चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कुछ विवाद और कुछ चर्चित फैसले

जस्टिस दीपक मिश्रा के कई फैसलों के चलते उनकी तारीफ हुई, तो कुछ फैसलों के चलते उनपर कई गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं.

News18Hindi
Updated: January 12, 2018, 2:47 PM IST
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कुछ विवाद और कुछ चर्चित फैसले
File photo of Justice Dipak Mishra.
News18Hindi
Updated: January 12, 2018, 2:47 PM IST
जस्टिस जेएस खेहर का कार्यकाल पूरा होने के बाद देश के 45वें मुख्य न्यायाधीश बने दीपक मिश्रा, सीजेआई बनने वाले ओडिशा के तीसरे न्यायाधीश हैैं. उनसे पहले ओडिशा के न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा और न्यायमूर्ति जीबी पटनायक भी सीजेआई रह चुके हैं.

बतौर जज दीपक मिश्रा के कार्यकाल में कई उतार-चढ़ाव देखे जा सकते हैं. उनके कुछ फैसलों को बेहद प्रगतिवादी माना गया, तो वहीं कुछ को बेहद प्रतिगामी. कई फैसलों के चलते उनकी तारीफ हुई, तो कुछ फैसलों के चलते उनपर कई गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं. तो चलिए जानते हैं जस्टिस दीपक मिश्रा पर लगे कुछ गंभीर आरोप और उनके कुछ चर्चित फैसलों के बारे में.

धोखाधड़ी कर जमीन आवंटन का मामला
दीपक मिश्रा की वकालत के शुरुआती दिनों में साल 1979 के दौरान उड़ीसा सरकार ने भूमिहीन किसानों के लिए एक योजना शुरू की. जिसके अंतर्गत किसानों को दो एकड़ जमीन लीज़ पर दी जानी थी. इस योजना का लाभ उठाने के लिए दीपक मिश्रा ने भी एक शपथपत्र दिया था, जिसमें लिखा कि 'मैं जाति से ब्राह्मण हूं और मेरे व मेरे पूरे परिवार के पास बिलकुल भी जमीन नहीं है'. जिसके बाद उन्हें लीज पर जमीन दे दी गई. लेकिन बाद में हुई जांच में ये पाया गया कि दीपक मिश्रा ने यह जमीन धोखाधड़ी करके आवंटित करवाई थी.

जिसके बाद 1985 में तत्कालीन अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने इस आवंटन को रद्द करते हुए एक आदेश दिया जिसमें लिखा था कि, यह योजना भूमिहीन किसानों के लिए है और दीपक मिश्रा इसे अंतर्गत नहीं आते इसलिए उनका आवंटन रद्द किया जाता है.

पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल के सुसाइड नोट
इसके अलावा वरिष्ठ वकील और पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने दीपक मिश्रा पर आरोप लगाया था कि उनका नाम अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल के सुसाइड नोट में था, जिसमें साफतौर न्यायपालिक में भ्रष्टाचार की बात लिखी गई थी. इसलिए उन्हें मुख्य न्यायाधीश न बनाया जाए.
Loading...

2002 के दंगों में गुजरात में तोड़े गए धार्मिक स्थलों की भरपाई
इसके अलावा दीपक मिश्रा उस फैसले को भी बदल दिया था जिसमें गुजरात में 2002 के दंगों में तोड़े गए धार्मिक स्थलों को उनके नुकसान की भरपाई सरकार से करने को कहा गया था. इसपर जस्टिस मिश्रा का कहना था कि मुआवजा देना सरकार का काम है और कोर्ट इसके लिए उसे बाध्य नहीं कर सकता. इस फैसले के चलते उनकी विरोधाभास छवि लोगों के बीच बनीं.

सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने का फैसला
इसके अलावा दीपक मिश्रा ने एक ऐसा फैसला दिया था, जो पूरी तरह से विधायिका या कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप था. यह था सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाए जाने का नया नियम.

आधी रात खोले थे SC के दरवाजे
जस्टिस मिश्रा याकूब मेमन पर दिए अपने फैसले के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं. इस मामले की सुनवाई के लिए उन्होंने आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खोले थे. उन्होंने इस मामले में रात भर सुनवाई की थी और सुबह करीब चार बजे याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया था. अगली सुबह मेमन को फांसी दे दी गई थी.

 
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर