तरुण तेजपाल केस: कोर्ट ने कहा- महिला ने यौन उत्पीड़न पीड़िता की तरह नहीं किया बर्ताव: रिपोर्ट

कोर्ट ने तरुण तेजपाल को 21 मई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया था. मंगलवार को कोर्ट के फैसले की कॉपी आई. (फाइल फोटो)

कोर्ट ने तरुण तेजपाल को 21 मई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया था. मंगलवार को कोर्ट के फैसले की कॉपी आई. (फाइल फोटो)

Tarun Tejpal Case: कोर्ट ने तरुण तेजपाल को 21 मई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया था. मंगलवार को कोर्ट के फैसले की कॉपी आई, जिसमें डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज ने कहा कि पूरी सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने किसी भी तरह का ऐसा व्यवहार नहीं किया, जिससे लगे कि वो यौन उत्पीड़न की पीड़ित हैं.

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पणजी. तहलका (Tehelka) के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) को गोवा के फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 2013 में अपनी सहकर्मी के रेप, यौन उत्पीड़न और जबरन बंधक बनाने के सभी आरोपों से बरी कर दिया है. डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पूरी सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने किसी भी तरह का ऐसा व्यवहार नहीं किया, जिससे लगे कि वो यौन उत्पीड़न की पीड़ित हैं. इसे सिर्फ दिखावा कहा जा सकता है.

कोर्ट ने तरुण तेजपाल को 21 मई को बरी किया था. मंगलवार को कोर्ट के फैसले की कॉपी आई. 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 527 पेज के फैसले में एडिशनल सेशन जज क्षमा जोशी ने लिखा, 'रिकॉर्ड और सबूतों पर विचार करने के बाद... आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है, क्योंकि शिकायतकर्ता महिला द्वारा लगाए गए आरोपों को साबिक करने वाला ऐसा कोई सबूत नहीं है.' जज ने इसके साथ ही लिखा, 'ट्रायल के लिए महिला का "व्यवहार" एक महत्वपूर्ण कारक था, जिसने मामले को कमजोर कर दिया.'

फैसले की कॉपी में जज ने लिखा, 'यह देखने वाली बात रही कि अभियोक्ता (पीड़ित) का व्यवहार मानक नहीं था. लगातार दो रातों में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई कोई महिला न तो प्रशंसनीय रूप में दिख सकती है और न ही उसने ऐसा कोई बर्ताव दिखाया जिससे लगे कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ है.'

तरुण तेजपाल को बरी किये जाने के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय पहुंची गोवा सरकार
निचली अदालत ने पाया कि महिला की ओर से तरुण तेजपाल को होटल में उसकी लोकेशन के बारे में मैसेज देना 'अप्राकृतिक' था, जहां वह एक प्रमुख अमेरिकी एक्ट्रेस का पीछा कर रही थी.

महिला ने शिकायत की थी कि तेजपाल ने 7 नवंबर, 2013 और 8 नवंबर, 2013 को होटल की लिफ्ट में उसका यौन उत्पीड़न किया. अदालत ने कहा, 'अगर महिला का पहले उत्पीड़न हो चुका था और वो डरी हुई थी, तो भी उसकी मन:स्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि वह आरोपी को रिपोर्ट क्यों करेगी और उसे अपनी लोकेशन क्यों बताएगी? जबकि वो तीन महिलाओं को रिपोर्ट कर सकती थी…'

अदालत ने कहा, 'अभियोक्ता का अप्राकृतिक आचरण फिर से साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत प्रासंगिक है. अभियोक्ता ने स्वीकार किया था कि उसके फोन से आरोपी को 8/11/2013 को दो एसएमएस भेजे गए थे… और ये मैसेज उसके द्वारा किसी मैसेज के जवाब में नहीं भेजे गए थे.'



जज ने फैसले की कॉपी में लिखा, 'आरोपी ने मैसेज भेजकर उससे यह पूछने की कोशिश की थी कि वो कहां थी और उसने मिनटों के अंदर दो बार एक ही मैसेज भेजा. यह स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि अभियोक्ता पीड़ित नहीं थी और न ही भयभीत थी. ये आरोपी पर लगाए गए अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से खारिज कर देता है कि उक्त मैसेज के ठीक पहले आरोपी ने अभियोजक का फिर से यौन उत्पीड़न किया था.'

पिछले महीने फैसला सुरक्षित रखा था

तेजपाल के खिलाफ दुष्कर्म के मामले में कोर्ट 27 अप्रैल को फैसला सुनाने वाली थी, लेकिन जज क्षमा जोशी ने फैसला 12 मई तक स्थगित कर दिया था. फिर 12 मई को फैसला 19 मई तक के लिए टाल दिया गया था. एडिशनल जज क्षमा जोशी ने इस साढ़े सात साल पुराने केस में पिछले महीने फैसला सुरक्षित रखा था. तेजपाल के कहने पर केस की सुनवाई बंद कमरे में की गई. इस मामले में गोवा पुलिस का पक्ष स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर फ्रांसिस्को तवोरा ने रखा, वहीं वकील राजीव गोम्ज और आमिर खान ने कोर्ट में तेजपाल का केस लड़ा.

इन धाराओं में हुआ था केस

कोर्ट से बरी होने के आदेश के बाद तरुण तेजपाल ने कहा कि 'नवंबर 2013 में उन्हें एक महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न के झूठे मामले में फंसाया था और आज गोवा में अडिशनल सेशन जज की ट्रायल कोर्ट ने मुझे बरी कर दिया. तेजपाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 342 (गलत तरीके से रोकना), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 354 (गरिमा भंग करने की मंशा से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना), 354-ए (यौन उत्पीड़न), धारा 376 की उपधारा दो (फ) (पद का दुरुपयोग कर अधीनस्थ महिला से बलात्कार) और 376 (2) (क) (नियंत्रण कर सकने की स्थिति वाले व्यक्ति द्वारा बलात्कार) के तहत मुकदमा चला.

फैसले के खिलाफ गोवा हाईकोर्ट पहुंची राज्य सरकार

हालांकि, गोवा के एडवोकेट जनरल देवीदास पंगम ने बताया कि राज्य सरकार ने बंबई हाईकोर्ट में गोवा फास्ट ट्रैक कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दी है. हाईकोर्ट ने अभी अपील पर सुनवाई की तारीख तय नहीं की है.

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