक में फूलन देवी को इतिहास की 16 सबसे विद्रोही महिलाओं की सूची में चौथे नंबर पर रखा. इस अंक में टाइम मैगजीन ने फूलन देवी के बारे में लिखा था कि ,'उन्हें भारतीय गरीबों के संघर्ष को आवाज देने वाले के रूप में याद किया जाएगा.'

टाइम ने सही ही लिखा था. फूलन थी भी अद्भुत अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति. हम सबने महिलाओं पर हुए अत्याचार की कई कहानियां पड़ी और सुनी हैं लेकिन फूलन देवी की जिंदगानी एक जीवट स्त्री की मिसाल है. फूलन देवी एक ऐसी महिला थी जिसने बुरे से बुरे हालात में भी हार नहीं मानी.

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के एक छोटे से गांव गोरहा का पूर्वा में निषाद (मल्लाह) जाति के देवीदीन और मूला देवी के घर हुआ. जब फूलन 11 साल की हुई, आर्थिक तंगी की वजह से उसकी शादी उससे उम्र में कई साल बड़े एक आदमी से करवा दी गई.  यह शादी एक गाय के बदले कर दी गई. अपने पति के रवैये से तंग आकर फूलन ने पति का घर छोड़ दिया और वापस मां-बाप के पास आकर रहने लगी.

राबिनहुड फूलन

मायके आने पर घऱवालों ने भी उनका साथ नहीं दिया. हालात ऐसे बने कि गांव के ठाकुरों की नजर अकेली फूलन को देखकर खराब होने लगी. जब फूलन तकरीबन पंद्रह साल की थी तो ठाकुरों के एक गैंग ने फूलन देवी को जबरन उठा लिया और दो हफ्ते तक बारी-बारी से उसका बलात्कार करते रहे. इस अपमान और पीड़ा से गुजरी फूलन ने इस अपमान का बदला लेने की खातिर समाज से विद्रोह करते हुए बीहड़ की तरफ चली गई. बीहड़ में बागियों से जुड़ने के बाद फूलन ने धीरे-धीरे खुद का एक गिरोह बना लिया. 1980 के दशक में वह चंबल के बीहड़ों मे सबसे खतरनाक डाकू मानी जाती थी. 1981 में वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में तब आई, जब उसने ऊंची जातियों के बाइस लोगों को एक साथ गोली मार दी. फूलन देवी की छवि राबिनहुड की थी. उन्हें गरीबों का पैरोकार माना जाता था.

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उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीहड़ों में सक्रिय फूलन देवी को पकड़ने के लिए इन दोनों जगहों की सरकार और प्रतिद्वंदी गिरोहों ने बहुत कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो सके. इस बीच फूलन का नजदीकी साथी विक्रम मल्लाह मारा गया; जिसके बाद फूलन कमजोर पड़ने लगी. उनको डर था कि आत्मसमर्पण करने की स्थिति में पुलिस उनको और उनके साथियों को कहीं मार न दे और उनके परिवार के लोगों और समर्थकों को नुकसान ना पहुंचाए. कांग्रेस की सरकार में उन्होंने मध्य प्रदेश के तात्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की उपस्थिति में 12 फरवरी 1983 को इस समझौते के तहत अपने दर्जन भर समर्थकों के साथ आत्म समर्पण कर दिया कि उनको मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा. उनके आत्म समर्पण के समय उनके हजारों समर्थक मौजूद थे. जेल में रहते हुए ही फूलन देवी ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन हार गई. बिना मुकदमा चलाए फूलन देवी ने 11 साल तक जेल में बिताए. उन पर ‘बैंडीट क्वीन’ नाम से एक फिल्म भी बनी, जिसने उन्हें काफी प्रसिद्धी सहानुभूति दिलाई. अपनी रिहाई के बाद फूलन देवी ने धम्म का रास्ता अपनाते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. उन्होंने एकलव्य सेना का भी गठऩ किया. उन्होंने राजनीति की राह ली और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से सांसद चुनी गईं. वह दो बार सांसद रही.

क्या फूलन ने अपने ही साथ गद्दारी की थी
फूलन की आलोचना भी कम नहीं हुई है. फेसबुक पर फूलन को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है. कोई फूलन को बहुजन नायिका का खिताब देता है कोई उनकी आलोचना करता है. फेसबुक पर शिखा अपराजिता लिखती हैं कि,'फूलन देवी का लिबरलों के बीच सम्मानित होने का कारण यह नहीं है कि उन्होंने विभीत्स बर्बरतम अत्याचार झेला. इसलिए भी नहीं कि एक दलित और एक महिला होने के नाते उन्होंने ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और पितृसत्ता का तिहरा अत्याचार झेला. इसलिए भी नहीं कि उन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला लिया और जो न्याय उन्हें ब्राह्मणवाद और सामंतवाद का संरक्षक भारतीय राज्य कभी नहीं दे सकता था वह न्याय अपने साथ उन्होंने खुद किया. पर ये सब कारण नहीं हैं उनके लिबरल समूह के बीच में सम्मानित होने के.फूलन सम्मानित इसलिए हैं क्योंकि इतना सबकुछ होने बाद वे ब्राह्मणवाद के संरक्षक राज्य का अभिन्न अंग बनी. वे सम्मानित इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने इसके बाद उस मुलायम की पार्टी को चुना जिसके हाथ निहत्थे मज़दूरों के खून से रंगे थे जिन्हें उसकी सरकार ने गोलियों से भून डाला था. फूलन इसलिए सेलिब्रेट की जाती हैं क्योंकि जिन सामंती ताकतों का वह शिकार बनीं , बाद में उन्हीं सामंती ताकतों के पक्ष में काम किया. इसके अलावा बीहड़ में रहते वक्त भी दलित मुक्ति आंदोलन में फूलन का क्या योगदान रहा इसका मुझे कोई इल्म नहीं किसी और को पता हो तो बताए.'

