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OPINION: आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए ठीक नहीं है पुलिस और वकीलों का ये संघर्ष

News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 3:08 PM IST
OPINION: आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए ठीक नहीं है पुलिस और वकीलों का ये संघर्ष
आपराधिक न्याय प्रणाली के दो अंगों के बीच इस हद तक आरोप प्रत्यारोप होने लगें तो व्यवस्था के लिए इसे अशुभ संकेत माना जाना चाहिए.

पुलिस (Police) और वकीलों (Advocates) के बीच मारपीट कुछ ज्यादा ही बड़ा हादसा बनती जा रही है. दो पक्ष जब भीड़ में तब्दील हो जाएं तो ऐसे हालात बनना लाजिमी है. भीड़ को पहचानना मुश्किल हो जाता है. तीन दिन गुज़र गए लेकिन साफ साफ पता नहीं चला कि आरोपी कौन हैं?

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  • Last Updated: November 6, 2019, 3:08 PM IST
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सुधीर जैन

नई दिल्ली. पुलिस (Police) और वकीलों (Advocates) के बीच मारपीट कुछ ज्यादा ही बड़ा हादसा बनती जा रही है. दो पक्ष जब भीड़ में तब्दील हो जाएं तो ऐसे हालात बनना लाजिमी है. भीड़ को पहचानना मुश्किल हो जाता है. तीन दिन गुज़र गए लेकिन साफ साफ पता नहीं चला कि आरोपी कौन हैं? दोनो ही पक्ष खुद को पीड़ित बता रहे हैं. ऐसे मामलों में अक्सर ऐसा ही होता है. भले ही तरह तरह की जांच कमेटियां (Inquiry Committee)  बनाए जाने का ऐलान हो गया हो लेकिन सामान्य अनुभव यही है कि वक्त गुज़रने के साथ इन मामलों में कानूनी प्रक्रिया (Legal Process) फौरी तौर पर खुद ब खुद ठंडी पड़ जाती है, लेकिन यह घटना अलग तरह की है. आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) के लिए यह वारदात दूर तक असर कर सकती है.

क्या इसे दो प्रोफेशन समुदायों के बीच की झड़प मानें?

बिल्कुल ऐसा मान सकते हैं. देश में पहली बार दिखा है कि पुलिस वालों ने एकजुट होकर एक समुदाय जैसा व्यवहार किया. लोग याद नहीं कर पाए कि कब हजारों पुलिसकर्मियों ने इस तरह से धरना प्रदर्शन किया हो. एक अपवाद सन 1988 की घटना जरूर है लेकिन वह इतनी तीव्र नहीं थी. इसबार की वारदात के दिन वकीलों की इतनी बड़ी भीड़ जमा हुई थी कि न्यायालय परिसर में मौजूद पुलिस वालों को बड़ी संख्या में पुलिस बल का इंतजाम करना पड़ा था. भीड़ कैसी भी हो सामुदायिक तनाव की स्थिति बना ही देती है. समाजशास्त्री अच्छी तरह जानते हैं कि सामुदायिक तनाव का प्रारंभ तो आसान होता है और अंत उतना ही मुश्किल.

देश में पहली बार दिखा कि पुलिस वालों ने एकजुट होकर एक समुदाय जैसा व्यवहार किया.


इकतीस साल पहले पुलिस और वकीलों के तनाव के बाद वकीलों ने पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किए थे, लेकिन तब पुलिस के आला अफसर अपने मातहत पुलिसकर्मियों के साथ थे. आखिर में वकीलों का गुस्सा पुलिस के आला अफसरों पर ही उतरा था. इस बार दोनों समुदाय संगठित होकर भिड़ते दिख रहे हैं.

