25 साल बाद पलटा केस, बरी होगा कैदी? सुप्रीम कोर्ट ने भी उम्रकैद की सजा पर लगाई थी मुहर

यरावडा जेल के एक कैदी ने बीए-एमए की पढ़ाई की. इसके बाद टूरिज्म का कोर्स किया. हिन्दी और मराठी सीखी. अब 25 साल बाद उसकी रिहाई की संभावनाएं बढ़ रही हैं.

News18Hindi
Updated: July 2, 2019, 10:38 AM IST
25 साल बाद पलटा केस, बरी होगा कैदी? सुप्रीम कोर्ट ने भी उम्रकैद की सजा पर लगाई थी मुहर
नारायण को यरावडा जेल में अब एक आदर्श कैदी के रूप में देखा जाता है. जेल में आने के बाद उन्होंने हिन्दी और मराठी सीखी.
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Updated: July 2, 2019, 10:38 AM IST
नारायण चेतनराम चौधरी अब 39 साल के हैं. उन्होंने अपने जिंदगी का दो-तिहाई हिस्सा जेल में गुजार दिया. साल 1994 में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. उन्हें एक परिवार के पांच लोगों की हत्या का दोषी करार दिया गया था. इनमें दो बच्चे और एक गर्भवती महिला शामिल थीं. इसे दुर्लभतम मामलों में रखा गया था, लेकिन महाराष्ट्र के पुणे की यरावडा सेंट्रल जेल में करीब 25 साल ‌बिताने के बाद उनसे जुड़ी कुछ बड़ी खबरें आ रही हैं.

आदर्श कैदी के रूप में हुए स्‍थापित, पूरा किए BA-MA
नारायण को यरावडा जेल में अब एक आदर्श कैदी के रूप में देखा जाता है. जेल में आने के बाद उन्होंने हिन्दी और मराठी सीखी. इसके बाद सामाजिक विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई की. इसके बाद मार्स्टर्स की डिग्री समाजशास्‍त्र में ली. यही नहीं ओपेन यूनिवर्सिटी से एमए के बाद उन्होंने टूरिज्म एक कोर्स किया. लेकिन इन सब पर तब झटका लगा जब साल बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा दी. बाद में साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगा दी.

‌फिर से बदल गई नारायण की कहानी

साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से नारायण की सजा पर मुहर लगने के बाद उनकी सारी उम्मीदें खत्म हो गई थीं. लेकिन इस साल केस में एक नया मोड़ आया है. हालांकि ये मोड़ उनकी डिग्र‌ियों के चलते नहीं बल्कि उनकी शुरुआती पढ़ाई के चलते आया है. असल में जेल आने से पहले वे राजस्‍थान के बिकानेर जिले के एक स्कूल के छात्र थे.



जब मिली उम्रकैद की सजा तब उम्र थी 14 साल
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भारतीय दंड विधान के अनुसार किसी भी नाबालिग को मृत्यूदंड या इसके समकक्ष की सजा नहीं दी जा सकती. नारायण के स्कूल से मिले कुछ सर्टिफिकेट के अनुसार जब उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई तो उनकी उम्र महज 14 साल थी. तब वे एक जुवेनाइल थे. इसलिए उनके ऊपर जुवेनाइल एक्ट के अनुसार केस चलना चाहिए था और उसी के अनुसार सजा का ऐलान होना चाहिए था. लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ.

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1994 में सेशन कोर्ट ने नारायण की उम्र 20 साल मानी थी
साल 1994 में मामले की सुनवाई कर रही सेशन कोर्ट ने नारायण की उम्र 20 साल बताते हुए उसे पहली बार उम्रकैद की सजा सुनाई थी.



घटना के समय नाबालिग थे नारायण
नारायण के मामले की सुनवाई की दौरान उसकी उम्र को लेकर कभी कोई बात नहीं हुई. अब जाकर नारायण के वकील ने इस तथ्य को उभारा है. लेकिन पिछले साल कोर्ट ने इस मसले पर दोबारा सुनवाई से मना कर दिया था. पर इस साल जनवरी में कोर्ट ने इस मामले को दोबारा संज्ञान में लिया है.

तीन जजों के बेंच ने नारायण को लेकर दिया निर्देश
इस साल जनवरी ने सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने राजस्‍थान के बिकानेर स्कूल के दस्तावेजों पर संज्ञान लेते हुए जिला के प्रधानचार्य और पुणे के सेशन जज को इस मसले पर दोबारा विचार करने के लिए कहा है. साथ ही यह बताने को कहा है कि घटना के वक्त नारायण नाबालिग था या नहीं?



पुलिस बता चुकी 12 साल उम्र
मामले में पुणे पुलिस ने पहले ही नारायण को आपराधिक घटना के वक्त 12 साल छह महीने का बताया था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी टिप्पणी करते हुए- "किशोर पर कभी भी मृत्युदंड नहीं लगाया जा सकता" कहा कि यह तय किया जाना चाहिए कि वह तब किशोर था या वयस्क.

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ऐसे में नारायण के मामले को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है. जबकि नारायण के लिए एक बार फिर से कारावास से बाहर आने की उम्मीद जग गई है.

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First published: July 2, 2019, 9:42 AM IST
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