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अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट ने इन साक्ष्यों के आधार पर दिया मंदिर निर्माण का फैसला

भाषा
Updated: November 10, 2019, 7:15 AM IST
अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट ने इन साक्ष्यों के आधार पर दिया मंदिर निर्माण का फैसला
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 533 दस्तावेजों का अवलोकन किया (फाइल फोटो)

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 533 दस्तावेजों का अवलोकन किया. इनमें धार्मिक ग्रंथ, यात्रा वृत्तांत, पुरातात्विक खुदाई (Archaeological Excavations) की रिपोर्ट आदि का अध्ययन शामिल है.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर (Ram Mandir) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने और वैकल्पिक स्थान पर मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board)  को पांच एकड़ जमीन देने का फैसला सुनाने से पहले सारे विवाद से संबंधित ढेर सारे साक्ष्यों का अवलोकन किया. ये साक्ष्य इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) में मुकदमे की सुनवाई के दौरान रिकार्ड में लाये गये थे.

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 533 दस्तावेजों का अवलोकन किया. इनमें धार्मिक ग्रंथ, यात्रा वृत्तांत, पुरातात्विक खुदाई (Archaeological Excavations) की रिपोर्ट, मस्जिद गिराये जाने की घटना से पहले के इस स्थान की तस्वीरों और विवादित स्थल पर मिली कलाकृतियों का अध्ययन शामिल है.

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इन दस्तावेजों का किया था अध्ययन
इसके अलावा, संविधान पीठ (Constitution Bench) के सदस्य न्यायाधीशों ने वहां मिले स्तंभों पर उकेरी हुयी लिपि के अनुवाद और राजपत्र में शामिल दस्तावेजों का भी अध्ययन किया. पीठ ने इस मामले में इतिहासकारों, धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों और पुरातत्व विशेषज्ञों सहित 88 से अधिक गवाहों के मौखिक साक्ष्य का भी अवलोकन किया.

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर (Justice S Abdul Nazeer) शामिल थे. शीर्ष अदालत ने विवादित स्थल के मालिकाना हक और वहां पूजा-अर्चना की अनुमति के लिये चार वाद दायर करने वाले पक्षकारों के बयानों की भी विवेचना की.

पहला मुकदमा 16 जनवरी, 1950 को किया गया था दायर
इस विवाद में पहला मुकदमा ‘रामलला’ के भक्त गोपाल सिंह विशारद (Gopal Singh Visharad) ने 16 जनवरी, 1950 को दायर किया था. इसमें उन्होंने विवादित स्थल पर हिन्दुओं के पूजा अर्चना का अधिकार लागू करने का अनुरोध किया था.
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उसी साल, पांच दिसंबर, 1950 को परमहंस रामचन्द्र दास ने भी पूजा अर्चना जारी रखने और विवादित ढांचे (Disputed Structure) के मध्य गुंबद के नीचे ही मूर्तियां रखी रहने के लिये मुकदमा दायर किया था. लेकिन उन्होंने 18 सितंबर, 1990 को यह मुकदमा वापस ले लिया गया था.

1959 में निर्मोही अखाड़े और 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दायर किया वाद
बाद में, निर्मोही अखाड़े (Nirmohi Akhara) ने 1959 में 2.77 एकड़ विवादित स्थल के प्रबंधन और शेबैती अधिकार के लिये निचली अदालत में वाद दायर किया.

इसके दो साल बाद 18 दिसंबर 1961 को उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड (UP Sunni Waqf Board) भी अदालत में पहुंचा गया और उसने बाबरी मस्जिद की विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा करते हुए इसे बोर्ड को सौंपने और वहां रखी मूर्तियां हटाने का अनुरोध किया.

रामलला विराजमान ने 1989 में मुकदमा दायर कर समूची संपत्ति पर किया दावा
‘रामलला विराजमान’ की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के पूर्व न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल और जन्म भूमि ने एक जुलाई 1989 को मुकदमा दायर कर समूची संपत्ति पर अपना दावा किया और कहा कि इस भूमि का स्वरूप देवता का और एक ‘न्यायिक व्यक्ति’ जैसा है. इस वाद में किसी को भी मंदिर निर्माण के मामले में आपत्ति करने से रोकने का अनुरोध किया गया था.

अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराये जाने की घटना और इसे लेकर देश में हुये सांप्रदायिक दंगों (Communal Riots) के बाद सारे मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्णय के लिये सौंप दिये गये थे.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला (Ram Lalla)- के बीच बांटने के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी थी.

यह भी पढ़ें: अयोध्या मामले में फैसला सुनाने वाली बेंच में पहले नहीं थे ये जज, ऐसे हुए शामिल

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First published: November 9, 2019, 9:12 PM IST
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