नेतृत्व के संकट से जूझती कांग्रेस, दूसरों के सहारे सियासी संघर्ष चलाने से नहीं चलेगा काम

आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने रविवार को राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और कांग्रेस पर बिहार चुनाव में हार का ठीकरा फोड़ा था.
आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने रविवार को राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और कांग्रेस पर बिहार चुनाव में हार का ठीकरा फोड़ा था.

कांग्रेस (Congress) में नए पूर्णकालिक अध्यक्ष पद के लिए जनवरी 2021 में चुनाव होने हैं. राहुल गांधी को शीर्ष पद पर आसीन होने के लिए दोबारा से तैयार किया जाएगा, लेकिन पार्टी की मौजूदा हालत को देखते हुए भीतर के कुछ लोग यह सोचने लगे हैं कि क्या ऐसा करना उचित होगा? क्या राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को दोबारा से ये जिम्मेदारी मिलनी चाहिए या किसी और पर भरोसा करना चाहिए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 16, 2020, 9:32 PM IST
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(पल्लवी घोष)

नई दिल्ली. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) में एनडीए के हाथों मिली हार के बाद महागठबंधन (Mahagathbandhan) की प्रमुख पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की कांग्रेस (Congress) को लेकर पहली प्रतिक्रिया आई है. आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने रविवार को राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और कांग्रेस पर बिहार चुनाव में हार का ठीकरा फोड़ा था. उन्होंने हार के लिए सीधे-सीधे कांग्रेस और राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया. तिवारी ने कहा था, 'कांग्रेस जिस तरह से चुनाव लड़ रही है, उससे बीजेपी को ही फायदा पहुंचा रही है. पार्टी ने 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 70 रैलियां भी नहीं की. जो लोग बिहार को जानते नहीं थे, उनके हाथ में प्रचार की कमान थी. राहुल गांधी तीन दिन के लिए आए, जबकि प्रियंका गांधी तो आईं भी नहीं. चुनाव के वक्त तो राहुल गांधी शिमला में पिकनिक कर रहे थे. क्या कोई पार्टी ऐसे चलती है?'

आरजेडी नेता के इस बयान के बाद बीजेपी का रिएक्शन भी तुरंत आ गया. 2019 के आम चुनाव में अमेठी से राहुल गांधी को हराने वाली केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने ट्वीट किया, 'जब कुछ लोगों के लिए राजनीति पैंट, शर्ट और पिकनिक में होती है.'




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इन सबके बीच कांग्रेस के सामने दुविधा यह है कि आरजेडी ने जो बात कही है, उसके प्रति पार्टी कैसी प्रतिक्रिया दे, लेकिन शिवानंद तिवारी ने जो कहा है, उससे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों की चिंता जरूर बढ़ा दी है. सहयोगी दल ये समझने लगे हैं कि कांग्रेस में अब वो आग नहीं रह गई है. राहुल गांधी के एकमात्र स्टार प्रचारक होने का मतलब है कि पार्टी के पास आगे ऑप्शन खत्म हो गए हैं या हो रहे हैं.


कांग्रेस में नए पूर्णकालिक अध्यक्ष पद के लिए जनवरी 2021 में चुनाव होने हैं. राहुल गांधी को शीर्ष पद पर आसीन होने के लिए दोबारा से तैयार किया जाएगा, लेकिन पार्टी की मौजूदा हालत को देखते हुए भीतर के कुछ लोग यह सोचने लगे हैं कि क्या ऐसा करना उचित होगा? क्या राहुल गांधी को दोबारा से ये जिम्मेदारी मिलनी चाहिए या किसी और पर भरोसा करना चाहिए.


अब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अगले कुछ महीने में विधानसभा चुनाव हैं. पहले बंगाल में चुनाव होंगे. एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस को किसी भी क्षेत्रीय पार्टी के लिए दूसरे या तीसरे ऑप्शन के तौर पर नहीं देखा जाएगा. यह तथ्य यह है कि कांग्रेस पार्टी लेफ्ट के साथ हाथ मिलाकर लेफ्ट के लिए ही वोट कटुआ बन जाएगी.

कांग्रेस के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि उसकी असली प्रतिद्वंदी कौन है? जाहिर तौर पर ये बीजेपी ही है. ये केवल दो राष्ट्रीय दल हैं. वैचारिक स्पेक्ट्रम के विपरीत छोर पर दोनों खड़े हैं और इस अर्थ में एक दूसरे के लिए एक विकल्प प्रदान करते हैं.


