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निर्भीक फैसलों से अलग पहचान बना रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़

निर्भीक फैसलों से अलग पहचान बना रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़

जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ की फाइल फोटो.

जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ की फाइल फोटो.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ अपना मत रखते वक्त वह ज़रा भी नहीं हिचकते. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि सुप्रीम कोर्ट के 25 जजों में वह 18वें नंबर पर हैं.

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने निर्भीक और स्पष्ट नजरिये के कारण अपनी एक अलग ही पहचान बनाई है. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि शीर्ष अदालत के 25 जजों में वे 18वें नंबर पर हैं. वह विवाद मसलों की सुनवाई के दौरान वकीलों से कड़वे सवाल करते हैं और बेहद वरिष्ठ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की मौजूदगी में भी अपनी अलग राय रखने से नहीं हिचकते.

    कुछ ऐसा ही नजारा सोमवार को शीर्ष अदालत में राष्ट्रगान के मसले पर सुनवाई के दौरान देखा गया. जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट में अपने करियर का ज्यादातर समय चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंचों के साथ बिताया है. सोमवार को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस चंद्रचूड़ राष्ट्रगान को लेकर आई याचिका की सुनवाई कर रहे थे. यह याचिका शीर्ष कोर्ट के 2016 के उस फैसले के विरुद्ध लगाई गई थी जिसमें सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाने को अनिवार्य किया गया था.

    यह आदेश शीर्ष कोर्ट की एक अन्य बेंच ने पास किया था. उस वक्त चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा भी उस बेंच का हिस्सा थे. सुनवाई शुरू होने के 30 मिनट के अंदर ही जस्टिस चंद्रचूड़ ने 2016 के आदेश पर कड़े शब्दों में असहमति जाहिर की. इस दौरान जस्टिस मिश्रा उनके साथ ही बैठे थे.

    राष्ट्रगान बजाने के लिए कोर्ट के आदेश की आवश्यकता को लेकर अटॉर्नी जनरल के सभी तर्कों को जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक-एक कर खारिज कर दिया. उन्होंने एटॉर्नी जनरल से कड़े शब्दों में कहा कि लोगों को हर जगह देशभक्ति लेकर चलने की आवश्यकता नहीं है.

    मोरल पुलिसिंग की आलोचना करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान नहीं गाने से वह देशद्रोही नहीं हो जाएंगे. उन्होंने सरकार से सवाल किया कि यदि उन्हें लगता है कि यह इतना अनिवार्य है तो सरकार ने इसके लिये नोटिफिकेशन क्यों नहीं निकाला गया? इस दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा जस्टिस चंद्रचूड़ और अटॉर्नी जनरल की बहस ध्यान से सुनते रहे.

    यह पहली बार नहीं था, कानूनी मुद्दों पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने हमेशा अपना मत सामने रखा है. सोमवार को ही जस्टिस चंद्रचूड़ ने मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस खानविलकर से अलग राय जाहिर करते हुए एक आदेश जारी किया और सुप्रीम कोर्ट को नई तकनीक अपनाने में देरी की वजह से न्याय में हो रही देरी को लेकर चेताया.

    दो-एक की बहुमत से सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उस फैसले को ओवररूल कर दिया जिसमें परिवार न्यायालयों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये शादी से जुड़े मामलों की सुनवाई करने को कहा गया था.

    अपनी ही बेंच के इस फैसले पर असहमति जताते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि नई तकनीक को जल्दी नहीं अपनाया गया तो यह न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक होगा.

    वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के इस्तेमाल का समर्थन करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि फैसले को ओवररूल करने की आवश्कता नहीं थी.

    राइट टू प्राइवेसी के अपने फैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने मजबूती के साथ अपना पक्ष रखा था. उन्होंने अपने ही पिता जस्टिस वीवाय चंद्रचूड़ के 1975 के आजादी के अधिकार को इमरजेंसी के दौरान खत्म करने के फैसले को पलट दिया था. उन्होंने अपने पिता के फैसले को खामियों से भरा बताया था.

    सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस चंद्रचूड़ ने 17 महीने के अपने कार्यकाल में यह साबित कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों के पास समान शक्तियां हैं और केवल प्रशासनिक अधिकारों के लिहाज से मुख्य न्यायाधीश का स्थान पहला है.

    जस्टिस चंद्रचूड़ ने कई रूढ़ियों को तोड़ा है और न्यायपालिका को उन जैसी आवाजों की आवश्यकता है ताकि न्यायपालिका में लोगों का भरोसा बना रहे.

    (news18.com के लिये उत्कर्ष आनंद)

    Tags: Supreme Court

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