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शिखा के अनुसार,' फूलन जैसी कई अन्य महिलाएं दलित आदिवासी समाज से आती हैं बस्तर में , दंतेवाड़ा में , दंडकारण्य में जो बर्बर सामंती अत्याचार, राजकीय अत्याचार से पीड़ित रही हैं . वे भी बंदूक उठाती हैं, लेकिन उनकी बंदूक का निशाना सिर्फ उनका शोषक व्यक्ति या समूह विशेष नहीं होता, वह पूरा शोषक वर्ग और उन्हें संरक्षण देने वाला राज्य होता है . वे हथियारबंद आदिवासी औरतें जो सलवा जुडूम के अत्याचार, बलात्कार का शिकार रहीं है, वे औरतें लिबरलों की नज़र में "आतंकवादी" हैं , और फूलन की तरह सम्मान की हकदार नहीं.फूलन का रास्ता वहां तक सलाम करने लायक है, जबतक उन्होंने अपने ऊपर हुए अपराध का बदला लिया. लेकिन उसके बाद की यात्रा की बात करें तो फूलन अंततः उन्हीं शत्रुओं की कतार में शामिल हुई, उसी वर्ग की सेवा की जिसने उनके साथ बर्बरता की , अतः न सिर्फ अपने वर्ग के साथ बल्कि खुद अपने साथ भी फूलन देवी ने गद्दारी की.'

'बैंडिट क्वीन' का दिल गरीबों के लिए धड़कता था
डायरेक्टर शेखर कपूर ने फूलन देवी के जीवन पर आधारित मूवी 'बैंडिट क्वीन' भी बनाई थी, जिस पर खुद फूलन ने आपत्ति जताई थी. जिसके बाद कई कट्स के साथ इस फिल्म को रिलीज कर दिया गया. हालांकि बाद में सरकार ने इस फिल्म पर बैन लगा दिया था.चंबल के बीहड़ों से संसद पहुँचने वाली फूलन देवी पर ब्रिटेन में आउटलॉ नाम की एक किताब प्रकाशित हुई है जिसमें उनके जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की गई है. फूलन देवी को मिली जेल की सजा के बारे में पढ़ने के बाद लेखक रॉय मॉक्सहैम ने 1992 में उनसे पत्राचार शुरू किया. जब फूलन देवी ने उनके पत्र का जवाब दिया तो रॉय मॉक्सहैम भारत आए और उन्हें फूलन देवी को करीब से समझा.

फूलन के बगैर अधूरी रहेगी 'विद्रोही स्त्री' की कथा—चर्चा
लेखक रॉय मॉक्सहैम कहते हैं, 'वो फिल्म दिखाती है कि फूलन देवी हत्याओं में शामिल थी, लेकिन उन्होंने हमेशा इस बात से इनकार किया है और मैं उन पर यकीन करता हूँ।'

फूलन देवी की शख्सियत के बारे में वे बताते है दरअसल फूलन का दिल गरीबों के लिए धड़कता था. जब वो जेल में थीं तो इस बात का इंतजाम करवाती थीं कि उनका खाना स्मगल किया जा सके ताकि वो खाना उनके घर के गरीब सदस्यों को मिले.

रॉय मॉक्सहैम कहते हैं कि जेल से रिहा होने के बाद जब फूलन देवी सांसद बन गई तो उनमें अन्य नेताओं वाले कोई नाज नखरे नहीं थे.
एक बार मैं उनके घर गया तो वे अपना फ्लैट खुद साफ कर रही थीं क्योंकि उन्होंने नौकर रखने से इनकार कर दिया था. उनका करिश्माई व्यक्तिव था. एक ऐसी हस्ती जो लोगों का ध्यान खींच सकती थी. वे कहते हैं कि इस बात में कोई शक नहीं कि फूलन देवी एक हीरो थीं.

बीबीसी के साथ बातचीत में लेखक रॉय ने फूलन देवी के साथ अपनी दोस्ती को याद करते हुए कहा था कि उन्होंने जिंदगी में बहुत कुछ सहा, लेकिन इसके बावजूद फूलन देवी बहुत हंसमुख थी. वे हमेशा हंसती रहती थी, मजाक करती रहती थीं. हालांकि उन्होंने अपना बचपन गरीबी में गुजारा. मुझे लगता है कि वे गलत न्यायिक प्रक्रिया का शिकार हुई.

फूलन की प्रशंसा हो या आलोचना लेकिन एक बात तो है वह यह कि फूलन के बगैर इस महादेश भारत की 'विद्रोही स्त्री' की कथा—चर्चा अधूरी रहेगी.
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