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सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग दंपति को अलग होने की मंजूरी देते हुए कहा, 'साथ नहीं तो अब अलग होकर खुश रहें दोनों'

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Updated: October 31, 2019, 11:38 AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग दंपति को अलग होने की मंजूरी देते हुए कहा, 'साथ नहीं तो अब अलग होकर खुश रहें दोनों'
सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में बुजुर्ग दंपति के अलग होने की न्‍यायिक प्रक्रिया पर रोक लगा दी. इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे तो मामला भी ठंडा पड़ गया.

शीर्ष अदालत (Supreme Court) के जस्टिस संजय के. कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने कोर्ट के अंदर और बाहर चली दंपति (Couple) की लंबी लड़ाई पर लगाया पूर्ण विराम. पीठ ने कहा कि अलग होना ही दोनों के हित में है. इस मामले में पत्‍नी ने मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) के 2008 में दिए एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दरअसल, हाईकोर्ट ने पति की याचिका पर दोनों को अलग होने की अनुमति दे दी थी.

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  • Last Updated: October 31, 2019, 11:38 AM IST
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उत्‍कर्ष आनंद

नई दिल्‍ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 60 साल से ज्‍यादा उम्र के बुजुर्ग दंपति (Senior Citizen Couple) की अदालत के बाहर और भीतर चली आ रही लंबी लड़ाई पर पूर्ण विराम लगाते हुए दोनों को अलग होने की मंजूरी दे दी. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय के. कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने उम्‍मीद जताई कि दोनों साथ नहीं तो अलग खुश रहें. पीठ ने कहा कि दोनों अलग होना ही उनके हित में हो सकता है. साथ ही दोनों पक्षों के वकीलों को सभी को स्‍वीकार्य शर्तों (Mutually Acceptable Terms) के साथ अदालत में पेश होने को कहा ताकि दो दशक से चली आ रही दोनों की कानूनी लड़ाई को पूरी तरह से खत्‍म किया जा सके.

पत्‍नी ने सुप्रीम कोर्ट में दी थी मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती
इस मामले में पत्‍नी ने मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) के 2008 में दिए एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दरअसल, हाईकोर्ट ने पति की याचिका पर दोनों को अलग होने की अनुमति दे दी थी. पति को हिंदू विवाह कानून (Hindu Marriage Act) की धारा-10 के तहत अलग होने की मंजूरी मिली थी. इसमें याची को अकेलेपन, क्रूरता और बेवफाई के आधार पर अलग होने की मंजूरी दी जाती है. एक बार अलग होने की डिक्री (Decree) पारित होने के बाद दोनों में किसी पर भी एकदूसरे के साथ रहने का दायित्‍व नहीं रहता है. दोनों कोर्ट की ओर से डिक्री रद्द करने पर फिर साथ रह सकते हैं.

शीर्ष अदालत ने 2009 में अलग होने की प्रक्रिया पर लगा दी रोक
पति ने 2003 में मद्रास हाईकोर्ट में पत्‍नी से अलग होने का आवेदन दायर किया था. इसके पांच साल बाद यानी 2008 में हाईकोर्ट ने पति को अलग होने की मंजूरी दे दी. इसके बाद पत्‍नी ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में अलग होने की न्‍यायिक प्रक्रिया पर रोक लगा दी. इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे तो मामला भी ठंडा पड़ गया. हाल में जस्टिस कौल ने किसी भी तरीके से मामले को खत्‍म करने का फैसला किया. कोर्ट ने दोनों के वकीलों को अपने-अपने पक्ष से बात करने का निर्देश दिया.

'पति पत्‍नी को करेगा 5 लाख रुपये का आखिरी भुगतान'
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शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा कि दंपति अलग-अलग ही रहेंगे. साथ ही पति को फुल एंड फाइनल सेटेलमेंट (Full and Final Settlement) के तौर पर पत्‍नी को 5 लाख रुपये का भुगतान करना होगा. दोनों पक्ष अलग-अलग जगह लंबित सभी मामलों (Pending Cases) को वापस लेने के लिए भी सहमत हो गए ताकि उनके बीच विवाद पूरी तरह से खत्‍म किया जा सके. सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में कहा, 'दोनों पक्ष 60 साल से ज्‍यादा समय तक साथ रहे. अब हम यही उम्‍मीद कर सकते हैं कि अगर साथ रहकर खुश नहीं रह पाए तो दोनों अलग होकर खुश रहेंगे.'

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First published: October 31, 2019, 11:36 AM IST
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