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क्या तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2021 के बाद भी बनी रहेगी पन्नीरसेल्वम की प्रासंगिकता?

ओ. पन्नीरसेल्वम, तमिलनाडु सरकार में पलानीसामी के डिप्टी हैं. फाइल फोटो

ओ. पन्नीरसेल्वम, तमिलनाडु सरकार में पलानीसामी के डिप्टी हैं. फाइल फोटो

Ottakarathevar Panneerselvam: उपमुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद क्या तमिल राजनीति में उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 24, 2021, 4:57 PM IST
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नई दिल्ली. ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) हमेशा से अपने समुदाय के समर्थन को लेकर आत्मविश्वास से भरे दिखते हैं, पिछले दो दशक से राजनीति में उन्हें अपने समर्थकों का साथ मिलता है. लेकिन, इस बार तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री के लिए चीजें आसान नहीं हैं. परेशानी उनके माथे पर दिखाई देती है. उपमुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ा सवाल ये है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद क्या तमिल राजनीति में उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी. ओ. पन्नीरसेल्वम का ताल्लुक तमिलनाडु के थेवर समुदाय से हैं, जोकि राज्य के दबंग समुदायों में से एक है. हालांकि आज की स्थिति में थेवर बंटे हुए हैं, क्योंकि अन्नाद्रमुक का नेतृत्व पन्नीरसेल्वम के हाथों में हैं. लेकिन विधानसभा चुनाव में ओपीएस के सामने डीएमके का थेवर उम्मीदवार भी है. ये उम्मीदवार दो साल पहले अन्नाद्रमुक के साथ था.

दूसरी बात ये कि इस बार ओपीएस के लिए ना सिर्फ अपनी सीट बचाने की चुनौती हैं, बल्कि अन्नाद्रमुक के पक्ष में थेवरों को एकजुट भी करना है. ओपीएस के लिए ये सबसे बड़ा चैलेंज है क्योंकि बोदिनायकनुर में अन्नाद्रमुक के वोट को बंटने से रोकना और स्वयं के खिलाफ समाज में व्याप्त गुस्से को शांत करते हुए जीत हासिल करना ओपीएस के लिए आसान नहीं है. अन्नाद्रमुक के चीफ कोऑर्डिनेटर के तौर पर ओपीएस के लिए परंपरागत वोट बैंक को एकजुट रखने की चुनौती भी है. अन्यथा चुनाव नतीजों के बाद अन्नाद्रमुक पर नियंत्रण हासिल करना ओपीएस के लिए मुश्किल भरा होने वाला है.

तमिलनाडु में थेवर समुदाय मुख्य रूप से मन्नारगुड़ी क्षेत्र (कावेरी डेल्टा) में केंद्रित है, इसी इलाके से पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की सहयोगी वीके शशिकला भी हैं. पिछले महीने, शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण ने उन्हें 'थयागा थलाइवी' (त्याग की मूर्ति) के रूप में पेश किया था. 2018 में अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम की स्थापना करने वाले दिनाकरण, अन्नाद्रमुक के वोट बैंक में सेंध लगाने को तैयार हैं. इन चुनौतियों के साथ अन्नाद्रमुक के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी है, अन्नाद्रमुक पिछले 10 साल से सत्ता में हैं और ओपीएस के लिए यह एक और चुनौती है. बोदी में डीएमके उम्मीदवार थंदा तमिल सेल्वन ने कहा, “जीत उम्मीदवार पर निर्भर करती है, यह पार्टी पर निर्भर करती है. डीएमके के नेता एमके स्टालिन कल सीएम होंगे, यह सभी जानते हैं. इसलिए वे मुझे वोट देंगे."



तमिल सेल्वन ने 2019 में लोकसभा चुनाव में ओपीएस के बेटे को चुनौती दी थी, उस समय वह AMMK में थे. सेल्वन को हार मिली, लेकिन अब वे DMK में शामिल हो गए हैं और पन्नीरसेल्वम को घरेलू मैदान में टक्कर देने के लिए तैयार हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में सेल्वन और ओपीएस दोनों अन्नाद्रमुक से विधायक थे और जयललिता के करीबी भी. हालांकि, जयललिता की मृत्यु के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए.
ओपीएस ने इंटरव्यू से बनाई दूरी

बोदी में अपने चुनावी अभियान के दौरान सेल्वन ने कहा, "पूरे तमिलनाडु में सबको पता है कि मौजूदा सरकार भ्रष्ट है. लोग ये भी जानते हैं कि ये केंद्र सरकार के गुलाम हैं. तमिलनाडु के अधिकारों की सुरक्षा नहीं हो पा रही है और हमें कोई लाभ नहीं मिल रहा है. लोग इस सरकार को सत्ता से बाहर करना चाहते हैं." ओपीएस ने विधानसभा चुनाव प्रचार में इंटरव्यू से खुद को दूर रखा है. उनकी कोशिश जाति और काडर बेस को एक साथ जोड़े रखने की है. इनमें फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्यों के साथ मुख्य रूप से स्थानीय क्षेत्र के थेवर और देसिया चेट्टियार हैं, जोकि एक अन्य प्रमुख समुदाय हैं और परंपरागत रूप से व्यापारी रहे हैं.

