ऑपरेशन ब्लैक थंडर ने दिलाया था के पी एस गिल को सुपरकॉप का दर्जा

सरदार कंवर पाल सिंह गिल यानि के.पी.एस. गिल के निधन के साथ ही भारतीय पुलिस के इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो गया.


Updated: May 26, 2017, 11:43 PM IST
ऑपरेशन ब्लैक थंडर ने दिलाया था के पी एस गिल को सुपरकॉप का दर्जा
सरदार कंवर पाल सिंह गिल यानि के.पी.एस. गिल के निधन के साथ ही भारतीय पुलिस के इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो गया.

Updated: May 26, 2017, 11:43 PM IST
सरदार कंवर पाल सिंह गिल यानि के.पी.एस. गिल के निधन के साथ ही भारतीय पुलिस के इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो गया. 'सुपरकॉप' गिल का जीवन चुनौतियों और उतार चढ़ाव से भरा था. उनके जीवन से उपलब्धियां और विवाद एक साथ जुड़े रहे.

वर्ष 1995 में रिटायर होने से पहले उनके नाम जो सबसे बड़ी उपलब्धि रही, वो थी पंजाब में आंतकवाद के सफाए में उनकी भूमिका. बेशक इस दौरान गिल समेत पंजाब पुलिस पर आंतकवाद के सफाए के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन और फर्जी मुठभेड़ जैसे इल्जाम भी लगे.



'सुपरकॉप' गिल के जिक्र के बगैर अधूरा रहेगा भारतीय पुलिस का इतिहास

गिल 1957 आईपीएस बैच में असम पुलिस के अफसर थे.गिल को असम-मेघालय काडर मिला था. गिल का इस बारे में कहना था कि उन्होंने स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए असम-मेघालय काडर चुना. अगर वो अपने गृह राज्य पंजाब को चुनते तो राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से स्वतंत्र रूप से काम करना संभव नहीं हो पाता.

गिल की 28 बरस तक तैनाती पूर्वोतर राज्यों में रही. इसके बाद वो पंजाब में प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए थे.पूर्वोतर राज्यों में तैनाती के दौरान वो किसी न किसी विवाद में जुड़े ही रहे.असम में जब वो पुलिस महानिदेशक थे तब एक प्रदर्शन के दौरान उन्होनें प्रदर्शनकारी को 'प्रताड़ित' किया था, बाद में इस प्रदर्शनकारी की मृत्यु हो गई और गिल पर केस चला. हालांकि, इस मामले में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट ने बरी कर दिया था.असम के कामरूप जिले में उनकी कठोर नीतियों की वजह से केपीएस गिल को 'कामरूप पुलिस सुपरिटेंडेंट गिल' कहा जाता था.

पंजाब के लुधियाना में पैदा हुए के.पी.एस.गिल दो बार पंजाब के पुलिस महानिदेशक बने.वर्ष 1988 से 1995 तक वह पंजाब के पुलिस महानिदेशक रहे.

गिल की पंजाब में तैनाती उनके पुलिस कॅरियर का सबसे चुनौतीपूर्ण समय था. वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद देश भर में सिखों के खिलाफ दंगो ने पंजाब के हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया था. पूरा राज्य खालिस्तान समर्थक चरमपंथ की आग में जल रहा था. पंजाब में चरमपंथी 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' का बदला लेने के लिए नेताओं के साथ- साथ सुरक्षा बलों को भी निशाना बन रहे थे.
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ये 1988 के मई माह की बात है. चरमपंथियों ने एक बार फिर 'हरमिंदर साहिब' गुरुद्वारे को अपना ठिकाना बनाया. पुलिस, प्रशासन और सेना ने इस पवित्र स्थान को चरमपंथियों से मुक्त कराने के लिए 'ऑपरेशन ब्लैक थंडर 2' शुरू किया. इस आॅपरेशन में 67 खालिस्तान समर्थकों ने सरंडर किया और 43 मुठभेड़ में मारे गए. इस ऑपरेशन की कमान के.पी.एस गिल ने संभाली थी.

इस आॅपरेशन के बारे में गिल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि आॅपरेशन ब्लू स्टार के कारण उस वक्त एक आम धारणा बन चुकी थी कि बीएसएफ(बॉर्डर सिक्युरिटी फोर्स )और सीआरपीएफ (सेंट्रल रिर्जव पुलिस फोर्स) ने इस आॅपरेशन से अपने हाथ खींच लिए हैं. इसकी वजह थी इन बलों को इस तरह के आॅपरेशन को लेकर कोई ट्रेंनिंग नहीं मिल पाना. उन्होंने कहा कि इस बात को और मेरे पूर्वोत्तर के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए मैंने इस आॅपरेशन की कमांड संभालने का निणर्य लिया.

गिल ने  कहा - 'मुझे याद है कि इस दौरान हमारी पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल सुरिंदरनाथ के घर पर एक मिटिंग हुई थी. इसमें मैंने सुझाव रखा था कि हम इस वक्त 'युद्धक्षेत्र' में हैं इसलिए ऐसी रणनीति बनाई जाए जिसमें पुलिस कुछ 'असुविधजनक' काम करे और सेना जनता के मनबहलाने वाले कामों को अंजाम दे. इसीलिए जब हमने अभियान शुरू किया तो सेना कभी किसी गांव में तलाशी के लिए नहीं गई. हमने घरों की तलाशी ली. इस तरह हमने सारे आरोप अपने सिर ले लिए, इसीलिए जून 1984 में सेना की कमान में किए गए ऑपरेशन ब्लू स्टार के मुकाबले ऑपरेशन ब्लैक थंडर में कम नुकसान हुआ था.'

