OPINION: परीक्षा पर चर्चा यानी परीक्षा के तनाव-तंत्र से परिचय

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में परीक्षा पे चर्चा करते पीएम मोदी.

परीक्षा पे चर्चा (Pariksha pe Charcha) के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) बच्चों के संवेदनशील मन-मष्तिष्क पर वे यह प्रभाव डालने में अपेक्षा से भी अधिक सफल रहे कि राष्ट्र भावी पीढ़ी की हर प्रकार की देखभाल करने में पीछे नहीं रहेगा.

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बचपन में परीक्षा का अर्थ केवल एक ही होता है, स्कूल में आयोजित परीक्षा उत्तीर्ण करना और अधिकाधिक अंक लाना! अन्य परीक्षाओं और जीवन भर कई तरह की परीक्षाओं से गुजरने की अनिवार्यता तो धीरे-धीरे ही समझ में आती है. स्कूलों में परीक्षाओं-विशेषकर बोर्ड परीक्षाओं को लेकर बच्चों में जो तनाव पैदा होता है. उससे उन्हें बचाना केवल माता-पिता और शिक्षा व्यवस्था का ही नहीं राष्ट्र का भी उत्तरदायित्व है.

जब प्रधानमंत्री देश के बच्चों से 'परीक्षा पर चर्चा' करने के लिए समय निकालते हैं और देश को संबोधित करते हैं, तब ये उत्तरदायित्व बोध सभी के सामने उभरता है. पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) हर स्तर पर संवाद द्वारा जो अपनत्व और संवेदनात्मक लगाव स्थापित कर लेते हैं, वह अद्भुत है. इसी से उनकी वैश्विक स्वीकार्यता स्थापित हुई है. 20 जनवरी को 'परीक्षा पर चर्चा' में पीएम मोदी बच्चों के घर के सदस्य बन गए, उनके सामने बैठने वाले बच्चों और देश/विदेश में इस कार्यक्रम का लाइव टेलीकास्ट देखने वालों में किसी को भी इसमें कोई कृत्रिमता नहीं दिखाई दी.

पीएम मोदी के शब्दों में अपनत्व और ममत्व का अविरल-निर्मल प्रवाह सभी को दिखाई देता रहा. बच्चों के संवेदनशील मन-मष्तिष्क पर वे यह प्रभाव डालने में अपेक्षा से भी अधिक सफल रहे कि राष्ट्र भावी पीढ़ी की हर प्रकार की देखभाल करने में पीछे नहीं रहेगा. देश को अपने भावी कर्णधार प्रिय हैं और सारा देश चाहता है कि उनका बचपन का आनंदपूर्वक आगे बढ़ें.


पीएम मोदी हर प्रकार के तनाव या दबाव से सदा मुक्त रहे हैं. उनके साथ संवाद में बच्चों ने जाना कि मेरा परिवार ही नहीं, बल्कि सारा देश मेरे साथ खड़ा है. मुझ पर विश्वास रखता है, मेरी हर समस्या के समाधान के लिए प्रयासरत है. प्रधानमंत्री ने सरलता से परिपूर्ण होकर बच्चों के सामने एक विशाल राष्ट्र और अनगिनत संभावनाओं का आकाश उजागर कर हर बच्चे को जीवन में कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित कर दिया. देश के करोड़ों बच्चों को उनसे इस प्रकार जुड़ना जीवन भर याद रहेगा. उनके विचार अनगिनत लोगों को जीवनभर प्रेरणा भी प्रदान करते रहेंगे.



इस चर्चा में 'परीक्षा के तनाव' से उबरने के समाधान की संभावना भी पूरी तरह से उभरी. इसके लिए पहली आवश्यकता है कि अध्यापक, अभिभावक और बच्चे आपस में सहजता से बात कर सके. बच्चे जो कहना चाहें, बिना किसी हिचक के कह सकें. ऐसा माहौल मिलना चाहिए. घर के वातावरण में पारस्परिकता हर समय हर एक के व्यवहार में लगातार परिलक्षित होती रहे. साथ ही माता-पिता बच्चों पर किसी तरह का दबाव न डालें. वे बच्चे की रुचि समझें और उसके हिसाब से ही काम करें.

परीक्षा पे चर्चा के दौरान पीएम मोदी.
परीक्षा पे चर्चा के दौरान पीएम मोदी.


