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Tamil Nadu Assembly Elections 2021: तमिलनाडु में इस एक चुनावी वादे की है चहुंओर चर्चा

तमिलनाडु में भी, ज्यादातर पार्टियां महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखती है.

तमिलनाडु में भी, ज्यादातर पार्टियां महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखती है.

Tamil Nadu Assembly Election: ऐसे ही चुनावी वादे केरल और पश्चिम बंगाल में भी किए गए हैं. यहां भी महिलाओं को आर्थिक मदद देने का ऐलान किया गया. चाहे कोई मुफ्त की चीज़ हो या फिर कोई सोशल स्कीम, तमिलनाडु हमेशा इसमें आगे रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 5, 2021, 11:26 AM IST
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(आर रंगराजन)

चेन्नई. किसी चुनाव में राजनीतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने और दूसरे दलों से आगे निकले के लिए ढेर सारे चुनावी वादे करती हैं. लेकिन तमिलनाडु में इन दिनों एक चुनावी वादे की हर तरफ चर्चा है और वो है गृहणियों को हर महीने दी जाने वाली सैलरी. सबसे पहले इसका ऐलान अभिनेता से नेता बने मक्कल निधि मैयम (MNM) के अध्यक्ष कमल हासन (Kamal Haasan) ने किया. पिछले साल दिसंबर में उनकी पार्टी ने घोषणापत्र में कहा कि अगर उनकी सरकार बनी तो हर महीने गृहणियों को 3 हज़ार रुपये दिए जाएंगे. इसके बाद तो तमिलनाडु में दूसरे दलों के बीच खलबली मच गई. DMK ने हर महीने एक हज़ार और AIADMK ने डेढ़ हज़ार रुपये का वादा कर दिया.

ऐसे ही चुनावी वादे केरल और पश्चिम बंगाल में भी किए गए हैं. यहां भी महिलाओं को आर्थिक मदद देने का ऐलान किया गया. चाहे कोई मुफ्त की चीज़ हो या फिर कोई सोशल स्कीम, तमिलनाडु हमेशा इसमें आगे रहा है. आपको याद होगा यहां साल 2001-02 में एससी/एसटी को मुफ्त साइकिल बांटने की स्कीम लॉन्च की गई थी. इसके बाद इस योजना के तहत सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 11वीं तक के सभी बच्चों को लाया गया.



कमल हासन ने कहा है कि गृहणियों को हर महीने पैसे किसी खैरात में नहीं बांटे जाएंगे. बल्कि ये भुगतान उनके काम की मान्यता है, जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया. हालांकि हासन की इस घोषणा की आलोचना भी हो रही है. लोग इसे लैंगिक भेदभाव से जोड़ कर देख रहे हैं.
गांधीवादी विचारधार से प्रेरित हासन को शायद ये पता नहीं है कि 1940 में एक रिपोर्ट छपी थी जिसका शीर्षक था 'महिलाओं की भूमिका में नियोजित अर्थव्यवस्था' (WRPE). इस रिपोर्ट को तैयार किया था राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) ने. इसके तहत कांग्रेस पार्टी ने, महिलाओं द्वारा घर पर किए गए कार्यों के महत्व को स्वीकार किया था. रिपोर्ट में लिखा था, 'हमें लगता है, ये कार्य, जिसे वर्तमान में राज्य या समाज से कोई मान्यता प्राप्त नहीं है, इसे एक आर्थिक मूल्य के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और उस कार्य को किसी भी तरह से अन्य प्रकार के काम से हीन नहीं माना जाना चाहिए.'

महिलाओं के लिए इस उप-समिति की अध्यक्षता डॉक्टर और नारीवादी रानी लक्ष्मीबाई राजवाड़े ने की थी. स्वतंत्रता सेनानी मृदुला साराभाई सचिव थीं. इन्होंने इसमें तीन सिफारिशें की थी.

1) परिवार की आय के कुछ हिस्से पर महिला का पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए.

2) महिला की पति की संपत्ति में एक हिस्सा होना चाहिए, जिसे वह दूर नहीं कर सकती है.

3) पति को अपनी पत्नी को राज्य द्वारा शुरू की जाने वाली किसी भी सामाजिक बीमा योजना में योगदान का हिस्सा देना चाहिए.

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जनवरी और दिसंबर 2019 के बीच राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के एक सर्वेक्षण में पाया कि एक भारतीय महिला एक दिन में 243 मिनट (चार घंटे) घरेलू काम करती है, जबकि घरेलू कामों में भाग लेने वाले भारतीय पुरुष द्वारा खर्च किया जाने वाला औसत समय केवल 25 मिनट है.

तमिलनाडु में भी, ज्यादातर पार्टियां महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखती है. वो उन योजनाओं को लॉन्च करती हैं जिनका उद्देश्य उन्हें लुभाने या खुश करने के लिए है. 1989 में, DMK के नेतृत्व वाली सरकार ने तमिलनाडु में महिलाओं को समान संपत्ति के अधिकार प्रदान करने के लिए एक कानून बनाया गया था. तमिलनाडु ने स्थानीय निकायों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया, और इसे 2019 में 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया, इसके अलावा सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण दिया. AIADMK सरकार ने 2019 में कामकाजी महिलाओं को स्कूटर पर 50 प्रतिशत सब्सिडी देने की योजना शुरू की. क्या इस बार तमिलनाडु में ये महिलाओं के लिए गेम चेंजर साबित होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इतिहासकार हैं. ये उनकी निजी राय है. )
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