सुप्रीम कोर्ट की सलाह- रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस ना भेजे सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि भारत में रह रहे लगभग 40 हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस ना भेजा जाए.

Ehtesham Khan | News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 7:20 PM IST
सुप्रीम कोर्ट की सलाह- रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस ना भेजे सरकार
सुप्रीम कोर्ट
Ehtesham Khan | News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 7:20 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि भारत में रह रहे लगभग 40 हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस ना भेजा जाए. कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में ये साफ कर दिया कि अगर किसी रोहिंग्या शरणार्थी को अपने देश वापस भेजा जाता है तो वो कोर्ट में तुरंत सुनवाई के लिए अर्जी दे सकता है.

केंद्र सरकार का तर्क है कि कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों के तार आतंकी संगठन से जुड़े हो सकते हैं. साथ ही अगर ये शरणार्थी भारत में रहे तो वो यहां सस्ती मजदूरी मुहैया करेंगे. इससे भारत के मजदूरों को नुकसान होगा. इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले के तीन पहलू हैं. पहला है देश की सुरक्षा, दूसरा है आर्थिक मुद्दा और तीसरा है शरणार्थियों का मानव अधिकार.

अगर वो आतंकी काम में लिप्त है तो बेशक सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे. लेकिन शरणार्थियों में महिला, बच्चे, बूढ़े और बीमार लोग हैं. इन लोगों को पता भी नहीं कि ये सब क्या हो रहा है. हम एक संवैधानिक अदालत के नाते इस पर चुप नहीं रह सकते और हम उम्मीद करेंगे की सरकार भी इसे मानवता की दृष्टि से देखे. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सरकार इन लोगों को वापस ना भेजे.

लेकिन सरकार के वकील एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर कोर्ट ऐसा कोई आदेश पारित करता है तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख को बट्टा लग सकता है. कोर्ट ने फिर अपने आदेश में बदलाव करते हुए कहा कि इस मामले को 21 नवंबर तक के लिए स्थगित किया जाता है और तब तक ये मामला विचाराधीन होगा. तुषार मेहता ने इस पर भी आपत्ति जताई क्योंकि विचाराधीन कहने का अर्थ ये होता के इस बीच सरकार शरणार्थियों को वापस भेजने में कोई पहल नहीं कर सकती.

इसके बाद कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालते हुए अपने आदेश में लिखा की सभी पक्षों को अपनी बात कहने के लिए थोड़ा वक्त और दिया जाता है. इस मामले की अगली सुनवाई 21 नवंबर को होगी और इस बीच अगर किसी याचिकाकर्ता को कोई दिक्कत हुई तो वो फौरन सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दे सकता है. इस तरह कोर्ट ने ये साफ कर दिया की अगर किसी शरणार्थी को म्यांमार वापस भेजा जाता है तो उसके लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खुले हैं.

याचिकाकर्ता की तरफ से वकील फली नरिमन ने कहा कि ये लोग शरणार्थी हैं और इन्हें गैरकानूनी घुसपैठिया नहीं समझा जाना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय कानून और भारत के संविधान के मुताबिक इनका भी मानवाधिकार है.

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