सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला, अच्‍छी परवरिश के लिए बच्‍चे को मिला विदेशी पिता का साथ

अच्छी परवरिश के लिए बच्चे को मिला विदेशी पिता का साथ सुप्रीम कोर्ट का आदेश (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)
अच्छी परवरिश के लिए बच्चे को मिला विदेशी पिता का साथ सुप्रीम कोर्ट का आदेश (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

Transnational Guardianship Case: जस्टिस ललित और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने पाया कि बच्चा अपने पिता के कीनिया और ब्रिटेन स्थित बड़े पारिवारिक व्यवसाय का उत्तराधिकारी भी है. यह बच्चे के लिए जरूरी होगा कि वह देश की संस्कृति और परंपरा को आत्मसात करें, जहां वह व्यस्क के रूप में रहेगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 31, 2020, 4:12 PM IST
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नई दिल्‍ली. देश की सबसे बड़ी अदालत ने दिल्ली की एक महिला को 11 साल की बेटे की कस्टडी कीनिया और ब्रिटेन की दोहरी नागरिकता वाले भारतीय मूल के उसके पिता को देने का आदेश दिया है. हालांकि कोर्ट ने आदेश इस शर्त के साथ दिया है कि पिता कीनिया की मिरर आर्डर लेगा जिसमें मां को बेटे से नियमित रूप से मिलने की इजाजत दी जाएगी. सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) की सुनवाई करने वाले जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली बेंच ने बहुमत के आधार पर दिए गए फैसले में कहा कि बच्चे को उसके पिता को सौंपना उसके लिए सर्वोत्तम हित में होगा. जस्टिस ललित और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने पाया कि बच्चा अपने पिता के कीनिया और ब्रिटेन स्थित बड़े पारिवारिक व्यवसाय का उत्तराधिकारी भी है. यह बच्चे के लिए जरूरी होगा कि वह देश की संस्कृति और परंपरा को आत्मसात करें, जहां वह व्यस्क के रूप में रहेगा. 11 वर्षों तक मां की निगरानी में रहने के बाद बच्चा संपूर्ण विकास के लिए पिता से संरक्षण और देखभाल प्राप्त करने का हकदार है.

मामले की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने महिला की दलीलों को खारिज कर दिया कि उसका पति नस्लवादी है और अत्यधिक शराब पीता है. महिला ने अपने पति पर बेवफाई के साथ-साथ लंबित आपराधिक मुकदमे का हवाला दिया था. वही पति के खिलाफ एक कुदरती हादसे से संबंधित केस किसी अदालत में लंबित है जिसमें 48 लोगों की मौत हो गई थी. कोर्ट ने महिला की दलीलों को खारिज कर दिया कि उसका पति नस्लवादी है और अत्यधिक शराब पीता है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने सम्बंधित महिला के आरोप को सही नहीं पाया था.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसका अर्थ यह नहीं कि मां का बेटे से मिलने का अधिकार खत्म हो जाएगा. मां को दिल्ली या कीनिया में वार्षिक छुट्टियों के आधे समय तक आप भाई सुपुर्दगी मिलेगी और सप्ताह के अंत में उसे वीडियो कांफ्रेंस से बच्चे तक पहुंच मिलेगी. तीन जजों की बेंच में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने फैसले के बहुमत से असहमति जताते हुए कहा क्योंकि बच्चा 11 साल से भारत में पला बढ़ा है ऐसे में उसको बिना किसी दोस्त के कीनिया भेजने में उसके शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान होने का खतरा हो सकता है.

क्या होता है मिरर ऑर्डर
मिरर आर्डर पारित कराने का मकसद केवल यह सुनिश्चित कराना होगा कि जिस देश में बच्चे को शिफ्ट किया जा रहा है. वहां के कोर्ट को भारत की कोर्ट के द्वारा दी गई व्यवस्था के बारे में जानकारी हो. इस तरह का आदेश मां के हितों की रक्षा भी करेगा जो अपने बच्‍चे से दूर रहेंगी.
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