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Inside Story: इस कारण 'जनता की अदालत' पहुंचे सुप्रीम कोर्ट के 4 जज

News18Hindi
Updated: January 13, 2018, 8:18 AM IST
Inside Story: इस कारण 'जनता की अदालत' पहुंचे सुप्रीम कोर्ट के 4 जज
देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब शीर्ष अदालत के चार जज मीडिया के जरिए 'जनता की अदालत' पहुंचे.
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Updated: January 13, 2018, 8:18 AM IST
सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार के घटनाक्रम ने पूरे देश को हैरान कर दिया. इस घटना की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब शीर्ष अदालत के चार जज मीडिया के जरिए 'जनता की अदालत' पहुंचे.

रोज की तरह मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई सुबह 10:00 बजे शुरू हुई. जज, वकील अपने-अपने कामों में लगे थे. याचिकाकर्ता याचिका दायर करने पहुंचे थे. कुछ मामलों की सुनवाई होनी थी, जिसे कवर करने मीडिया भी पहुंची हुई थी. इसी बीच एक ऐसी बात हुई, जिससे सुप्रीम कोर्ट के चार जजों को मीडिया के सामने आने पर मजबूर होना पड़ा.

जस्टिल जे चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मिले. वजह थी शोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे स्पेशल सीबीआई जज बीएच लोया की मौत. जस्टिस लोया की मौत की जांच को लेकर दायर पीआईएल पर जस्टिस अरुण मिश्रा सुनवाई कर रहे हैं.


बता दें कि जस्टिस लोया शोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे. दिसंबर 2014 में कार्डिएक अरेस्ट से उनकी मौत हो गई. जस्टिस लोया के परिवार का कहना है कि उनकी मौत नैचुरल नहीं थी. जस्टिस लोया तनाव में थे.

शुक्रवार को चारों जज जस्टिल जे चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से इसी केस को लेकर आपत्ति जाहिर की. इन चारों जजों के मुताबिक, स्पेशल सीबीआई कोर्ट के जज की मौत वाले एक अहम केस को आठ सीनियर जजों और बेंच को दरकिनार करते हुए कोर्ट नंबर 10 को दे दिया गया. चारों जजों के मुताबिक, ऐसा करने से जुडिशियरी सिस्टम पर खराब असर पड़ेगा.

सूत्रों के मुताबिक, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने चारों जजों से कहा कि जस्टिस लोया का केस उन्होंने कोर्ट नंबर 10 को दे दिया है. उन्हें अपने इस आदेश में कोई गलती नहीं दिखती. इस बात पर चारों जजों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई. इन जजों का कहना था कि ऐसी चीजों से जनता के बीच गलत संदेश जाएगा और इंस्टिट्यूशन को नुकसान पहुंचेगा.

अपने फैसले पर जजों के आपत्ति जताने के बाद चीफ जस्टिस ने उन्हें बताया कि उन्होंने न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार ही केस का आवंटन किया है.


इसके बाद मीडिया के सामने आए चारों जजों ने कहा कि हमने मिलकर चीफ जस्टिस को हालात के बारे में बताने की कोशिश की, जिससे जरूरी कदम उठाए जा सकें लेकिन हम नाकाम रहे. हम चारों इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए एक पारदर्शी जज और न्याय व्यवस्था की जरूरत है. जजों के मुताबिक, चीफ जस्टिस से कई बार एक व्यवस्थित तरीके से केसों के आवंटन की गुजारिश की गई थी. लेकिन, उन्होंने इस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया.

हालांकि, चीफ जस्टिस ने इस मामले में संवैधानिक पीठ के फैसले का हवाला दिया है. संवैधानिक पीठ के फैसले के मुताबिक, 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' होने के नाते चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया अपने विवेक के आधार पर किसी भी केस का आवंटन किसी भी कोर्ट में कर सकता है. इसलिए उन्होंने जजों की गुजारिश पर अमल नहीं किया.


केसों के आवंटन में क्या है नियम?
संवैधानिक पीठ का ये फैसला नवंबर 2017 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने दिया था. इसके तहत चीफ जस्टिस को यह अधिकार है कि वह इसका फैसला करें कि कौन सा केस किस कोर्ट में जाएगा. यही नहीं, किसी तरह के विवाद की स्थिति में भी चीफ जस्टिस का फैसला ही मान्य होगा.

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