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जम्मू में हिरासत में लिए गए रोहिंग्या शरणार्थियों की तत्काल रिहाई की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट कल सुनाएगा फैसला

पीठ ने विधि आयोग के समक्ष प्रतिवेदन की अनुमति देने से इनकार कर दिया

पीठ ने विधि आयोग के समक्ष प्रतिवेदन की अनुमति देने से इनकार कर दिया

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हिरासत में रखा रोहिंग्या को भूषण ने अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें कहा गया है कि म्यांमार ने रोहिंग्याओं के संरक्षित समूह के रूप में रहने के अधिकारों का सम्मान करने के लिए विशेष उद्देश्य से कोई ठोस कदम नहीं उठाया है.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) जम्मू में हिरासत में लिए गए रोहिंग्या शरणार्थियों (Rohingya Refugees) की तत्काल रिहाई और केंद्र द्वारा उन्हें म्यांमार निर्वासित करने के किसी भी आदेश को लागू करने से रोकने के अनुरोध वाली एक नई याचिका पर कल अहम फैसला सुनाएगा. प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम की पीठ कल अपना अहम फैसला सुनाएगी. प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम की पीठ  ने याचिका पर विस्तार से दलीलें सुनने के बाद कहा, हम इसे आदेश के लिए सुरक्षित रख था.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि रोहिंग्या समुदाय के बच्चों को मारा जाता है, उन्हें अपंग कर दिया जाता है और उनका यौन शोषण किया जाता है. उन्होंने कहा कि म्यांमार की सेना अंतरराष्ट्रीय मानवीयता कानून का सम्मान करने में विफल रही है. केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील म्यांमार की समस्याओं की यहां बात कर रहे हैं.

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हिरासत में रखा रोहिंग्या को भूषण ने अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें कहा गया है कि म्यांमार ने रोहिंग्याओं के संरक्षित समूह के रूप में रहने के अधिकारों का सम्मान करने के लिए विशेष उद्देश्य से कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने जम्मू में रोहिंग्या समुदाय के लोगों को हिरासत में रखा हुआ है जिनके पास शरणार्थी कार्ड हैं और उन्हें जल्द ही निर्वासित किया जाएगा.

आर्टिकल 21 का दिया हवाला
आर्टिकल 21 के तहत हिरासत में नहीं रखा जाए. भूषण ने कहा मैं यह निर्देश जारी करने का अनुरोध कर रहा हूं कि इन रोहिंग्याओं को संविधान के अर्टिकल 21 के तहत हिरासत में नहीं रखा जाए और म्यांमार निर्वासित नहीं किया जाए. मेहता ने कहा कि वे बिल्कुल भी शरणार्थी नहीं हैं और यह दूसरे दौर का वाद है क्योंकि इस अदालत ने याचिकाकर्ता, जो खुद एक रोहिंग्या है, द्वारा दाखिल एक आवेदन को पहले खारिज कर दिया था.

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उन्होंने कहा इससे पहले असम के लिए भी इसी तरह का आवेदन किया गया था. वे (याचिकाकर्ता) चाहते हैं कि किसी रोहिंग्या को निर्वासित नहीं किया जाए. हमने कहा था कि हम कानून का पालन करेंगे. वे अवैध प्रवासी हैं. हम हमेशा म्यांमार के साथ संपर्क में हैं और जब वे पुष्टि करेंगे कि कोई व्यक्ति उनका नागरिक है, तभी उसका निर्वासन हो सकता है.

कोर्ट ने कहा, 'तो यह कहा जा सकता है कि आप (केंद्र) तभी निर्वासित करेंगे जब म्यांमार स्वीकार कर लेगा.' इस पर मेहता ने कहा कि हां, सरकार किसी अफगान नागरिक को म्यांमार नहीं भेज सकती. कोर्ट ने कहा कि वह फैसला सुरक्षित रख रही है.

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