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शादी की एक समान उम्र तय करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

शादी की एक समान उम्र तय करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस_ 
सुप्रीम कोर्ट (फ़ाइल फोटो)
शादी की एक समान उम्र तय करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस_ सुप्रीम कोर्ट (फ़ाइल फोटो)

Uniform age of Marriage for Men and Women: बीजेपी नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि विवाहित रिश्ते में महिलाओं को किसी न किसी तरीके से पति के अधीनस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 3, 2021, 11:17 PM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने वकील और बीजेपी नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) द्वारा लायी गई ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई के दौरान पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए एक जैसी विवाह योग्य उम्र (Uniform age of Marriage) के रूप में 21 साल की उम्र तय करने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया. याचिकाकर्ताओं को दिल्ली और राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) में लंबित ऐसे ही दो मामलों में नोटिस जारी किया गया था. उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा कि वर्तमान कानूनी ढांचा, जो लड़कियों को 18 साल की उम्र में और लड़कों की 21 साल की उम्र में शादी करने की अनुमति देता है, वैवाहिक संबंध के भीतर मौजूद लैंगिक असमानता को बढ़ाता है. याचिका में कहा गया है "जबकि पुरुषों को 21 साल की उम्र में शादी करने की अनुमति है, महिलाओं की शादी तब होती है जब वे सिर्फ 18 साल की होती हैं. भेद पितृसत्तात्मक रूढ़ियों पर आधारित होता है, जिसमें कोई वैज्ञानिक समर्थन नहीं है. महिलाओं के खिलाफ डी ज्यूर और डी फैक्टो असमानता और वैश्विक रुझान के पूरी तरह से खिलाफ हो जाती है.”

उपाध्याय ने अगस्त 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष इस मुद्दे को उठाया था, जहां इसकी जांच की जा रही है. याचिका में तर्क दिया गया कि विवाह के लिए अलग-अलग आयु सीमा ने समानता के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14), भेदभाव के खिलाफ संरक्षण (अनुच्छेद 15) और नागरिकों की जीवन की प्रतिष्ठा (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन किया है. जोकि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन के सम्मेलन के तहत भारत की प्रतिबद्धता के खिलाफ चले गए. सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद 139ए के तहत शक्ति है, कि वह उन केस या मामलों को खुद को स्थानांतरित कर सकता है, जिसमें एक ही कानूनी प्रश्‍न या संबंधित मामला दो या दो से अधिक उच्‍च अदालतों के समक्ष विचाराधीन हो.





उपाध्याय ने दोनों याचिकाओं में कानून के सवाल के सामान्य निर्धारण के लिए शीर्ष अदालत का रुख करने का फैसला किया. उनकी याचिका में दावा किया गया था कि 125 देशों में लड़कों और लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु एक जैसी है. उम्र में भेदभाव को समाप्त करने से महिलाओं को पुरुषों के जैसे ही अपनी शिक्षा, रोजगार के अवसर मिलेंगे. महिलाओं पर नौकरी से पहले शादी करने का पारिवारिक दबाव नहीं होगा.
उपाध्याय ने तर्क दिया कि विवाहित रिश्ते में महिलाओं को किसी न किसी तरीके से पति के अधीनस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है. उन्होंने कहा, “उम्र के अंतर से यह शक्ति असंतुलन गहराता है, क्योंकि उम्र ही शक्ति का एक पदानुक्रम है.'' उनकी याचिका में कहा गया है कि एक कम उम्र के साथी से उम्मीद की जाती है कि वह उम्र में बड़े साथी का सम्मान करे और उसके साथ सेवक जैसा रहे, जो वैवाहिक संबंधों में पहले से मौजूद लिंग आधारित पदानुक्रम को बढ़ाता है.

याचिका का दावा है सभी धर्मों के लिए चाहे वह हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम या पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह योग्य आयु क्रमशः 21 और 18 वर्ष है.
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