यही कारण है कि गिल को पंजाब में चरमपंथ के ख़ात्मे का हीरो समझा जाता था. इसी दौरान मीडिया में वह 'सुपरकॉप' के रूप में चर्चित हुए.

1989 में सिविल सर्विस में अपने योगदान के लिए केपीएस गिल को पद्मश्री से नवाजा गया था.

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खेल और राजनीतिक 'सांकेतिक नियुक्तियां'
गिल को खेलों के प्रति भी लगाव था. पुलिस के अलावा वो खेल और प्रबंध संस्थाओं से जुड़े रहे. वो भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष भी रहे. अध्यक्ष रहते हुए उन पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे. 2008 में केपीएस गिल की अगुवाई वाले भारतीय हॉकी महासंघ में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भारतीय ओलंपिक संघ ने आईएचएफ को सस्पेंड कर दिया था. गिल ने इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट (आईसीएम) की स्थापना की. वह इस संस्थान के पहले अध्यक्ष बने. केपीएस गिल फॉल्टलाइन्स नाम की पत्रिका भी प्रकाशित करते थे.

1995 में वह भारतीय पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त हो गए. रिटायर होने के बाद भी वह विभिन्न सरकारों को आतंकवाद विरोधी नीति निर्माण के लिए सलाह देने में हमेशा व्यस्त रहे. 2002 के गुजरात दंगे के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केपीएस गिल को राज्य का सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया. बाद में गुजरात हिंसा पर काबू पाने के लिए गिल को क्रेडिट दिया गया.

इसके बाद 2006 में नक्सलियों से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने गिल से सुरक्षा सलाहकार के तौर पर मदद मांगी. बाद में एक अखबार को दिए एक इंटरव्यू में केपीएस गिल ने बताया था कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने उनसे कहा था कि तनख्वाह लो और बैठ के मजे करो.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने केपीएस गिल के राज्य में सलाहकार रहने के दौरान मुफ्त में वेतन लेने की सलाह को कोरी बकवास करार दिया था. रमन सिंह से गिल के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि गिल को पंजाब के उनके अनुभवों के मद्देनजर उन्हें सलाहकार बनाया गया था. चूंकि पंजाब और छत्तीसगढ़ की परिस्थतियां अलग-अलग हैं, इस कारण पंजाब के अनुभवों का लाभ राज्य को नहीं मिल सका.

श्रीलंका सरकार ने भी उनकी सलाह ली थी. वर्ष 2000 में श्रीलंका सरकार ने आतंकवाद विरोधी आतंकवाद विशेषज्ञ के रूप में उनकी मदद मांगी, ताकि उन्हें लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खिलाफ व्यापक आतंकवाद की रणनीति तैयार करने में सहायता मिल सके.

स्याह पन्ने
1980 के दशक के अंतिम दौर में उनके बारे में ख़बर आई कि उन्होंने एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी रूपन देओल बजाज के साथ यौन दुर्व्यवहार किया है.

रूपन इस मामले को अदालत ले गईं, जहां 17 साल बाद गिल को दोषी ठहराया गया. मगर गिल की सज़ा कम कर दी गई, जुर्माना भी कम कर दिया गया और जेल भी नहीं भेजा गया. सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में इस सजा पर रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने गिल पर जुर्माना तो बरकरार रखा लेकिन सजा को दो साल के प्रोबेशन में बदल दिया गया, यानि दो साल तक गिल के चाल चलन पर नजर रखी गई.

मोदी को लेकर परिवार को नाराज कर दिया था
अपनी जीवनी ‘केपीएस गिल: द पैरामाउंट कॉप’ के लोकापर्ण के अवसर पर गिल ने बताया था कि उनके परिवार के सदस्य उनसे से नाराज है. वो इसलिए, क्योंकि इस किताब में गुजरात दंगों के लिए मोदी को जिम्मेदार न ठहराकर हालात को समझने में पुलिस की बेबसी और पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दोषी ठहराने की वकालत की गई थी. दंगों के दौरान मोदी से पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए गिल ने कहा था कि मोदी ने उनसे कहा था कि काफी कोशिशों के बाद भी वो दंगा रोकने में नाकाम हैं. उन्होंने पड़ोसी राज्यों से पुलिस फोर्स मांगी, लेकिन उन्होंने देने से इंकार कर दिया.

अपनी किताब में मोदी को क्लीन चिट दिए जाने पर केपीएस गिल का कहना था कि गुजरात दंगों को लेकर उन्होंने राज्य के कई पुलिसवालों से बात की. लेकिन किसी ने भी गुजरात दंगों के लिए मोदी का नाम नहीं लिया.

गिल का 82 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से शुक्रवार को निधन हो गया. तमाम विवादों के बावजूद एक सफल पुलिस अधिकारी की उनकी छवि बेदाग रही.

 
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