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गणेशोत्सव: यहां खूनी गणपति की होती है पूजा, रोचक है इनकी कहानी

गणेशोत्सव: यहां खूनी गणपति की होती है पूजा, रोचक है इनकी कहानी

गणपति उत्सव की धूम

गणपति उत्सव की धूम

महाराष्ट्र के धुलिया में बप्पा खूनी गणपति के रूप में पूजे जा रहे हैं.

    महाराष्ट्र में गणपति उत्सव की धूम है. लोग प्रथम पूज्य गणेश को पूजने के लिए अलग-अलग पंडालों में जा रहे हैं. मंदिरों में दर्शन के लिए लोग घंटों कतारों में खड़े हैं. इस दौरान गणेश के कई रूप देखने को मिल रहे हैं. महाराष्ट्र के औरंगाबाद के एक पंडाल में बप्पा रोबोट के रूप में विराजमान हैं. यहां पूजा के साथ-साथ गणपति का रोबोट रूप देखने के लिए लोग काफी संख्या में पहुंच रहे हैं.

    वहीं महाराष्ट्र के धुलिया में बप्पा खूनी गणपति के रूप में पूजे जा रहे हैं. यहां पर बप्पा की पूजा के लिए हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम भी आते हैं. धुले शहर के जून धुलिया में खूनी गणपति का मंदिर है. लोकमान्य तिलक ने 1894 में पुणे से सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की.

    तिलक से प्रेरणा लेते हुए खांबेटे गुरुजी ने धुले में 1895 में पहला सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाया. जुने धुलिया इलाके के मंदिर में खांबेटे गुरुजी ने गणपति की स्थापना की, जो बाद में खूनी गणपति के नाम से प्रचलित हुआ. खूनी गणपति के नाम का इतिहास भी बड़ा रोमांचक है.

    खूनी गणपति का इतिहास
    ब्रिटिश काल में शुरू हुए इस गणेशोत्सव की यात्रा गाजेबाजे के साथ जुने धुलिया के मंदिर और साई मस्जिद के पास से गुजरती थी. विसर्जन के लिए ले जाने पर कुछ लोगों का विरोध था. ऐसे में एक सितम्‍बर 1895 को अनंत चतुर्दशी के दिन खांबेटे गुरुजी के नेतृत्व में पालकी में गणपति को लेकर लोग विसर्जन के लिए निकले.

    जब मस्जिद के पास से जाने लगे तो कुछ लोगों ने विरोध किया. बात बढ़ती गई और दोनों गुट एक-दूसरे से भिड़ गए. उस वक़्त मौके पर मौजूद अंग्रेज पुलिस कर्मचारियों ने भीड़ पर गोलीबारी की. इसमें कई लोगों की जान गई तो कई घायल हो गए.

    उसी दिन से इन गणपति को खूनी गणपति और उस साई मस्जिद को खूनी मस्जिद के नाम से पुकारा जाने लगा. इस घटना के बाद दोनों गुटों ने अंग्रेज सरकार के सख्‍त रवैये के खिलाफ प्रतिबंधक बिल पास किया. उस दिन से आज तक हर साल हिन्दू मुस्लिम मिलजुलकर गणेशोत्सव मनाते हैं.

    इसमें कोई भी बैंड बाजे का इस्तेमाल नहीं करता. सिर्फ ताल और मृदंग के साथ वारकरी प्रथानुसार निकलने वाली इस यात्रा में मुस्लिम भी ताल पकड़ कर नाचते हैं.

    विसर्जन यात्रा के दिन बप्पा की पालकी खूनी मस्जिद के पास आने के बाद मुस्लिम बड़े उत्साह से पालकी का स्वागत करते हैं. खूनी मस्जिद के सामने ही मुस्लिमों की ओर से आरती की जाती है.

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