आपराधिक न्याय प्रणाली के दो अंगों का है मामला
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पुलिस, न्यायालय और जेल को मिलाकर आपराधिक न्याय प्रणाली बनती है. यहां मामला पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच का है सो इसका सीधा असर पूरी प्रणाली पर होना तय है. इसीलिए अदालतों का चिंतित होना स्वाभाविक है. खासतौर पर पुलिसकर्मियों को जिस तीव्रता के साथ एकजुट होने का मौका मिला उसे सनसनीखेज माना जाना चाहिए. स्थिति यह बनी कि पुलिसकर्मियों ने अपने बड़े अधिकारियों के खिलाफ अंसतोष भी जताया. सार्वजनिक रूप से पुलिसकर्मियों के इस असंतोष का आगा पीछा भी देखा जाना चाहिए. बात पुलिस संघों को संगठित और मजबूत बनाने तक पहुंच गई है. उधर वकीलों की संस्था बार कांउसिल ऑफ इंडिया ने भले ही कहा हो कि उनके कुछ सदस्य संस्था की छवि धूमिल कर रहे हैं और इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. बार काउंसिल ने झड़प के दौरान पुलिस के व्यवहार को क्रूर बताया. गौरतलब है कि काउंसिल एक नियामक संस्था है लेकिन उसके पदाधिकारी निर्वाचन प्रणाली से ही बनते हैं. इसीलिए कांउसिल ने वकीलों के संघों से अपील की है वे अपना व्यवहार संयत रखें. बार काउंसिल आरोपी पुलिस कर्मियों पर भी कड़ी कार्रवाई की मांग कर रही है. यानी दोनों पक्ष एक दूसरे को आरोपी बता रहे हैं. आपराधिक न्याय प्रणाली के दो अंगों के बीच इस हद तक आरोप प्रत्यारोप होने लगें तो व्यवस्था के लिए इसे अशुभ संकेत माना जाना चाहिए.

कल्याण संगठनों का रूप न बदल जाए कहीं

आमतौर पर कर्मचारी संगठनों का मुख्य मकसद अपने सदस्यों का कल्याण ही होता है, लेकिन पुलिसकर्मियों के संघ आमतौर पर वैसे संगठन नहीं होते. अब तक चलन यही रहा है कि पुलिसकर्मी अपनी शिकायतें जाहिर करने की ज्यादा छूट नहीं लेते. सैनिकों की तरह वे भी अनुशासित आज्ञाकारी समझे जाते हैं. फौज और पुलिस का काम ही ऐसा है कि उनमें असंतोष पैदा होने की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती. पुलिस वकील कांड से आहत पुलिसकर्मियों ने जिस तरह से अपने शीर्ष अधिकारियों के प्रति असंतोष जताया है वह तात्कालिक रूप से ठंडा भले ही पड़ जाए लेकिन मन में घर कर गया है.

न्याय प्रणाली के अंगों में समन्वय पर गौर करने का वक्त

इस झड़प ने एक और जरूरी सवाल पैदा किया है. क्या हमारे पास आपराधिक न्याय प्रणाली के तीनों अंगों में समन्वय की कोई व्यवस्था है? फिलहाल इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है. हर अंग के पास अपनी अपनी संस्थाएं बेशक हैं. जाहिर है वे अपने अधिकारों और हितों तक सीमित हैं जबकि किसी प्रणाली के सभी अंगों में समन्वय जरूरी होता है. गौरतलब है कि अमेरिका में 1988 में एक आपराधिक न्याय आयोग बनाया गया था. इसका एक मकसद इस तरह के समन्वय के बारे में सोच विचार करना भी था. यानी दिल्ली में पुलिस और वकील के बीच झड़प को कानून व्यवस्था का मामला मानने से काम नहीं चलेगा. झड़प का तात्कालिक रूप जरूर कानून व्यवस्था के अभाव का दिख रहा है लेकिन कोई बात इतनी ज्यादा तभी बिगड़ती है जब पहले से कुछ मसले जमा हों. यानी यह सीधे सीधे समन्वय के अभाव का मामला है जिसके लिए आपराधिक न्याय आयोग या कोई नियामक संस्था बनाने के बारे में सोचा जा सकता है.​

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First published: November 6, 2019, 3:08 PM IST
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