Opinion: 5 राज्यों में सरकार बनने के बावजूद कांग्रेस को ज़ीरो से शुरू करना होगा

5 साल में 5 राज्यों में कांग्रेस का हाथ मजबूत होता दिखाई दिया
5 साल में 5 राज्यों में कांग्रेस का हाथ मजबूत होता दिखाई दिया

ऐसे में गरम मुद्दों से 'हाथ' जलाने की बजाए कांग्रेस को ये सोचना होगा कि झारखंड में जनता से कनेक्ट होने का फॉर्मूला अब दिल्ली विधानसभा चुनाव में कैसे सफल हो?

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 31, 2019, 10:23 AM IST
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साल 2019 कांग्रेस के नाम पर लोकसभा चुनाव की बड़ी हार तो दर्ज़ करा गया लेकिन जाते-जाते उसे पांच राज्यों की सत्ता का तोहफा भी जरूर दे गया. लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को सीधे मुकाबले में हराया. उसके बाद महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के बूते बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया. बीजेपी के लिए टीस की बात ये है कि झारखंड में इस बार 2 फीसदी ज्यादा वोट मिलने के बावजूद उसकी सीटें कम हो गई तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद सरकार नहीं बन पाई. लेकिन बदलती परिस्थितियों से देश की 135 साल पुरानी कांग्रेस को लेकर ये सवाल है कि क्या उसके 'अच्छे दिन' फिर लौटने की राह पर हैं?

झारखंड में जेएमएम के साथ सरकार बनने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है
झारखंड में जेएमएम के साथ सरकार बनने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है


झारखंड बनने के बाद कांग्रेस ने पहली बार इतना शानदार प्रदर्शन किया. कांग्रेस ने पहली बार झारखंड चुनाव में 16 सीटें जीतीं. जबकि साल 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने केवल 6 सीटें जीती थीं. पांच साल में कांग्रेस को 10 सीटों का फायदा हुआ. साल 2005 में कांग्रेस ने 9 और 2009 के विधानसभा चुनाव में 14 सीटें जीती थीं. इसके अलावा झारखंड में कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी बढ़ा जो कि 11 फीसदी से बढ़कर 13.77 फीसदी तक पहुंच गया.



कांग्रेस ने परंपरागत तरीके से चुनाव लड़ा. अपनी रणनीति में सिर्फ ये बदलाव किया कि राज्यों के नेताओं ने राष्ट्रीय मुद्दों पर पीएम मोदी से टकराने की गलती नहीं की. कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने पीएम मोदी और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाला. जबकि झारखंड में स्थानीय नेता स्थानीय मुद्दों पर स्थानीय सरकार को घेरते रहे. वहीं बीजेपी क्षेत्रीय चुनाव में राम मंदिर, सीएए, एनआरसी और अनुच्छेद 370 को मुद्दा बनाती रही. ऐसे में जेएमएम और कांग्रेस स्थानीय मुद्दों की वजह से स्थानीय जनता से आसानी से कनेक्ट हो सकी और जनता पर राष्ट्रीय मुद्दे अपनी छाप छोड़ने में कामयाब नहीं रहे.
लोकसभा चुनाव से पहले 3 राज्यों में मिली थी जीत
लोकसभा चुनाव से पहले 3 राज्यों में मिली थी जीत


अगर मुख्यमंत्री रघुवर दास राम मंदिर निर्माण की घोषणा चुनावी मंच से कर रहे थे तो जेएमएम नेता हेमंत सोरेन भूख से हुई कथित मौतों पर सवाल उठा रहे थे. अगर रघुवर दास ज़मीन संबंधी कानूनों में संशोधन की कोशिश कर रहे थे तो कांग्रेस उन पर आदिवासियों का जल-ज़मीन-जंगल छीनने का आरोप लगा रही थी. अगर चुनावी रैलियों में बीजेपी एनआरसी और सीएए की बात कर रही थी तो महागठबंधन मॉब लिंचिंग का मुद्दा उठा रहा था. मुद्दों का विरोधाभास ही झारखंड की जंग में जेएएम और कांग्रेस को मजबूत ज़मीन दे गया. लेकिन इसका कतई ये मतलब नहीं कि कांग्रेस ने अपनी संगठनात्मक कमज़ोरियों को दूर करने काम झारखंड से शुरू कर दिया है.

कांग्रेस फिलहाल क्षेत्रीय पार्टियों की बैसाखी पर सवार हो कर अपने वजूद की निर्णायक लड़ाई लड़ रही है. ये वही क्षेत्रीय दल हैं जिन्हें किसी वक्त कांग्रेस ने अपने इस्तेमाल के लिए तैयार किया था. बाद में इन्हीं क्षेत्रीय दलों ने यूपी, बिहार, दक्षिण और महाराष्ट्र से कांग्रेस का वोटबैंक लूटने का काम किया.

