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शादी और तलाक पर 'समान कानून' की मांग वाली याचिका पर SC ने केंद्र से मांगा जवाब

तलाक, गोद लेने, संरक्षकता, उत्तराधिकार, विरासत, भरण-पोषण, विवाह की उम्र और गुजारा भत्ता के लिए समान, धर्म और लिंग के लिहाज से तटस्थ कानून बनाने के लिए SC ने  केंद्र से 3 सप्ताह के भीतर व्यापक जवाब मांगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

तलाक, गोद लेने, संरक्षकता, उत्तराधिकार, विरासत, भरण-पोषण, विवाह की उम्र और गुजारा भत्ता के लिए समान, धर्म और लिंग के लिहाज से तटस्थ कानून बनाने के लिए SC ने केंद्र से 3 सप्ताह के भीतर व्यापक जवाब मांगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इन याचिकाओं में समान गोदनामा, उत्तराधिकार और शादी की उम्र तय करने की मांग की गई है. इसके अलावा एक याचिका में वैवाहिक वि ...अधिक पढ़ें

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नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के लिए तलाक, गोद लेने, संरक्षकता, उत्तराधिकार, विरासत, भरण-पोषण, विवाह की उम्र और गुजारा भत्ता के लिए समान, धर्म और लिंग के लिहाज से तटस्थ कानून बनाने के लिए सरकार को निर्देश देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सोमवार को केंद्र से 3 सप्ताह के भीतर व्यापक जवाब मांगा. याचिका में कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए, चाहे वे किसी भी धर्म का पालन करते हों, तलाक व गुजारा भत्ता का आधार समान होना चाहिए.

शीर्ष अदालत ने कहा कि क्या कानून बनाने के लिए परमादेश की रिट के रूप में इस तरह का निर्देश विधायिका को जारी किया जा सकता है, ‘यह एक बुनियादी सवाल होगा’. सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट्ट की पीठ ने पेशे से वकील याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को अदालत के प्रति निष्पक्ष रहने और इन मुद्दों पर उनके द्वारा दायर इसी तरह की याचिकाओं का विवरण प्रदान करने के लिए कहा, ताकि सभी पर एक साथ विचार किया जा सके.

इन याचिकाओं में समान गोदनामा, उत्तराधिकार और शादी की उम्र तय करने की मांग की गई है. इसके अलावा एक याचिका में वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण और गुजारा भत्ता देने में सभी नागरिकों के लिए एक समान लिंग एवं धर्म-तटस्थ आधार की मांग की गई है. इसमें उत्तराधिकार और विरासत के आधार पर विसंगतियों को दूर करने व उन्हें सभी नागरिकों के लिए लिंग-तटस्थ, धर्म-तटस्थ और समान बनाने की मांग की गई है. एक अन्य याचिका में संविधान व अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिहाज से तलाक के लिए समान आधार तय करने की मांग की गई है.

वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका में कहा गया कि आजादी व देश के समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र बनने के बावजूद रखरखाव और गुजरा भत्ता के कानून न केवल जटिल हैं बल्कि ज्यादातर संविधान के खिलाफ हैं. ये समान, तर्कसंगत और न्यायपूर्ण नहीं हैं. एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने आरोप लगाया कि जनहित याचिका दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता ने इसी तरह की अन्य याचिका दायर करने के बारे में अदालत को सूचित नहीं किया. उन्होंने आरोप लगाया कि समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका उसी याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया और फिर इस तरह की राहत की मांग करने वाली एक अन्य याचिका दायर की गई.

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों के संबंध में केंद्र के रुख का संकेत देते हुए व्यापक जवाब देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है.’ उपाध्याय ने पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर कर केंद्र को तलाक, गोद लेने, संरक्षकता, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, शादी की उम्र और गुजारा भत्ता के लिए एक समान और धर्म और लिंग के लिहाज से तटस्थ कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की है. पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा, ‘इन मामलों पर आपके क्या विचार हैं?’ सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘यह अनिवार्य रूप से कानून का सवाल होगा. लेकिन, मैं इन याचिकाओं की समीक्षा करूंगा, मुझे निर्देश लेने दें.’

Tags: Divorces, Marriage Law, Supreme Court

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