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'चुनावी रेवड़ियों' पर CJI ने सुनाया अपना किस्सा, बोले- मैं एक ईंट नहीं जोड़ पाता, पड़ोसी फ्लोर बनवाए जा रहे

'चुनावी रेवड़ियों' पर CJI ने सुनाया अपना किस्सा, बोले- मैं एक ईंट नहीं जोड़ पाता, पड़ोसी फ्लोर बनवाए जा रहे

चुनाव के दौरान फ्री वादों को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को कड़ी फटकार लगाई है. (File Photo)

चुनाव के दौरान फ्री वादों को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को कड़ी फटकार लगाई है. (File Photo)

प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित ने खुद से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए कहा, "मेरे ससुर एक किसान हैं और सरकार ने बिजली कनेक्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है. वह कनेक्शन का इंतजार कर रहे हैं. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं कुछ कर सकता हूं? मैंने उनसे कहा कि यही पॉलिसी है. लेकिन बाद में चुनाव के दौरान इसे रेगुलराइज कर दिया गया. मैं अपने घर में एक ईंट भी नहीं जोड़ सकता. क्योंकि अगर ऐसा करता हूं तो सैंक्शंड प्लान का उल्लंघन करता हूं. लेकिन मेरे बगल में पड़ोसी फ्लोर बना रहे हैं और चुनाव के वक्त सरकार उसे रेगुलराइज कर देती है. आज यही स्थिति है. आखिर हम क्या संदेश दे रहे हैं?"

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नई दिल्लीः चुनाव के दौरान फ्री वादों को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को कड़ी फटकार लगाई है. शीर्ष ने नाराजगी जताते हुए आयोग से पूछा कि उसकी ओर से अब तक हलफनामा दाखिल क्यों नहीं किया गया है? चीफ जस्टिस यूयू ललित ने सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग से हलफनामा मीडिया में प्रकाशित होने पर नाराजगी जताई. सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन से कहा, “हमें हलफनामा नहीं मिलता, लेकिन सभी न्यूज पेपर्स को मिल जाता है. हमने आपका हलफनामा न्यूज पेपर में पढ़ लिया है.”

शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव के पहले अपना घोषणा पत्र निर्वाचन आयोग को भेजती हैं? याचिकाकर्मा के वकील विकास सिंह ने अदालत से कहा, “नहीं ऐसा कोई नियम नहीं है.” केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- “ज्यादातर मुफ्त की घोषणाएं राजनतिक दलों के मेनिफेस्टो का हिस्सा नहीं होती हैं. चुनाव प्रचार के दौरान नेता मुफ्त की घोषणाएं कर जाते हैं.”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “सभी पक्ष मानते हैं कि यह मुद्दा है. जो टैक्स देते हैं वे सोचते होंगे कि उनका पैसा विकास के लिए लगना चाहिए, न कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनाव जीतने के लिए जनता को चीजें मुफ्त में देने के लिए. यह एक गंभीर मामला है. सवाल यह है कि हम किस हद तक इस मामले में जा सकते हैं. चुनाव आयोग है, राजनीतिक पार्टियां हैं. आर्थिक अनुशासन होना चाहिए. दूसरे देशों को देखना चाहिए. भारत में हमने राज्य और केंद्र की स्कीम को देखा है. मान लीजिए आप कह देते हैं कि आज से मुफ्त की चीजें नहीं देनी देनी होंगी. उसका रिस्पाॅन्स क्या होगा ये भी देखना होगा. इसलिए एक कमेटी जरूरी है, जो व्यापक स्तर पर इन मुद्दों को जांचेगी, परखेगी.”

प्रधान न्यायाधीश ललित ने खुद से जुड़ी एक घटना का किया जिक्र
प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित ने खुद से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए कहा, “मेरे ससुर एक किसान हैं और सरकार ने बिजली कनेक्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है. वह कनेक्शन का इंतजार कर रहे हैं. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं कुछ कर सकता हूं? मैंने उनसे कहा कि यही पॉलिसी है. लेकिन बाद में चुनाव के दौरान इसे रेगुलराइज कर दिया गया. मैं अपने घर में एक ईंट भी नहीं जोड़ सकता. क्योंकि अगर ऐसा करता हूं तो सैंक्शंड प्लान का उल्लंघन करता हूं. लेकिन मेरे बगल में पड़ोसी फ्लोर बना रहे हैं और चुनाव के वक्त सरकार उसे रेगुलराइज कर देती है. आज यही स्थिति है. आखिर हम क्या संदेश दे रहे हैं?”