इस संवाद में एक छात्र ने बड़ा ही सीधा और सरल सा सवाल किया. ये सवाल था 'परीक्षा भवन में जाने के पहले लगता है कि कुछ भी याद नहीं है'. इस पर प्रधानमंत्री ने जो उत्तर दिया, वह घर के दादाजी का उत्तर था: टेनिस का खिलाडी मैदान पर मैच शुरू होने के पहले अकेले ही रैकेट को हवा में चलाता है, या क्रिकेट का नामी-गिरामी खिलाड़ी क्रीज़ पर पहुंचने के पहले हवा में खाली शॉट लगाने की कोशिश करता है. ऐसा करके वह खिलाड़ी भी तनाव से मुक्ति पा रहा होता है. ऐसा उत्तर इसे देने वाले और सुनने वाले के बीच व्यक्तिगंत संबंधों की डोर बांध देता है. पीएम मोदी ने वही किया.

बच्चों का मनोबल बढाने के लिए चंद्रयान का उदाहरण सबसे सटीक और अविस्मर्णीय था. असफलता तो सफलता के मार्ग पर बढ़ने के लिए उठाया गया अगला कदम ही होती है. वह सीखने का अवसर होती है.


जब मोदी जी को सुझाया गया कि वे चंद्रयान की लॉन्चिंग देखने न जाएं, क्योंकि अगर ये असफल हो गया, तो उस अवांछनीय स्थिति में देश के प्रधानमंत्री की उपस्थिति सही नहीं मानी जाएगी. इसका जिक्र करते हुए पीएम ने छात्रों से कहा कि इसीलिए तो उनका वहां जाना अति आवश्यक था. असफलता मिली मगर; उन्होंने अगले कुछ घंटों में वैज्ञानिकों का ही नहीं, देश का मनोबल पुनः स्थापित कर दिया.
यह एक अप्रतिम उदाहरण था, जिससे हर माता-पिता को उन अवसरों पर प्रेरणा मिलेगी, जब बच्चे किसी भी कारण से निराश हों.

परिवार का उत्तरदायित्व बनता है कि शीघ्रातिशीघ्र उन्हें उस स्थिति से निकाला जाय. उनका मनोबल बढ़ा दिया जाय. इस समय कई परिवारों में माता-पिता बच्चों द्वारा मोबाइल या कंप्यूटर पर अधिक समय देने के कारण चिंतित रहते हैं. कई बार वे भूल जाते हैं कि बदलते समय का प्रभाव उन पर भी पड़ा है और वे स्वयं भी वैसा ही कर रहे होते हैं, जो समय बच्चों और परिवार को देना होता है, वह स्क्रीन पर व्यतीत होता है.

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दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुआ परीक्षा पे चर्चा का आयोजन.



यह बच्चों की ही नहीं, एक पारिवारिक समस्या बन गई है. ऐसे में यह कितना प्यारा सुझाव है कि एक कमरा या जगह कुछ घंटे के लिए तकनीकी-मुक्त निर्धारित हों. इस दौरान न फोन या मैसेज किया जाये, ना रिसीव किया जाए. यहां तक कि टीवी भी बंद रहे. ऐसा लगेगा कि पुराने दिन वापस आ गए हैं, जो हर कोई सदा चाहता है!


बोर्ड परीक्षा के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं का तनाव भी लगातार बढ़ रहा है. इनकी तैयारी के लिए माता-पिता बच्चों के लिए न सिर्फ कई ट्यूशन लगाते हैं, बल्कि अन्य शहरों में कोचिंग संस्थाओं में भेज देते हैं. कोचिंग में मुनाफा कमाने वाले लोग ही मिलते हैं. यहां बच्चों के मनोविज्ञान को जानने-समझने को कोई महत्व नहीं दिया जाता है. वहां जो तनाव बढ़ता है, वह कई आत्महत्याओं का कारण बनता है.

एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि देश में औसतन हर घंटे में एक छात्र आत्महत्या करता है. हर संवेदनशील व्यक्ति ऐसी किसी भी घटना की जानकारी पाकर आहत होता है. प्रधानमंत्री की परीक्षा पर चर्चा इसी सामूहिक संवेदना की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति भी मानी जानी चाहिए. हर व्यक्ति को प्रयास करना चाहिए कि यह स्थिति शीघ्र बदले. हर बच्चे का नैसर्गिक अधिकार है कि उसे घर में ही नहीं, बल्कि आस-पास के लोगों का प्यार और अपनत्व मिलता रहे.

कितना अच्छा होगा अगर अगले साल 'परीक्षा की चर्चा' में बच्चे कह सके कि नई शिक्षा नीति ने परीक्षा पद्धति में महत्वपूर्ण सुधार कर के उसे तनाव-मुक्त बना दिया है.

(प्रोफेसर राजपूत शिक्षा व सामजिक सद्भाव के क्षेत्र में कार्यरत हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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