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OBC Reservation: आयोग को OBC डेटा सौंपेगी महाराष्ट्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट ने दिए आदेश

OBC Reservation: आयोग को OBC डेटा सौंपेगी महाराष्ट्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट ने दिए आदेश

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह टिप्पणी उन विभिन्न राज्यों में लागू होगी जहां स्थानीय चुनाव होने हैं. उसने कहा कि जब तक तीन स्तरीय जांच पूरी नहीं होगी तब तक इन सीटों को सामान्य श्रेणी का माना जाएगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह टिप्पणी उन विभिन्न राज्यों में लागू होगी जहां स्थानीय चुनाव होने हैं. उसने कहा कि जब तक तीन स्तरीय जांच पूरी नहीं होगी तब तक इन सीटों को सामान्य श्रेणी का माना जाएगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)

Supreme Court Update: पीठ ने कहा, 'राज्य उपलब्ध जानकारी और आंकड़े संबंधित आयोग के समक्ष पेश कर सकता है जो इसकी प्रभावशीलता के बारे में निर्णय ले सकता है और राज्य सरकार को आवश्यकतानुसार सिफारिशें कर सकता है. यह स्पष्ट रूप से ओबीसी श्रेणी के लिए स्थानीय निकायों में सीटों का आरक्षण देने से पहले तीन स्तरीय जांच की कवायद को पूरा नहीं करेगा जो (2010 के फैसले के अनुसार) पूरी की जानी चाहिए थी.'

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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने बुधवार को महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) को निर्देश दिया कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित आंकड़े अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष पेश करे ताकि इनकी सत्यता की जांच की जा सके और वह स्थानीय निकायों के चुनावों में उनके प्रतिनिधित्व पर सिफारिशें कर सके. शीर्ष अदालत ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (एसबीसीसी) को यह निर्देश दिया कि वह राज्य सरकार से सूचना मिलने के दो हफ्ते के अंदर संबंधित प्राधिकारियों को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपे.

न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, महाराष्ट्र ने इस अदालत से अन्य पिछड़े वर्गों के संबंध में राज्य के पास पहले से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर चुनाव की अनुमति देने के लिए कहा है. आंकड़ों की जांच करने की बजाय, इन आंकड़ों को राज्य द्वारा नियुक्त आयोग के समक्ष प्रस्तुत करना उचित कदम होगा जो इनकी सत्यता की जांच कर सकता है.

पीठ ने कहा, ‘अगर वह उचित समझे तो राज्य को सिफारिशें करें जिसके आधार पर राज्य या राज्य चुनाव आयोग आगे कदम उठा सकता है… राज्य सरकार से सूचना/आंकड़े प्राप्त होने के दो हफ्ते के भीतर संबंधित प्राधिकारियों को अगर सलाह दी जाती है तो आयोग अपनी अंतरिम रिपोर्ट दे सकता है.’ हालांकि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के संबंध में राज्य सरकार की ओर से तैयार की जाने वाली सूची केंद्र द्वारा की गई जनगणना से अलग होगी.

पीठ ने कहा, ‘राज्य उपलब्ध जानकारी और आंकड़े संबंधित आयोग के समक्ष पेश कर सकता है जो इसकी प्रभावशीलता के बारे में निर्णय ले सकता है और राज्य सरकार को आवश्यकतानुसार सिफारिशें कर सकता है. यह स्पष्ट रूप से ओबीसी श्रेणी के लिए स्थानीय निकायों में सीटों का आरक्षण देने से पहले तीन स्तरीय जांच की कवायद को पूरा नहीं करेगा जो (2010 के फैसले के अनुसार) पूरी की जानी चाहिए थी.’

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शीर्ष अदालत ने कहा कि यह टिप्पणी उन विभिन्न राज्यों में लागू होगी जहां स्थानीय चुनाव होने हैं. उसने कहा कि जब तक तीन स्तरीय जांच पूरी नहीं होगी तब तक इन सीटों को सामान्य श्रेणी का माना जाएगा.

महाराष्ट्र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफड़े ने कहा कि राज्य के पास कुछ आंकड़े हैं, जिनके आधार पर आरक्षण कायम रखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि मार्च में चुनाव हैं और आंकड़ें आयोग के पास पहले से ही हैं. उन्होंने कहा कि आयोग से दो हफ्ते में रिपोर्ट देने के लिए कहा जा सकता है, ताकि सरकार मार्च में होने वाले चुनाव पर काम कर सके. उन्होंने कहा अन्यथा समुदाय का बड़ा वर्ग प्रतिधिनित्व से वंचित रह सकता है.

मध्य प्रदेश के संबंध में राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश पंचायत राज और ग्राम स्वराज (संशोधन) अध्यादेश 2021 रद्द कर दिया है. उन्होंने आश्वासन दिया है कि नया अध्यादेश शीर्ष अदालत के निर्देश के मुताबिक होगा. शीर्ष अदालत ने 17 दिसंबर 2021 को महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के राज्य चुनाव आयोगों को स्थानीय निकायों में ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी के तहत फिर से अधिसूचित करने का निर्देश दिया था.

क्या है ट्रिपल टेस्ट
ओबीसी आरक्षण को अनिवार्य करने के लिए शीर्ष अदालत की तरफ से पिछले फैसले में तीन स्तरीय मानदंड स्थापित किया गया है. इसके तहत राज्य को पहले स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और लागू होने की गहन जांच के लिए एक आयोग गठन करने की जरूरत है. दूसरा, पैनल की तरफ से की गई सिफारिशों पर विचार करते हुए प्रति स्थानीय निकाय में प्रस्ताव के लिए आरक्षण के अनुपात को विशेष रूप से बताना और तीसरा, ऐसा आरक्षण एससी/एसटी/ओबीसी के लिए आरक्षित कुल सीटों के 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

(भाषा इनपुट के साथ)

Tags: OBC, Supreme Court

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