मुफ्त योजनाओं के चलते देश की आर्थिक सेहत खराब हो रही: CJI
उन्होंने कहा कि मुफ्त योजनाओं के चलते देश की आर्थिक सेहत खराब हो रही है, जो चिंता का विषय है. जनता की भलाई के लिए लाई जाने वाली योजनाओं और अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकसान के बीच संतुलन कायम करने की जरूरत है. जब हम दूसरे देशों की ओर देखते हैं तो हमें लगता है कि आर्थिक अनुशासन की जरूरत है. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि जो लोग (नेता और राजनीतिक दल) मुफ्त में सुविधाएं चाहते हैं, वे दावा करेंगे कि हमारे यहां जनता के लिए कल्याणकारी सरकार (सोशल वेलफेयर स्टेट) की अवधारणा है. लिहाजा इसका फायदा हमें मिलना चाहिए. वहीं, जो लोग टैक्स अदा कर रहे हैं (देश की जनता) वे इस पर ऐतराज जाहिर कर सकते हैं कि उनका पैसा विकास के काम पर लगना चाहिए. लिहाजा हमने इस मसले पर कमेटी के गठन का सुझाव दिया है, जो दोनों पक्षो को सुनेगी और हमें अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.

सुप्रीम कोर्ट में चुनावों के दौरान मुफ्त की घोषणाओं पर सुनवाई के दौरान वकीलों और न्यायाधीशों के बीच बहस के कुछ अंश…

सीजेआईः भारत भी एक ऐसा देश है जहां गरीबी है. केंद्र सरकार भी भूखों को खाना खिलाने आदि की योजनाएं चलाती है.

एसजीः लोक कल्याण करने का एकमात्र तरीका मुफ्त उपहारों का वितरण नहीं हो सकता.

सीजेआईः मुफ्त उपहार और सामाजिक कल्याण की योजनाएं अलग हैं? अगर हम कहते हैं कि इस तरह के देश में ’ये मुफ्त में दो और ये मत दो’, इसे कैसे हल किया जा सकता है?

वकील विजय हंसारियाः मैंने सिफारिश दी है कि कौन कौन इस कमेटी का हिस्सा हो सकता है.

अरविंद दातारः इस समिति को रिपोर्ट सौंपने के लिए 8 सप्ताह की समय सीमा दी जा सकती है.

सीजेआईः हम जो समिति बनाने की बात कर रहे हैं वह इस मुद्दे पर विस्तृत विचार करेगी. इस संबंध में हम कानून बनाने के पक्ष में नहीं हैं. क्योंकि मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

दिल्ली सरकार की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यहां मुफ्त की योजनाओं को बहुत गलत अर्थों में इस्तेमाल किया जा रहा है.

सीजेआईः आप सहमत हैं कि मुफ्त और लोक कल्याणकारी योजनाओं के बीच अंतर है?

अभिषेक मनु सिंघवीः हां, लेकिन कृपया समिति बनाने से पहले उठाए गए मुद्दों को सुना जाना चाहिए. सोशल वेलफेयर स्कीम और मुफ्तखोरी में अंतर जरूर है. वेलफेयर स्कीम को मुफ्तखोरी बताकर भ्रम की स्थिति पैदा की जा रही है. कोर्ट देखे कि समिति की जरूरत भी है या नहीं.

सुप्रीम कोर्टः अभी हम सिर्फ चर्चा कर रहे हैं. आज कोई आदेश पास नहीं हो रहा.

एसजीः हम एक समिति का प्रस्ताव करते हैं, जिसमें सचिव केंद्र सरकार, सचिव राज्य सरकार, प्रत्येक राजनीतिक दल के प्रतिनिधि, नीति आयोग के प्रतिनिधि, आरबीआई, वित्त आयोग, राष्ट्रीय करदाता संघ शामिल किए जा सकते हैं.

सीजेआईः लोगों की भलाई के लिए लाई जाने वाली सोशल वेलफेयर स्कीम और देश की आर्थिक सेहत दोनो में संतुलन बनाए रखने की जरूरत है. इसलिए ही हम सब इस पर चर्चा कर रहे हैं. अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी. प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित ने कहा कि सभी पक्ष अगली सुनवाई में अपने-अपने सुझाव लिखित तौर पर अदालत के समक्ष रखेंगे.

Tags: CJI NV Ramana, Election Commission of India, Supreme Court

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