दहेज के कारण महिलाओं की मौत पर SC ने जताई चिंता, लेकिन कहा- आरोपी पति के बेकसूर रिश्तेदारों को न फंसाया जाए

दहेज हत्या के मामले में एक आरोपी को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा-313 के तहत दर्ज होने वाले आरोपी के बयान को सिर्फ प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं माना जाता चाहिए. 

Supreme Court on Dowry Murder: शीर्ष अदालत ने कहा है कि धारा-313 आरोपी को उसके खिलाफ मौजूद आपत्तिजनक तथ्यों पर स्पष्टीकरण देने में सक्षम बनाता है. इसलिए अदालत को निष्पक्षता और सावधानी के साथ आरोपी से सवाल पूछा जाना चाहिए.

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नई दिल्ली. देश में दहेज की वजह (Dowry Case) से महिलाओं की मौत को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने जताई चिंता है. शुक्रवार को सर्वोच्च अदालत ने कहा ऐसे मामले में कभी-कभी पति के परिवारवालों को बेवजह फंसाया जाता है. सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा-313 के तहत दर्ज होने वाले बयान कई बार आरोपी से पूछताछ किए बिना दर्ज किए जाते हैं.

दहेज हत्या के मामले में एक आरोपी को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा-313 के तहत दर्ज होने वाले आरोपी के बयान को सिर्फ प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं माना जाता चाहिए. दरअसल कोर्ट हरियाणा के रहने वाले सतबीर सिंह, उनकी मां और पिता पर दर्ज हुए केस पर सुनवाई कर रही थी. इन लोगों पर आरोप था कि सतबीर सिंह की पत्नी को दहेज के लिए इतना मजबूर किया उसने खुद को आग लगा कर आत्महत्या कर ली. इन तीनों को निचली अदालत ने 1997 में और फिर हाई कोर्ट ने 2008 में सात साल की सजा सुनाई थी.

शीर्ष अदालत ने कहा है कि धारा-313 आरोपी को उसके खिलाफ मौजूद आपत्तिजनक तथ्यों पर स्पष्टीकरण देने में सक्षम बनाता है. इसलिए अदालत को निष्पक्षता और सावधानी के साथ आरोपी से सवाल पूछा जाना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि वह दहेज हत्या के खतरों से अच्छी तरह से अवगत है.

पति के परिवार को सदस्यों को फंसाया जाता है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'कभी-कभी पति के परिवार के उन सदस्यों को फंसाया जाता है, जिनकी अपराध में कोई सक्रिय भूमिका नहीं होती है और बल्कि वे दूर भी रहते है.' कोर्ट ने कहा कि ऐसे में अदालतों को सावधानी वाला रवैया अपनाने की जरूरत है.

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दहेज हत्या के मामलों का परीक्षण करते समय दुल्हन को जलाने व दहेज की मांग जैसी सामाजिक बुराई को रोकने की विधायी मंशा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. इन बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के मामले के परीक्षण को लेकर कई दिशानिर्देश जारी किए हैं.