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राजद्रोह की धारा IPC 124A के खिलाफ दायर अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार किया

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस  एस. ए. बोबडे ने मामले की सुनवाई करतें हुए कहा कि याचिकाकर्ता इससे कैसे प्रभावित है.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस. ए. बोबडे ने मामले की सुनवाई करतें हुए कहा कि याचिकाकर्ता इससे कैसे प्रभावित है.

राजद्रोह की धारा IPC 124A के खिलाफ दायर याचिका में याचिकाकर्ता ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है और यह पूरा मामला जनहित का मुद्दा है. इस मामले में संवैधानिक पीठ के फैसले का उल्लंघन हो रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 9, 2021, 2:18 PM IST
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नई दिल्ली. राजद्रोह की धारा IPC 124A (भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए) के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इंकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए. बोबडे ने मामले की सुनवाई करतें हुए कहा कि याचिकाकर्ता इससे कैसे प्रभावित है... आप पर क्या कॉज ऑफ एक्शन है... आपके खिलाफ कोई केस नहीं है... हमने पहले ही तय कर रखा है कि जब तक कोई कॉज ऑफ एक्शन नहीं होगा तो आप इसी तरह कानून को चुनौती नहीं दे सकते हैं. हमारे पास ऐसा कोई केस नहीं है जो जेल में लड़ रहा हो आप अगर ठोस केस के साथ आते हैं तो देखेंगे.

वहीं मामले की सुनवाई के दौरान हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है और यह पूरा मामला जनहित का मुद्दा है. इस मामले में संवैधानिक पीठ के फैसले का उल्लंघन हो रहा है.

गौरतलब है कि राजद्रोह से संबंधित कानून को गैर-संवैधानिक घोषित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है.  सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि औपनिवेशिक काल का यह कानून लोकतांत्रिक देश में जारी रखने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. वही इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है और नागरिकों के मौलिक अधिकार का गला घोंटा जा रहा है.



सुप्रीम कोर्ट में वकील आदित्य रंजन, वरुण कुमार और अन्य की ओर से दाखिल अर्जी में कहा गया है कि आईपीसी की धारा-124 ए के दुरुपयोग के मामले बढ़े हैं. संवैधानिक लोकतंत्र और लोगों को मिले मौलिक अधिकार पर उसका डरावना प्रभाव पड़ रहा है. कानून का गलत तरीके से दुरुपयोग किया जा रहा है. पत्रकारों, महिलाओं, बच्चों और स्टूडेंट्स के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल हो रहा है और इस कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या की ये अवहेलना है.  देश में लोकतांत्रिक सिद्धांत का विकास हो रहा है और धारा-124 ए औपनिवेशिक काल की निशानी के तौर पर अभी भी बरकरार है.
याचिका में कहा गया है कि आईपीसी की धारा-124 ए (राजद्रोह) ब्रिटिश काल का औपनिवेशिक कानून है. ये कानून ब्रिटिश राज के खिलाफ आवाज को कुचलने के लिए था जिसे लोकतंत्र में जारी रखने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. यह कानून अब अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट रहा है.  जो सरकार में है अगर कोई उसकी नीति के विपरीत अभिव्यक्ति करता है तो 124 ए का प्रावधान उसकी अभिव्यक्ति का गला घोंट रहा है और इस तरह से जीवन और लिबर्टी के अधिकार को खतरा है.

याचिकाकर्ता ने कहा कि ड्रेकोनियन औपनिवेशिक कानून आईपीसी की धारा-124 ए को जारी रखना अतार्किक, अनुचित और अनापेक्षित है. ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अगर पुलिस इस कानून का दुरुपयोग करे तो उसकी जिम्मेदारी तय हो. यह कानून बिना किसी सेफगार्ड के है. बदली परिस्थितियों में 124 ए का परीक्षण करने की जरूरत है.
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