आस्था vs अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हर धर्म में है संपूर्ण न्याय की जरूरत

आस्था vs अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हर धर्म में है संपूर्ण न्याय की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की 9 सदस्यीय बेंच ने सोमवार को सबरीमाला मंदिर (Sabarimala temple) से जुड़े मामले पर सुनवाई की. इस दौरान कोर्ट ने कहा कि जब मामला आस्था बनाम अधिकार का हो तो हर धर्म में संपूर्ण न्याय की जरूरत है.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आस्था और अधिकार मामले में अहम फैसला सुनाया. उसने कहा कि जब मामला आस्था बनाम अधिकार का हो तो हर धर्म में संपूर्ण न्याय की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने यह बात सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Case) से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान कही. इस मामले की सुनवाई शीर्ष अदालत की नौ सदस्यीय बेंच कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में फैसला सुनाया था कि केरल के सबरीमाला मंदिर (Sabarimala temple) में हर उम्र की महिलाएं प्रवेश कर सकती हैं. यह ऐतिहासिक फैसला था, जिसका उदारपंथियों ने स्वागत किया. वहीं, दक्षिणपंथी संगठन ने इसे आस्था में दखल करार दिया. फैसले का विरोध कर रहे लोगों ने इस मामले में रिव्यू पिटीशन लगाया. रिव्यू पिटीशन की सुनवाई कर रही कॉन्टीट्यूशन बेंच ने इस मामले को बड़ी बेंच को रेफर करने का निर्णय लिया. उसने साथ ही कहा कि इस सुनवाई में मस्जिद, पारसी मंदिर आदि उन जगहों को भी जोड़ लिया जाए, जहां महिलाओं के प्रवेश करने पर रोक या विवाद है.

अब इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एसए. बोबडे (Chief Justice SA Bobde) की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय बेंच कर रही है. बेंच ने 10 फरवरी को सुनवाई के लिए सात सवाल तय किए थे. इस बीच सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें कहा गया है चूंकि सबरीमाला केस में स्टे नहीं लगा है, इसलिए दर्शन के लिए जाने वाली महिलाओं को सुरक्षा दी जाए.



सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी को सुनवाई के लिए तए किए अपने सवालों पर स्पष्ट किया. इसमें कहा गया कि ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकारक्षेत्र से बाहर जा रहा है. यह मामला नौ सदस्यीय बेंच को इसीलिए रेफर किया गया था ताकि मामले में संपूर्ण न्याय हो सके. कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्टिकल 142 के तहत पेंडिंग रिव्यू पिटीशन को भी बड़ी बेंच को रेफर किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह आपत्ति भी खारिज कर दी, जिसमें कहा गया था कि पांच सदस्यीय बेंच उन मामलों को रेफर नहीं कर सकती जो उसके सामने लाए ही नहीं गए थे. 29 पेज के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राइट ऑफ माइनॉरिटी से लेकर राइट टू प्राइवेसी तक कई उदाहरण भी दिए और कहा कि जब संपूर्ण न्याय के लिए ऐसा करना जरूरी हो तो यह किया जा सकता है. हालांकि, कोर्ट ने इस मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है. उसने कहा कि अंतिम निर्णय के लिए कुछ इंतजार करना पड़ेगा.

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