मुश्किल ये है कि कांग्रेस अभी तक अपने राज्य संगठनों में लड़ाई के लिए तैयार नहीं है. बंगाल में अधीर रंजन चौधरी को छोड़कर किसी भी अन्य नेता को राज्य में मान्यता प्राप्त नहीं है. पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष के तौर पर अधीर रंजन की नियुक्ति ने टीएमसी सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को और अधिक नाराज कर दिया है. अधीर भी मुर्शिदाबाद बेल्ट से आते हैं, जिसमें मुस्लिम आबादी बहुत अधिक है और ओवैसी उनके लिए एक चेतावनी बन सकते हैं.

ऐसे में नाराज ममता बनर्जी के पास अपने गढ़ में अधीर रंजन चौधरी को कुचलने का कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि इससे सीधे तौर पर बीजेपी को ही फायदा होगा. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा, 'राजनीति में कई बार न होते हुए प्रतिद्वंद्वी दिखना महत्वपूर्ण होता है.' बंगाल में बीजेपी की यही स्ट्रैटजी हो सकती है.

अब बात तमिलनाडु की. यहां मुट्ठी भर सांसदों को छोड़कर कांग्रेस ने एक मजबूत संगठन बनाने की भी जहमत नहीं उठाई. अंदरूनी लड़ाई और ईगो ने प्रदेश कांग्रेस कमिटी को प्रभावित किया है. डीएमके को इसका भरोसा भी नहीं है कि कांग्रेस उसके लिए मददगार साबित हो सकती है. ऐसी भी संभावना है कि राज्य के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जितनी सीटों की मांग करेगी, डीएमके उतनी सीटें देने के लिए तैयार भी न हो. वास्तव में कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि डीएमके अगले साल होने वाले चुनावों में कांग्रेस से दूरी बना सकती है.


कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा, 'दो राज्य के चुनावों से हटकर देखें तो कांग्रेस में अभी सबसे बड़ा मुद्दा नेतृत्व को लेकर है. राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने से हमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन फिर उन्हें 24x7 राजनेता बनना होगा. एक्सपोजर बहुत जरूरी है.'

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इसी साल अगस्त में 23 कांग्रेस नेताओं के एक समूह ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर नेतृत्व की स्पष्टता के लिए कहा था. इन नेताओं ने कांग्रेस संगठन में सुधार के लिए कुछ बदलाव भी सुझाए थे, लेकिन राहुल गांधी ने इन्हीं नेताओं को पार्टी का गद्दार तक कह दिया था, चिट्ठी लिखने वालों में कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद का नाम भी शामिल था. उन्होंने यह भी मांग की थी कि जल्द ही कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक आयोजित की जाए और चुनावों की घोषणा की जाए. इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है, लेकिन भविष्य अभी भी अनिश्चित है.

राहुल गांधी के रैवेये को लेकर हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी किताब में जिक्र किया था. ओबामा ने अपने संस्मरण 'ए प्रॉमिस्ड लैंड' में राहुल गांधी को नर्वस बताया था. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी में एक ऐसे 'घबराए' हुए और अनगढ़ छात्र के गुण हैं, जिसने अपना पूरा पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है और वह अपने शिक्षक को प्रभावित करने की चाहत रखता है, लेकिन उसमें 'विषय' में महारत हासिल करने की योग्यता या फिर जूनून की कमी है. संस्मरण में ओबामा ने राहुल की मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का भी जिक्र किया था.


इसपर भी बहस छिड़ी है. इन सबके बीच कांग्रेस अब ऐसे मोड़ पर आ गई है, जहां से रानीतिक सक्रियता को अगर नहीं बढ़ाया, तो जो थोड़ी-बहुत उम्मीद बची है वो भी खत्म हो जाएगी. आप राजनीतिक सक्रियता का आउटसोर्स नहीं कर सकते. यूपीए के दिनों में सोनिया गांधी ने इसे अपने करीबी समूह को आउटसोर्स कर दिया था, लेकिन तब भी उन्होंने पार्टी को मजबूती से चलाया. इसस पार्टी को राष्ट्रीय चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत मिली. दुर्भाग्य से, न तो राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा के पास अभी तक यह उपलब्धि है. जब तक ऐसा नहीं होगा, कांग्रेस दोबारा से अपनी खोई हुई ऊंचाई वापस नहीं पा सकती.
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