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फांसी की सजा लटकाने के तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बंद होना चाहिए मुकदमेबाजी का दौर

News18Hindi
Updated: January 24, 2020, 9:44 AM IST
फांसी की सजा लटकाने के तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बंद होना चाहिए मुकदमेबाजी का दौर
.(PTI Photo)

निर्भया मामले (Nirbhaya Case) की पृष्ठभूमि में एक ओर जहां सरकार ने मांग की है कि सात दिनों की समय सीमा तय की जाये तो वहीं सीजेआई एसए बोबड़े (CJI SA Bobde) ने भी गंभीर टिप्पणी की है.

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  • Last Updated: January 24, 2020, 9:44 AM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने फांसी सजा पाये दोषियों द्वारा कानूनी दांव पेंच का इस्तेमाल कर इसे उलझाने पर गंभीर टिप्पणी की है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े (CJI SA Bobde) ने कहा कि फांसी की सजा के खिलाफ अपीलों का एक अंत आवश्यक है. सीजेआई ने कहा कि दोषी को यह कभी नहीं लगना चाहिए कि फांसी की सजा से जुड़ा एक सिरा हमेशा खुला रहेगा और सजा को चुनौती दी जाती रहेगी.

दिल्ली में 2012 में घटे निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्याकांड (Nirbhaya Case) में मौत की सजा पाये चार दोषियों द्वारा एक बाद एक याचिकाएं दाखिल करने और उनकी फांसी में देर होने की पृष्ठभूमि में अदालत ने कहा कि इसे कानून के अनुसार करना होगा और न्यायाधीशों का भी समाज तथा पीड़ितों के प्रति कर्तव्य है.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस एस अब्दुल नजीर औरजस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने परिवार के सात सदस्यों की हत्या करने के जुर्म में मौत की सजा पाने वाली महिला और उसके प्रेमी की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं. उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में 2008 में घटी इस सनसनीखेज वारदात में महिला ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने माता-पिता, दो भाइयों, उनकी पत्नियों और 10 महीने के भांजे की गला घोंटकर हत्या कर दी थी.

पीठ ने दोनों दोषियों को मौत की सजा सुनाये जाने के 2015 के अपने फैसले के खिलाफ उनकी पुनर्विचार याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा.

सलीम और शबनम का प्रेम प्रसंग चल रहा था 
पीठ ने कहा, ‘कोई किसी चीज के लिए अनवरत नहीं लड़ता रह सकता.’ दोषियों के वकीलों आनंद ग्रोवर और मीनाक्षी अरोड़ा ने शबनम और उसके प्रेमी सलीम की मौत की सजा को इस आधार पर कम करने की मांग की कि उन्हें सुधरने का अवसर दिया जाए. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका पुरजोर विरोध किया.

उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पक्ष रख रहे मेहता ने कहा, ‘कोई दोषी अपने माता-पिता की हत्या के बाद यह कहकर दया की मांग नहीं कर सकती कि ओह मैं अब अनाथ हो गयी.’ पीठ ने टिप्पणी की कि प्रत्येक अपराधी के बारे में कहा जाता है कि वह दिल से निर्दोष है लेकिन हमें उसके द्वारा किये गये अपराध पर भी गौर करना होगा.शीर्ष अदालत ने 15 अप्रैल , 2008 को हुये इस अपराध के लिये सलीम और शबनम की मौत की सजा 2015 में बरकरार रखी थी. दोनों मुजरिमों को निचली अदालत ने मौत की सजा सुनायी थी जिसे 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था. सलीम और शबनम का प्रेम प्रसंग चल रहा था और वे शादी करना चाहते थे लेकिन महिला का परिवार इसका विरोध कर रहा था.

मृत्युदंड के लिए सात दिन की सीमा तय करने की याचिका
इससे पहले गुरुवार को ही केंद्र सरकार ने मौत की सजा का वारंट जारी किये जाने के बाद दोषियों को फांसी देने के लिए सात दिन की समयसीमा तय करने की अपनी याचिका पर गुरूवार को उच्चतम अदालत से तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया और कहा कि दोषी न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हैं. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस एस ए बोबडे और जस्टिस एस ए नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि गृह मंत्रालय की याचिका को लिया जाए और 2014 के शत्रुघन चौहान मामले में जारी दिशानिर्देशों को बदलकर पीड़ित केंद्रित बनाया जाए जो अभी दोषी केंद्रित हैं.

पीठ ने मेहता से कहा, ‘जब आपकी याचिका सुनवाई के लिए आए तो आप दलील रखें.’ गृह मंत्रालय ने बुधवार को अदालत में दाखिल अपनी अर्जी में कहा कि शीर्ष अदालत को सभी सक्षम अदालतों, राज्य सरकारों और जेल प्राधिकारियों के लिये यह अनिवार्य करना चाहिये कि ऐसे दोषी की दया याचिका अस्वीकृत होने के सात दिन के भीतर सजा पर अमल का वारंट जारी करें और उसके बाद सात दिन के अंदर मौत की सजा दी जाए, चाहे दूसरे सह-मुजरिमों की पुनर्विचार याचिका, सुधारात्मक याचिका या दया याचिका लंबित ही क्यों नहीं हों.

मंत्रालय ने यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया है कि अगर मौत की सजा पाने वाला मुजरिम दया याचिका दायर करना चाहता है तो उसके लिये फांसी दिये जाने संबंधी अदालत का वारंट मिलने की तारीख से सात दिन के भीतर दायर करना अनिवार्य किया जाये. (एजेंसी इनपुट के साथ)

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First published: January 24, 2020, 9:38 AM IST
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