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SC/ST एक्ट: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बात मानी, अब फिर से पहले की तरह तुरंत होगी गिरफ्तारी

News18Hindi
Updated: October 1, 2019, 3:37 PM IST
SC/ST एक्ट: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बात मानी, अब फिर से पहले की तरह तुरंत होगी गिरफ्तारी
सांकेतिक तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) ने 20 मार्च 2018 को एससी/एसटी ऐक्ट में बदलाव करते हुए तुरंत गिरफ्तारी पर रोक हटा दी थी.

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  • Last Updated: October 1, 2019, 3:37 PM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) ने एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Ac) मामले में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया है. अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले को पलट दिया है. यानी इस एक्ट के तहत अब पहले की तरह ही शिकायत के बाद तुरंत गिरफ्तारी हो सकेगी. बता दें कि 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए तुरंत गिरफ्तारी पर रोक हटा दी थी. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पहले जांच होगी और फिर गिरप्तारी होगी.

न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने केन्द्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर ये फैसला सुनाया. पीठ ने कहा कि समानता के लिये अनुसूचित जाति और जनजातियों का संघर्ष देश में अभी खत्म नहीं हुआ है. पीठ ने कहा कि समाज में अभी भी ये वर्ग के लोग छुआछूत और अभद्रता का सामना सामना कर रहे हैं और वे बहिष्कृत जीवन गुजारते हैं.

शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत अनुसूचित जाति और जनजातियों के लोगों को संरक्षण प्राप्त है, लेकिन इसके बावजूद उनके साथ भेदभाव हो रहा है. इस कानून के प्रावधानों के दुरूपयोग और झूठे मामले दायर करने के मुद्दे पर न्यायालय ने कहा कि ये जाति व्यवस्था की वजह से नहीं, बल्कि मानवीय विफलता का नतीजा है.

पीठ ने 18 सितंबर को इस पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई पूरी की थी. पीठ ने न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ के 20 मार्च, 2018 के फैसले पर टिप्पणी करते हुये सवाल उठाया था कि क्या संविधान की भावना के खिलाफ कोई फैसला सुनाया जा सकता है.



पीठ ने कानून के प्रावधानों के अनुरूप ‘समानता लाने’ के लिये कुछ निर्देश देने का संकेत देते हुये कहा था कि आजादी के 70 साल बाद भी देश में अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों के साथ ‘भेदभाव’ और ‘छुआछूत’ बरती जा रही है. यही नहीं, न्यायालय ने हाथ से मलबा उठाने की कुप्रथा और सीवर तथा नालों की सफाई करने वाले इस समुदाय के लोगों की मृत्यु पर गंभीर रुख अपनाते हुये कहा था कि दुनिया में कहीं भी लोगों को ‘मरने के लिये गैस चैंबर’ में नहीं भेजा जाता है.

पीठ ने कहा था, ‘‘यह संविधान की भावना के खिलाफ है। क्या किसी कानून और संविधान के खिलाफ सिर्फ इस वजह से ऐसा कोई आदेश दिया जा सकता है कि कानून का दुरूपयोग हो रहा है? क्या किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर किसी के प्रति संदेह व्यक्त किया जा सकता है? सामान्य वर्ग का व्यक्ति भी फर्जी प्राथमिकी दायर सकता है’’

(भाषा इनपुट के साथ)

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First published: October 1, 2019, 12:45 PM IST
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अपडेटेड: April 09 (05:00 PM)
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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