शशिकला पर हमला नहीं

अपने चुनावी अभियानों में ओपीएस, शशिकला के खिलाफ आक्रामक नहीं हैं. हालांकि ये ओपीएस ही थे, जिन्होंने जया की कब्र के पास ध्यान लगाने के बाद शशिकला के खिलाफ विद्रोह किया और ऐलान किया कि 2017 में जयललिता की आवाज ने उनसे बात की थी. ओपीएस को पता है कि शशिकला के खिलाफ कोई भी आक्रामक अभियान थेवर समुदाय को उनके खिलाफ खड़ा कर सकता है. ओपीएस के लिए मुश्किल ये है कि वे वंशवादी राजनीति के लिए डीएमके की आलोचना भी नहीं कर सकते हैं. उनके बेटे ओपी रवींद्रनाथ अपने गृह जिले थेनी से सांसद हैं और उनके दूसरे बेटे ने भी इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट खातिर आवेदन किया था.

ओपीआर का चुनावी अभियान 

लिहाजा डीएमके नेता स्टालिन पर वंशवाद की राजनीति करने का कोई भी आरोप ओपीएस को वोट नहीं दिला सकता, बल्कि ये उनकी राजनीतिक सेहत के लिए भी ठीक नहीं होगा. डीएमके उम्मीदवार तमिल सेल्वन के खिलाफ ओपीएस का सबसे बड़ा हमला, उनके बेटे ओपीआर का चुनावी अभियान था, जिन्होंने मंगलवार को चुनावी सभा में कहा कि “बोदिनायकानुर के लोगों को थंगा तमिल सेल्वन को सही सबक सिखाना चाहिए, जिनकी पार्टी ने जयललिता को जेल में डाला था."

'दोनों नेताओं के पास रीढ़ नहीं'

ओपीएस परिवार को उम्मीद है कि पार्टी के वफादार समर्थक और उनकी जाति के लोग उनका साथ देंगे और इस बार के चुनावों में बोदी से उनकी नैया पार लगेगी. हालांकि ओपीएस के घर में मतदाताओं में इस बात को लेकर लेकर नाराजगी है कि ओपीएस, मुख्यमंत्री पलानीसामी के डिप्टी बनकर रह गए हैं और उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते हैं, सिर्फ आज्ञापान कर रहे हैं. अन्नाद्रमुक पर पलानीसामी का कब्जा हो गया है. इसके साथ AMMK का उभार थेवरों को एक और विकल्प के रूप में भी दिख रहा है. लोयला कॉलेज में समाजशास्त्र की प्रोफेसर सेम्मालर सेल्वी कहती हैं कि अन्नाद्रमुक के दो शीर्ष नेताओं पलानीसामी और ओ पन्नीरसेल्वम की सार्वजनिक छवि ऐसी है कि दोनों नेताओं के पास रीढ़ नहीं है. या तो वे जयललिता के सामने झुकते थे या फिर शशिकला के सामने... और अब ऐसा लगता है कि ओपीएस ने पलानीसामी के सामने घुटने टेक दिए हैं.

'पार्टी पर कब्जे की लड़ाई'

सेल्वी ने न्यूज18 से कहा, "ओपीएस के राजनीतिक व्यवहार से थेवरों में नाराजगी है. सोशल मीडिया पर थेवर मुखर हैं कि पलानीसामी ने थेवरों का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा. ऐसे में उनकी नाराजगी का असर अन्नाद्रमुक पर देखने को मिलेगा, इसकी आशंका है कि अन्नाद्रमुक को शायद पहले जैसा समर्थन ना मिले." अन्नाद्रमुक के जानेमाने थेवर चेहरे और पार्टी के चीफ को-ऑर्डिनेटर ओपीएस का अपने वोट बैंक से नियंत्रण छूटता है तो चुनावों के बाद पार्टी में उनकी प्रासंगिकता भी सवालों के घेरे में हैं. अगर राज्य के उत्तरी क्षेत्र में पलानीसामी का प्रदर्शन बेहतर रहता है तो मौजूदा मुख्यमंत्री पार्टी पर भी अपनी कमान मजबूत कर सकते हैं.

एक स्थिति और है कि अगर दोनों नेताओं का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है तो शशिकला के उभार की संभावना से भी कोई इनकार नहीं कर रहा है. पार्टी में फिर से शशिकला की लीडरशिप की मांग उठ सकती है, जिन्होंने अभी राजनीति से संन्यास का ऐलान किया हुआ है. हालांकि चेन्नई की सिविल कोर्ट में अन्नाद्रमुक के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व को शशिकला ने चुनौती दी है. तमिलनाडु में 2021 का विधानसभा चुनाव ना केवल राज्य की भविष्य की राजनीति को तय करेगा बल्कि उस पार्टी का भी जिसकी स्थापना एमजीआर ने की और जिसे जयललिता ने पाला पोसा.
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