कांग्रेस मजबूत हुई लेकिन बीजेपी की बादशाहत बरकरार है
कांग्रेस मजबूत हुई लेकिन बीजेपी की बादशाहत बरकरार है


साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार की जिम्मेदारी लेते हुए जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा  दिया था तो उनके इस्तीफे के बाद अध्यक्ष पद को लेकर चली लंबी खामोश कवायद से लगा कि मानो डूबते जहाज का कैप्टन बनने के लिए कोई तैयार नहीं है. हार को लेकर आरोप-प्रत्यारोप के दौर में कांग्रेस के भीतर की कमज़ोरी कलह के रूप में सामने आ रही थी. कांग्रेस के भीतर हार को लेकर हाहाकार नहीं मचा था बल्कि उसके भीतर पसरा सन्नाटा उसके वजूद पर सवालिया निशान लगा रहा था. सौ साल पुरानी कांग्रेस गैर-गांधी परिवार से किसी अध्यक्ष की राह ताकती रह गई. आखिरकार सोनिया गांधी को दोबारा कमान संभालनी पड़ी. लेकिन उसके बाद भी कांग्रेस से चुनाव के वक्त पलायन का दौर थमा नहीं. महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पुराने नेताओं ने जमकर ‘हाथ’ झटका और बदले में कमल का फूल थामा.

पूर्व कांग्रेसियों का ये बर्ताव कांग्रेस का मनोबल गिराने के लिए काफी था. लेकिन नतीजों की परवाह से परे कांग्रेस ने क्षेत्रीय चुनावों में ज़ोर लगाया. जिन राज्यों में कांग्रेस मजबूत हुआ करती थी वहां फिर से उसने खड़ा होना शुरू किया. हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा कांग्रेस को सत्ता तक ले ही आए थे. बस कांग्रेस हाईकमान से ही उन्हें टीम की कमान सौंपने में कुछ देर हो गई. इसी तरह महाराष्ट्र में तमाम हमलों के बावजूद कांग्रेस शिवसेना के साथ गठबंधन की सरकार बनाने में मुख्य भूमिका में रही.

झारखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पहली बार 16 सीटें मिलीं
झारखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पहली बार 16 सीटें मिलीं


अब महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस गठबंधन की सरकार का हिस्सा है जबकि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी अपनी सरकार है. कांग्रेस के लिए ये बड़ी उपलब्धि है लेकिन राज्यों को जीतने के बावजूद कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी के पुराने वजूद को हासिल करने के लिए लंबी दूरी तय करनी है क्योंकि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव जीतने के बावजूद लोकसभा में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. ऐसे में यहां महाराष्ट्र और झारखंड में सत्ता परिवर्तन को समझने की जरूरत है ताकि कांग्रेस किसी गलतफहमी का शिकार न हो.

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी के सरकार न बना पाने के लिए शिवसेना और शरद पवार जिम्मेदार हैं. शिवसेना गठबंधन से अलग हो गई तो शरद पवार ने कांग्रेस को साथ लाकर सरकार बनाने का मौका गंवाया नहीं. जिस तरह से शिवसेना के पाला बदलने को बीजेपी की हार नहीं माना जा सकता उसी तरह झारखंड में रघुवर दास पर दोबारा चला दांव उल्टा साबित होने पर राज्यों से बीजेपी की ताकत को खारिज़ नहीं किया जा सकता है. न ही इस हार को पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की लोकप्रियता या रणनीति से जोड़ कर देखा जा सकता है. पांच साल किसी भी क्षेत्र के मुख्यमंत्री के लिए अपनी निजी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए काफी होते हैं. मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ रमन सिंह की सरकारें पूर्व में ये साबित कर चुकी हैं. इसी तरह हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर ने भी अपने नाम और काम को साबित करने का काम किया लेकिन रघुवर दास अपनी छवि के चलते आदिवासियों को लुभा नहीं सके.

झारखंड में कांग्रेस का इस बार चुनाव में वोट प्रतिशत बढ़ा
झारखंड में कांग्रेस का इस बार चुनाव में वोट प्रतिशत बढ़ा


कांग्रेस में नेहरू-इंदिरा और राजीव के दौर में दूसरी पंक्ति में ऐसे कद्दावर नेता मौजूद रहे जो कांग्रेस को मुसीबत से निकालने में माहिर थे. उन चेहरों की जनता में लोकप्रियता और विश्वसनीयता थी. लेकिन मौजूदा कांग्रेस में गांधी परिवार से बाहर कोई ऐसा चेहरा नहीं तैयार हो सका जो अपने दम पर किसी राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी करा सके. इसकी बड़ी वजह ये भी है कि बड़े नेताओं को उभरने का मौका ही नहीं मिल सका. हालांकि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा अपवाद हैं जिन्होंने क्षेत्रीय पार्टियों के वर्चस्व के बावजूद कांग्रेस की ताकत को बरकरार रखा. लेकिन चुनाव में इन चेहरों को भी जीत के लिए गांधी-परिवार के प्रचार की जरूरत पड़ती है.

कांग्रेस के लिए ये कहना ठीक होगा कि उसे विपक्ष की भूमिका निभाना नहीं आता है क्योंकि विपक्ष में बैठने का उसका लंबा इतिहास नहीं रहा. ऐसे में कांग्रेस को खुद को पुनर्जीवित करने के लिए एक आंदोलन की जरूरत है. जब तक कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में एक नई धारा तैयार नहीं करती तबतक एनआरसी या सीएए जैसे मुद्दों पर बवाल कर वो सिर्फ अपना सियासी नुकसान कर रही है.

बीजेपी लगातार देश को ये समझाने में जुटी हुई है कि एनपीआर, एआरसी और सीएए की बुनियाद कांग्रेस ने रखी है और उसने केवल उन प्रस्तावों को आगे बढ़ाया है. ऐसे में गरम मुद्दों से हाथ जलाने की बजाए कांग्रेस को ये सोचना होगा कि झारखंड में जनता से कनेक्ट होने का फॉर्मूला अब दिल्ली विधानसभा चुनाव में कैसे सफल हो?
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