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सुप्रीम कोर्ट में मराठा आरक्षण के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई जनवरी, 2020 तक टली

News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 12:19 PM IST
सुप्रीम कोर्ट में मराठा आरक्षण के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई जनवरी, 2020 तक टली
महाराष्‍ट्र में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण बरकरार रखने के बॉम्‍बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई.

राज्‍यपाल भगत सिंह कोश्‍यारी (Bhagat Singh Koshyari) ने राज्‍य सरकार का पक्ष रखने के लिए पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को नियुक्‍त किया था. दरअसल, देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadanvis) सरकार ने मराठा समुदाय (Maratha Community) के लिए शिक्षा और नौकरियों में 16 फीसदी आरक्षण (Reservation) की व्‍यवस्‍था कर दी थी. फडणवीस सरकार के फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) में याचिका दायर की गई. हाईकोर्ट ने आरक्षण की कानूनी वैधता को बरकरार रखा, जिसे सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में चुनौती दी गई है.

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  • Last Updated: November 19, 2019, 12:19 PM IST
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नई दिल्‍ली. महाराष्‍ट्र में मराठा समुदाय (Maratha Community) के लोगों को शिक्षा (Education) और नौकरी (Jobs) में आरक्षण (Reservation) की कानूनी वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. शीर्ष अदालत (Supreme Court) ने मंगलवार को इस मामले की सुनवाई की. राज्‍यपाल भगत सिंह कोश्‍यारी (Bhagat Singh Koshyari) ने राज्‍य सरकार का पक्ष रखने के लिए पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को नियुक्‍त किया था. अब मामले की सुनवाई जनवरी, 2020 में होगी. बता दें कि आरक्षण के लिए मराठा समाज के संघर्ष के बाद देवेंद्र फडणवीस सरकार ने मराठा समुदाय के लिए शिक्षा और नौकरियों में 16 फीसदी आरक्षण की व्‍यवस्‍था कर दी. फडणवीस सरकार के फैसले के खिलाफा बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) में याचिका दायर की गई. हाईकोर्ट ने आरक्षण की कानूनी वैधता को बरकरार रखा, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

राजनीतिक दबाव में बनाया गया था एसईबीसी कानून
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका के मुताबिक, फडणवीस सरकार ने 16 फीसदी आरक्षण देकर संविधान पीठ (Constitution Bench) की ओर से आरक्षण पर तय 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन किया है. साथ ही आरोप लगाया गया है कि राजनीतिक दबाव में सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (SEBC) आरक्षण कानून बनाया गया. एसईबीसी आरक्षण कानून मराठा समुदाय को शिक्षा में 12 और नौकरी में 13 प्रतिशत आरक्षण देता है. यह शीर्ष अदालत के इंदिरा साहनी मामले में दिए फैसले में तय की गई 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लंघन है. यह याचिका गैरसरकारी संगठन 'यूथ फॉर इक्‍वैलिटी' के प्रतिनिधि और बॉम्बे हाईकोर्ट के अधिवक्ता संजीत शुक्ला ने दायर की है. इसमें दावा किया गया है कि मराठा समुदाय के लिए बनाया गया एसईबीसी कानून संविधान के समानता और कानून के शासन के सिद्धांतों की अवहेलना करता है.

तय सीमा को असाधारण परिस्थिति में कर सकते हैं पार
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वकील पूजा धर (Advocate Pooja Dhar) के जरिये दायर याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट ने केवल इस तथ्य को असाधारण परिस्थिति मानकर गलती कर दी कि अगर मराठा समुदाय को मौजूदा ओबीसी (OBC) श्रेणी में डाला गया, तो अन्य ओबीसी को मराठा समुदाय के साथ अपना आरक्षण कोटा साझा करना होगा. इंदिरा साहनी मामले (Indira Sahani Case) में निर्धारित की गई 50 प्रतिशत की सीमा को केवल असाधारण परिस्थिति में ही तोड़ा जा सकता है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी 27 जून को दिए अपने फैसले में कहा था कि न्यायालय की ओर से तय की गई आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा को असाधारण परिस्थितियां में ही पार किया जा सकता है.

मराठा क्रांति मोर्चा ने सोमवार को राज्‍यपाल से की मुलाकात
राज्‍यपाल की ओर से मामले में मुकुल रोहतगी की नियुक्ति से पहले मराठा क्रांति मोर्चा ने सोमवार को कोश्‍यारी और राज्य के मुख्य सचिव अजोय मेहता से मुलाकात कर सुप्रीम कोर्ट में मराठा आरक्षण की पैरवी के लिए विधि विशेषज्ञों का दल उतारने की मांग की. अगर ऐसा नहीं हुआ तो मराठा समाज का आरक्षण के लिए दिया गया बलिदान बेकार चला जाएगा. दिलीप पाटील के अनुसार मुख्य सचिव और राज्यपाल से मांग की गई कि जैसे हाईकोर्ट में आरक्षण को बचाने के लिए कानूनविदों की मजबूत टीम का गठन किया गया था वैसे ही शीर्ष न्यायालय में होना चाहिए.

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First published: November 19, 2019, 12:12 PM IST
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