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एडल्टरी लॉ पर फैसला देते वक्त किस जज ने क्या कहा?

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Updated: September 27, 2018, 1:53 PM IST
एडल्टरी लॉ पर फैसला देते वक्त किस जज ने क्या कहा?
सीजेआई दीपक मिश्रा

फैसला सुनाते हुए प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, 'IPC की धारा सेक्शन 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है. महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए. महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता.'

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला देते हुए एडल्टरी (व्यभिचार) को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है. कोर्ट ने एडल्टरी (व्यभिचार) मामले में IPC की धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया है. भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की बेंच में शामिल जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस आरएफ नरीमन, डीवाई चंद्रचूड़ और एक मात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा ने सर्वसम्मति से सेक्शन 497 को असंवैधानिक करार दिया. आइए, जानते हैं फैसला सुनाते वक्त जजों ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा

>>'संविधान की खूबसूरती यही है कि उसमें ‘मैं, मेरा और तुम’ सभी शामिल हैं.' CJI ने कहा, 'अडल्टरी तलाक का आधार हो सकता है, लेकिन यह अपराध नहीं होगा.'
>>'एक लिंग के व्यक्ति को दूसरे लिंग के व्यक्ति पर कानूनी अधिकारी देना गलत है. इसे शादी रद्द करने का आधार बनाया जा सकता है, लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है.'



>>'IPC की धारा सेक्शन 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है. महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए. महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता.'


>>'पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है. संसद ने भी महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा पर कानून बनाया हुआ है.'

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जस्टिस एएम खानविलकर
>>'एडल्टरी किसी तरह का अपराध नहीं है, लेकिन अगर इस वजह से आपका पार्टनर खुदकुशी कर लेता है, तो फिर उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है.'
>>'चीन, जापान, ब्राजील में ये एडल्टरी अपराध नहीं है. ये पूरी तरह से निजता का मामला है. एडल्टरी 'अनहैपी मैरेज' का केस भी नहीं हो सकता, क्योंकि अगर इसे अपराध मानकर केस करेंगे, तो इसका मतलब दुखी लोगों को सजा देना होगा.'

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़
>>'एडल्टरी कानून मनमाना है. यह महिला की सेक्सुअल चॉइस को रोकता है और इसलिए असंवैधानिक है. महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है.'



जस्टिस रोहिंटन नरीमन
>>'एडल्टरी संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है. IPC 497 अपने आप में मनमानी है.'

जस्टिस इंदु मल्होत्रा
>>'कोई ऐसा कानून जो पत्नी को कमतर आंके, ऐसा भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. एक महिला को समाज की मर्जी के मुताबिक सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.'

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बता दें कि इससे पहले 8 अगस्त को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि एडल्टरी अपराध है और इससे परिवार और विवाह तबाह होता है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली संवैधानिक बेंच ने सुनवाई के बाद कहा था कि मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा.

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First published: September 27, 2018, 12:28 PM IST
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