सांसदों-विधायकों के खिलाफ बढ़ते मुकदमों की सख्त निगरानी जरूरी: रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में सत्र स्तर के 25 और मजिस्ट्रेट स्तर के 62 मामले लंबित हैं
रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में सत्र स्तर के 25 और मजिस्ट्रेट स्तर के 62 मामले लंबित हैं

रिपोर्ट (Report) के अनुसार, ‘कई अन्य उच्च न्यायालयों (High Courts) ने संबंधित अदालतों के अधिकार क्षेत्र में ही ऐसे मुकदमों की सुनवाई (hearing) प्राथमिकता के आधार पर करने की हिमायत की है. कुछ राज्यों में उच्च न्यायालयों ने विशेष अदालतों के गठन की सिफारिश (Recommendation) की है.’

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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय को सोमवार को सूचित किया गया कि, पिछले दो साल में वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर इनकी प्रगति पर उच्च न्यायालयों द्वारा सख्त निगरानी की आवश्यकता है. ताकि इनका तेजी से निस्तारण हो सके. न्याय-मित्र विजय हंसारिया की शीर्ष अदालत में दाखिल नयी रिपोर्ट के अनुसार इस समय पूर्व और वर्तमान सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की संख्या 4,859 है. जबकि मार्च 2020 में इनकी संख्या 4,442 थी.

इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘मौजूदा कार्यवाही में विधि निर्माताओं के खिलाफ मुकदमों की तेजी से निबटारे के बारे में निगरानी के बावजूद पिछले दो साल में पूर्व और वर्तमान सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की संख्या में वृद्धि हुयी है. इसलिए उच्च न्यायालयों द्वारा इनकी सख्ती से निगरानी की जरूरत है. ताकि इनके खिलाफ मुकदमों का तेजी से निस्तारण हो सके.’

न्याय मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया तथा अधिवक्ता स्नेहा कलिता ने यह रिपोर्ट भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की 2016 से लंबित याचिका में दायर की है. उपाध्याय ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के निबटारे में अप्रत्याशत विलंब की ओर ध्यान आकर्षित करते हुये यह याचिका दायर कर रखी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि, कुछ उच्च न्यायालय ऐसे मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिये प्रत्येक जिले में सत्र और मजिस्ट्रेट स्तर पर विशेष अदालत के गठन के पक्ष में है.




रिपोर्ट के अनुसार, ‘कई अन्य उच्च न्यायालयों ने संबंधित अदालतों के अधिकार क्षेत्र में ही ऐसे मुकदमों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर करने की हिमायत की है. कुछ राज्यों में उच्च न्यायालयों ने विशेष अदालतों के गठन की सिफारिश की है.’ शीर्ष अदालत को न्याय मित्र ने सूचित किया कि सभी उच्च न्यायालयों ने बुनियादी सुविधाओं की कमी और इस मद में धन की अनुपलब्धता की वजह से वीडियो कांफ्रेंस सुविधा के साथ सुरक्षित गवाह परीक्षक केन्द्र बनाने की हिमायत की है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि, केन्द्र ने सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और दूसरी केन्द्रीय एजेन्सियों के समक्ष सांसदों और विधायकों के खिलाफ मुकदमों की स्थिति और उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति के लिये लंबित मामलों के बारे में कोई स्थिति रिपोर्ट पेश नहीं की है.

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में सत्र स्तर के 25 और मजिस्ट्रेट स्तर के 62 मामले लंबित हैं. इनमें धन शोधन रोकथाम कानून, 2002, भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 और इसी तरह के अन्य कानून के तहत मामले हैं. रिपोर्ट में कहा गया है, ‘उच्च न्यायालय चार और विशेष अदालतें गठित करने पर विचार कर रहा है. इनमें सत्र स्तर और मजिस्ट्रेट स्तर की दो दो अदालतें होंगी. इन मुकदमों की सुनवाई की प्रगति की निगरानी के लिये स्वत: याचिका पंजीकृत की गयी है. उच्च न्यायालय की सबंधित पीठ के समक्ष लंबित ऐसे मामलों को सूचीबद्ध करने के निर्देश भी जारी किये जा चुके हैं.’ रिपोर्ट में कहा गया है कि बेंगलुरू में भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत लंबित मामलों सहित 165 मुकदमों की सुनवाई के एक विशेष अदालत पर्याप्त नहीं है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि गवाहों को मुकदमे की सुनवाई में शामिल होने के लिये काफी लंबी यात्रा करनी पड़ती है. इसलिए उच्च न्यायालय को सिर्फ एक अतिरिक्त अदालत बेंगलुरू में स्थापित करने के प्रस्ताव पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया जा सकता है. इसी तरह, पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुये रिपोर्ट में कहा गया है कि, 134 मुकदमों की सुनवाई के लिये बारासात, 24 उत्तर परगना की एक विशेष अदालत पर्याप्त नहीं है और अगर राज्य के दूसरे हिस्सों के मुकदमों को भी जोड़ दिया गया. तो गवाहों के लिये बारासात की यात्रा करना बहुत दुश्वारी का काम होगा.

उत्तर प्रदेश के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि, इलाहाबाद की विशेष अदालत के पास आसपास के 12 जिलों से संबंधित 300 मुकदमे हैं ओर ऐसी स्थिति में एक विशेष अदालत के लिये इनका तेजी से निस्तारण करना संभव नहीं है. रिपोर्ट में कहा गया है, ‘अत: उच्च न्यायालय से इलाहाबाद के आसपास के जिलों में विशेष अदालतें गठित करने का अनुरोध किया गया जाये ताकि इस विशेष अदालत पर मुकदमों का बोझ कम हो सके.’ रिपोर्ट के अनुसार, ‘उच्च न्यायालय ने 85 मामलों में रोक लगा रखी है. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया जाये कि इन मामलों की सुनवाई के लिये विशेष पीठ गठित की जाये. उच्च न्यायालय ने बताया है कि कुछ मामलों में आरोपी दूसरे जिले या राज्य के हैं जिनकी वजह से मुकदमों के तेजी से निबटारे में बाधा आ रही है.’

उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया जाये कि, इन विशेष अदालतों को इलेक्ट्रानिक प्रणाली से सुसज्जित किया जाये ताकि आरोपियों की प्रत्यक्ष उपस्थिति के बगैर ही वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से मुकदमों की तेजी से सुनवाई की जा सके. इसी तरह, पंजाब और हरियाणा में उच्च न्यायालय ने क्रमश: 10 और 8 मुकदमों पर रोक लगा रखी है. हालांकि उच्च न्यायालय की कार्य योजना से पता नहीं चलता है कि, इन मुकदमों को सूचीबद्ध करके तेजी से इनका निस्तारण करने के लिये कदम उठाये गये हैं.
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