कोरोना वायरस लॉकडाउन से एम्स के बाहर फंसा, अब दाने-दाने को मोहताज कैंसर से जूझती महिला का पति

कोरोना वायरस लॉकडाउन से एम्स के बाहर फंसा, अब दाने-दाने को मोहताज कैंसर से जूझती महिला का पति
एम्स के बाहर फुटपाथ पर रह रहे लोग

AIIMS में इलाज कराने आए मान सिंह कोरोना वायरस (Coronavirus) को लेकर हुए लॉकडाउन के चलते यहीं फंस गए. दरअसल 24 मार्च को पीएम ने लॉकडाउन की घोषणा कर दी. ऐसे में ये अपने गांव नहीं लौट पाए.

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  • Last Updated: March 29, 2020, 2:58 PM IST
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(सुहास मुंशी)

नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus) को लेकर लॉकडाउन के दौरान दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के बाहर इलाज कराने आए लोगों की भारी भीड़ लगी है. यहां कई लोग लॉकडाउन के चलते फंस गए. गेट नंबर एक के बाहर फुटपाथ पर हमारी मुलाकात मान सिंह से हुई. साल 2019 में जब उनकी पत्नी बीमार हुईं तो वो इलाज के लिए बरेली में कई जगह गए. इस चलते सारा पैसा खत्म हो गया, लेकिन वो ठीक नहीं हुईं. नवंबर में वह पत्नी को लेकर दिल्ली के एम्स आ गए. यहां उनके जैसे कई लोग हैं, जो दो वक्त के खाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं.

'एक-एक टुकड़े के लिए तरस रहे हैं'
अपनी पत्नी से मिलाने वो हमें पास के सबवे में ले गए. वहां उन्होंने अपनी पत्नी सुमन देवी से मिलाया. पिछले 72 घंटों में उन्हें ठीक से खाना नहीं मिला है. वह उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से इलाज कराने के लिए यहां पहुंचे हैं. मान सिंह ने कहा, 'देखिए चारों तरफ अन्न के भंडार हैं. ऐसे भी लोग हैं जिनके पास खाने को तो बहुत कुछ है, लेकिन मैं किसान हूं जिसे लोग अन्नदाता कहते हैं, लेकिन हम आज एक-एक दाने के लिए तरस रहे हैं.'



लॉकडाउन में ऐसे फंसे


एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में उनकी पत्नी का तीन महीने तक इलाज  किया गया, जहां से उन्हें कैंसर वार्ड में ट्रांसफर कर दिया गया. उनकी पत्नी को पैनक्रिएटिक कैंसर है. ये बेहद खतरनाक है. इस कैंसर से ग्रसित 95 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है. सिंह की पत्नी को 19 मार्च को कुछ दवा दी गई और एक महीने बाद लौटने को कहा गया. उन्होंने सोचा कि दवा शुरू करने के तुरंत बाद उन्हें वापस नहीं जाना चाहिए. लिहाजा इन्होंने पास के पुटपाथ पर एक हफ्ते के लिए लिए रहने का फैसला किया, लेकिन 24 मार्च को पीएम ने लॉकडाउन की घोषणा कर दी. ऐसे में ये अपने गांव नहीं लौट पाए. उन्होंने कहा, 'हमे अगर दो दिन पहले लॉकडाउन के बारे में पता चल जाता तो हम वापस गांव लौट जाते. फुटपाथ पर मरने से अच्छा है कि इंसान अपने घर पर किसी बीमारी से मरे'.

'भूख से मर रहे लोग'
सिंह कहते हैं कि एक सिख व्यक्ति हर दिन सुबह चार बजे आता था और खाना बांटता था. उन्होंने कहा, 'वो हमें जगाता था और हमें खाना इकट्ठा करने के लिए कहता था. छोटे बच्चों वाले माता-पिता के लिए वो दूध, बॉर्नविटा भी देता था. लेकिन अब पुलिस उसे यहां खाना बांटने की अनुमति नहीं दे रही है. इसलिए सैकड़ों लोग भूख से मर रहे हैं, '

दर-दर भटक रहे हैं लोग
सिंह की तरह कई और लोग भी इलाज कराने के लिए एम्स आए थे, लेकिन वो सब फंस गए हैं. बिहार के बांका जिले के दिहाड़ी मजदूरी करने वाली जया देवी, उनके पति और बच्चा भी फंसा है. यहां वो अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए पहुंचे हैं. उनके बच्चे के दिल में छेद है. उन्होंने कहा, 'हमने तीन चार दिनों से कुछ नहीं खाया है. कैंटीन में 40 रुपये का खाना मिलता है. हमारे सारे पैसे खत्म हो गए हैं.'

ये एम्स में इलाज कराने आए एक-दो लोगों का हाल नहीं है, बल्कि कई लोग खाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. लेकिन ठीक तरीके से दो वक्त का खाना इन्हें नसीब नहीं हो रहा है.

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