क्या तेलंगाना में कांग्रेस-टीडीपी का गठबंधन KCR के लिए खड़ी कर सकता है मुश्किल?

कांग्रेस और टीडीपी के रणनीतिकारों को लगता है कि कांग्रेस को उच्च जाति, रेड्डी, एससी/एसटी और अल्पसंख्यकों के वोट मिलेंगे जबकि टीडीपी को उसके परंपरागत ओबीसी वोटर्स वोट करेंगे.

D P Satish | News18Hindi
Updated: September 7, 2018, 8:17 PM IST
क्या तेलंगाना में कांग्रेस-टीडीपी का गठबंधन KCR के लिए खड़ी कर सकता है मुश्किल?
के चंद्रशेखर राव (File photo)
D P Satish
D P Satish | News18Hindi
Updated: September 7, 2018, 8:17 PM IST
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव द्वारा समय पूर्व विधानसभा भंग करने के बाद सभी की आंखें कांग्रेस और टीडीपी पर हैं. सत्ताधारी टीआरएस और वोटर्स इस बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं कि इस साल के अन्त में होने वाले विधानसभा चुनावों में केसीआर को रोकने के लिए ये दोनों विपक्षी पार्टियां क्या करेंगी.

2014 के चुनावों में कांग्रेस को हराकर के चंद्रशेखर राव (केसीआर) अलग तेलंगाना राज्य के मुख्यमंत्री बने थे हालांकि राज्य का निर्माण कांग्रेस ने किया था और इसमें टीडीपी की भूमिका निष्पक्ष थी. तेलंगाना के ‘हीरो’ केसीआर के सामने अब नई चुनौतियां हैं. पिछले चार साल और चार महीनों में उन्होंने चुनाव के दौरान किए गए अपने कई वायदों को पूरा करके खुद को तेलंगाना की जनता के एकमात्र नेता के रूप में पेश किया है.

विधानसभा के विघटन के बाद अपनी प्रेस बैठक में केसीआर ने सीधे-सीधे कांग्रेस को निशाने पर लिया और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को देश का सबसे बड़ा मसखरा कहा. उनके करीबी सहयोगी ने कहा कि केसीआर जानते हैं कि चुनाव में कांग्रेस ही उनकी एकमात्र प्रतिद्वन्दी है. दरअसल केसीआर ने पिछले चार सालों में व्यवस्थित रुप से अन्य विपक्षी दलों- टीडीपी और वाईएसआरसीपी को खत्म कर दिया है जिस कारण राज्य की राजनीति द्विध्रुवीय बन गई है.

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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इससे या तो टीआरएस को राज्य में एकतरफा जीती मिलेगी या फिर यह उसी को भी भारी पड़ सकता है. विश्लेषकों का कहना है कि कभी एक-दूसरे की प्रतिद्वंदी रही कांग्रेस और तेलगु देशम पार्टी टीआरएस को टक्कर देने के लिए एकसाथ आने की योजना बना रहे हैं.

मई में कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह के दौरान राहुल गांधी और टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू की मुलाकात हुई थी. और ऐसा लगता है कि दोनों यह मान रहे हैं कि यदि आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में गठबंधन कर लिया जाए तो वायएसआरसीपी और टीआरएस को हराया जा सकता है.

तेलंगाना के निर्माण के बाद कांग्रेस आंध्र प्रदेश से लगभग-लगभग समाप्त हो गई और राज्य में उसका वोट शेयर मात्र 5 प्रतिशत रह गया है. वहीं तेलंगाना में भी केसीआर ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्त दिखा दिया.
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कमजोर होती कांग्रेस ने गठबंधन के लिए टीडीपी के साथ बातचीत शुरू कर दी है. कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के मानें तो एक बैनर के तले टीआरएस को हराने के लिए पार्टी की टीडीपी, टीजेएसी, टीजेएस, सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी और बीएलफ दलों के साथ कुछ दौर की सीक्रेट मीटिंग हो चुकी है.

2014 में टीआरएस को 119 सदस्यीय विधानसभा में 63 सीटें मिली थी. वहीं कांग्रेस 21, टीडीपी 15, बसपा 2 और वामपंथी दलों को दो सीटें प्राप्त हुई. यानी इन सभी पार्टियों ने मिलकर 40 सीटें जीती.

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वरिष्ठ राजनेता और आंध्र प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री एमवी मैसूरा रेड्डी ने कहा, "वास्तव में 2014 में कई पार्टियों के बीच टक्कर ने केसीआर को जीतने में मदद की. विपक्षी वोट आधा दर्जन दलों में बंट गया. अगर वे सभी एकसाथ आते हैं तो वास्तव में उन्हें फायदा मिल सकता है. यह कांग्रेस और टीडीपी के लिए अस्तित्व का सवाल है. वे एकसाथ आ सकते हैं."

कांग्रेस और टीडीपी के रणनीतिकारों को लगता है कि कांग्रेस को उच्च जाति, रेड्डी, एससी/एसटी और अल्पसंख्यकों के वोट मिलेंगे जबकि टीडीपी को उसके परंपरागत ओबीसी वोटर्स वोट करेंगे. टीडीपी को मिल रूप से पिछड़े वर्गों की पार्टी के रूप में जाना जाता है और इसके नेताओं का दावा है कि तेलंगाना की 40 सीटों पर टीडीपी का 7% से लेकर 25% तक वोट शेयर है.

वहीं केसीआर सत्तारुढ़ पार्टी टीआरएस के एकमात्र नेता हैं जबकि विपक्षी दलों के पास स्थानीय एवं राष्ट्रीय दोनों तरह के नेता हैं.

कांग्रेस और टीडीपी दोनों पार्टियां अलग-अलग कारणों से केसीआर से बदला लेना चाहती हैं. 2000 में केसीआर ने चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ विद्रोह किया था जिसकी वजह से राज्य दो भागों में विभाजित हो गया. कांग्रेस ने तेलंगाना बनाया और उम्मीद कर रही थी कि केसीआर उसका साथ देंगे लेकिन केसीआर ने उसे ही बाहर का रास्ता दिखा दिया.

हालांकि इन सबके बावजूद केसीआर राज्य में जबरदस्त वापसी कर सकते हैं. क्योंकि वह अब भी राज्य में सबसे ताकतवर और लोकप्रिय नेता हैं. वहीं संयुक्त विपक्षी के लिए फिलहाल को स्पष्ट रणनीति दिखाई नहीं देती.

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