जस्टिस ललित ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया

न्यायमूर्ति ललित, न्यायमूर्ति विनीत सरण और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट्ट की पीठ को तीन याचिकाओं पर सुनवाई करनी थी.
न्यायमूर्ति ललित, न्यायमूर्ति विनीत सरण और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट्ट की पीठ को तीन याचिकाओं पर सुनवाई करनी थी.

जस्टिस ललित, जस्टिस विनीत सरण और जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट की पीठ को तीन याचिकाओं पर सुनवाई करनी थी. इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि रेड्डी ने न केवल न्यायपालिका के खिलाफ आरोप लगाते हुए प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे को पत्र लिखा, बल्कि एक संवाददाता सम्मेलन करके झूठे बयान भी दिए.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस यूयू ललित ने सोमवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिनमें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ न्यायपालिका पर आरोप लगाने के मामले में कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है.

जस्टिस ललित ने कहा, 'मेरे लिए मुश्किल है. वकील के तौर पर मैंने एक पक्ष का प्रतिनिधित्व किया था. मैं इसे उस पीठ के समय सूचीबद्ध करने के लिए आदेश पारित करुंगा जिसमें मैं नहीं रहूं.'

जस्टिस ललित, जस्टिस विनीत सरण और जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट की पीठ को तीन याचिकाओं पर सुनवाई करनी थी. इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि रेड्डी ने न केवल न्यायपालिका के खिलाफ आरोप लगाते हुए प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे को पत्र लिखा, बल्कि एक संवाददाता सम्मेलन करके झूठे बयान भी दिए.



आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने छह अक्टूबर को अभूतपूर्व तरीके से प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि उनकी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को 'अस्थिर करने और गिराने के लिए आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का इस्तेमाल किया जा रहा है.'
तीन अलग-अलग याचिकाएं वकील जीएस मणि, वकील सुनील कुमार सिंह तथा 'एंटी-करप्शन काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट' की ओर से दायर की गई हैं.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में कहा गया है कि जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्‍होंने सार्वजनिक तौर पर शीर्ष अदालत के दूसरे वरिष्ठतम जज जस्टिस एनवी रमन्‍ना के खिलाफ बिना किसी आधार के इस तरह के अपमानजनक आरोप लगाए. दलील में कहा गया कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनके निष्कासन के लिए उचित कार्रवाई उनके खिलाफ तत्काल शीर्ष अदालत द्वारा की जानी चाहिए.
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