वैक्सीनेशन के लिए अलॉट 35000 करोड़ रुपये कहां खर्च किए? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगी जानकारी

देश में टीकाकरण 16 जनवरी से जारी है. (सांकेतिक तस्वीर)

देश में टीकाकरण 16 जनवरी से जारी है. (सांकेतिक तस्वीर)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जारी रखेगा और यह देखेगा कि जो नीतियां हैं, वे तार्किकता के अनुरूप हैं या नहीं.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने केंद्र की कोविड टीकाकरण नीति  (Covid Vaccination Policy) को ‘प्रथम दृष्टया मनमानापूर्ण एवं अतार्किक’ करार दिया जिसमें पहले दो चरणों में संबंधित समूहों को टीके की मुफ्त खुराक दी गयी और अब राज्यों एवं निजी अस्पतालों को 18-44 साल आयु वर्ग के लोगों से शुल्क वसूलने की अनुमति दी गयी है. न्यायालय ने केंद्र को इसकी समीक्षा करने का आदेश दिया और कहा कि जब कार्यपालिका की नीतियां नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं तो अदालतें खामोश नहीं रह सकतीं.

कोविड टीकाकरण नीति का विस्तार से मूल्यांकन करने का प्रयास करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र से कई सूचनाएं मांगीं और यह भी जानना चाहा कि टीकाकरण के लिए निर्धारित 35,000 करोड़ रुपये अब तक कैसे खर्च किए गए हैं. इसने नीति के संबंध में सभी संबंधित दस्तावेज एवं फाइल नोटिंग भी उपलब्ध कराने को कहा. कोर्ट ने पूछा कि वैक्सीनेशन के लिए आवंटित रकम से 18-44 वर्ष के लोगों का फ्री टीकाकरण क्यों नहीं हो सकता है?

सरकार से सवालों पर दो सप्ताह में जवाब मांगा 

शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर बुधवार को अपलोड किए गए 31 मई के इस आदेश में उदारीकृत टीकाकरण नीति, केंद्र एवं राज्यों एवं निजी अस्पतालों के लिए टीके के अलग-अलग दाम, उनके आधार, ग्रामीण एवं शहरी भारत के बीच विशाल डिजिटल अंतर के बाद भी टीके के स्लॉट बुक कराने के लिए कोविन ऐप पर अनिवार्य पंजीकरण आदि को लेकर केंद्र के फैसले की आलोचना की गयी है और सरकार से सवालों पर दो सप्ताह में जवाब मांगा गया है.
न्यायालय ने कहा कि वह नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जारी रखेगा और यह देखेगा कि जो नीतियां हैं, वे तार्किकता के अनुरूप हैं या नहीं. जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एल. एन. राव और जस्टिस एस. रवींद्र भट की एक विशेष पीठ ने कहा कि यह कहना सही नहीं होगा कि शक्तियों का पृथककरण संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा है और नीति-निर्माण कार्यपालिका के एकमात्र अधिकार क्षेत्र में है.

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘हमारे संविधान में यह परिकल्पित नहीं है कि जब कार्यपालिका की नीतियां नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं तो अदालतें मूकदर्शक बनी रहें. न्यायिक समीक्षा और कार्यपालिका द्वारा तैयार की गई नीतियों के लिए संवैधानिक औचित्य को परखना एक आवश्यक कार्य है, और यह काम न्यायालयों को सौंपा गया है.’




केंद्र ने अपने हलफनामे कहा था कि न्यायपालिका को नीति निर्माण के क्षेत्राधिकार में कदम नहीं रखना चाहिए. न्यायालय ने कहा कि वर्तमान में वह विभिन्न हितधारकों को महामारी के प्रबंधन के संबंध में संवैधानिक शिकायतों को उठाने के लिए एक मंच प्रदान कर रहा है. पीठ ने कोविड प्रबंधन पर स्वत: संज्ञान मामले में अपना आदेश पारित किया.

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