Analysis। तेलंगाना एग्जिट पोल- KCR की बिसात पर चारों खाने चित हुए राहुल गांधी

कांग्रेस और TDP के गठबंधन को KCR ने अवसरवादी गठबंधन बताया और लोगों को डराया कि अगर ये गठबंधन जीता, तो चंद्रबाबू नायडू तेलंगाना पर राज करेंगे.

Sanjay Tiwari | News18Hindi
Updated: December 8, 2018, 7:40 AM IST
Analysis। तेलंगाना एग्जिट पोल- KCR की बिसात पर चारों खाने चित हुए राहुल गांधी
आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू के साथ राहुल गांधी (File Photot)
Sanjay Tiwari | News18Hindi
Updated: December 8, 2018, 7:40 AM IST
तेलंगाना में मतदान खत्म होने के बाद दो बातें सामने आई. पहला- तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रजत कुमार ने माना कि वोटर लिस्ट से कई लोगों के नाम गायब थे. रजत कुमार ने इसके लिए मतदाताओं से सार्वजनिक माफी भी मांगी है. कांग्रेस लगातार आरोप लगाती रही है कि वोटर लिस्ट से करीब 22 लाख लोगों के नाम गायब हैं. दूसरा- एग्जिट पोल के मुताबिक तेलंगाना में KCR फिर सरकार बनाते हुए नजर आ रही है.

बेहतरीन रणनीतिज्ञ की तरह KCR ने पहले अपने उम्मीदवार तय किये, फिर अपने हिसाब से चुनावी बिसात बिछाई और चुनाव बाद सर्वेक्षण के मुताबिक बाजी मार ली है.

पिछले चार सालों में KCR, कांग्रेस के बड़े ग्राउंड फोर्स को TRS में शामिल कर चुके थे. इसके बाद उन्होंने समय से 6 महीने पहले चुनाव करा लिए, जिससे उनके विरोधियों को तैयार होने का मौका नहीं मिला. काफी मशक्कत के बाद कांग्रेस तेलंगाना में मैदान में उतरी भी तो शायद काफी देर हो चुकी थी. कांग्रेस, टीडीपी, सीपीआई और TJS के गठबंधन 'महाकुटमी' ने आखिरी दिनों में पूरी ताकत झोंकी, लेकिन चुनाव में सबसे बड़ी चीज होती है भरोसा, और एग्जिट पोल के नतीजों को सही मानें, तो शायद 'महाकुटमी', लोगों का भरोसा नहीं जीत सकी.

कांग्रेस और TDP के गठबंधन को KCR ने अवसरवादी गठबंधन बताया और लोगों को डराया कि अगर ये गठबंधन जीता, तो चंद्रबाबू नायडू तेलंगाना पर राज करेंगे. तेलंगाना के लोग सबकुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन सालों संघर्ष करके आन्ध्र से अलग होने के बाद, यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई आंध्र का आदमी तेलंगाना पर राज करे. KCR ने खुद को नायक और चंद्रबाबू नायडू को खलनायक के तौर पर पेश करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.

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कांग्रेस इस बात को जानती थी, इसलिए उसने और आक्रामक रणनीति बनाई. कर्नाटक से आये कांग्रेस के रणनीतिकारों ने जल्दी-जल्दी मोर्चा संभाला. लेकिन तब तक शायद गोदावरी में बहुत पानी बह चुका था. वैसे भी नतीजे तभी सही आते हैं, जब सही रणनीति का सही वक्त पर इस्तेमाल हो. तेलंगाना में कांग्रेस ने रणनीति तो सही बनाई, लेकिन टाइम मैनेजमेंट में शायद वो चूक गई. एग्जिट पोल के नतीजे, ग्राउंड रिपोर्ट और इंटेलीजेंस इनपुट्स का निचोड़ तो कम से कम यहीं इशारा कर रहा है.

कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की बातें लोगों ने सुनी जरूर, लेकिन शायद वो लोगों के दिल तक नहीं उतर पाई.
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KCR के खिलाफ कांग्रेस की रणनीति को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहला- कांग्रेस ने राजनीतिक हमला किया. कांग्रेस ने कहा कि KCR तेलंगाना में परिवारवाद चला रहे हैं और उनकी बीजेपी के साथ साठगांठ है. परिवारवाद के आरोपों से कांग्रेस खुद घिरी रहती है, लेकिन उसने इसे बड़ा मुद्दा बनाया और कहा कि सरकार सिर्फ KCR का परिवार चला रहा है, जिसमे खुद KCR, उनके बेटे KTR, उनकी बेटी कविता और भतीजा हरीश राव शामिल हैं. बदले में कांग्रेस ने अपने गठबंधन में TDP के चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना आंदोलन के बड़े चेहरे और TJS पार्टी के अध्यक्ष प्रोफेसर कोदंडराम, तेलंगाना में दलितों के बड़े नेता मांडा कृष्ण मादिगा, पिछड़ों के नेता आर कृष्णय्या, जाति विरोधी आंदोलन के प्रतीक और लोककवि गद्दर के अलावा सीपीआई को मिलाकर एक बड़ा कैनवास वाला संयुक्त मोर्चा खड़ा किया.

मुस्लिम वोट को विभाजित करने और अपनी तरफ करने के लिए TRS-बीजेपी के गुपचुप गठबंधन को मुद्दा बनाया. इन दोनों ही बातों ने TRS को चुनाव के आखिरी दिनों में खासा परेशान कर दिया था. TRS के नेता अंदरखाने दवाब महसूस करने लगे थे, लेकिन ये बातें लोगों के दिलों में उतारने के लिए वक्त की कमी रही. महज 15-20 दिनों के चुनाव प्रचार में ये बातें बुद्धिजीवियों की बहस का मुद्दा तो बनी, लेकिन चौराहों और चाय की दुकान पर आम लोगों के चर्चा का विषय नहीं बन पाई.

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दूसरा- कांग्रेस ने उन वादों को मुद्दा बनाया, जो KCR ने पूरे नहीं किये. इसमें मुसलमानों को 12 फीसदी का आरक्षण और नौजवानों को 1 लाख नौकरी देने का वादा प्रमुख है. तेलंगाना में ज्यादातर मुसलमान समाज मानता है कि 12 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव मोदी सरकार की वजह से अटका पड़ा है और इसके लिए KCR जिम्मेदार नहीं है। कम वक्त में कांग्रेस के लिए लोगों को यह समझाना मुश्किल था कि यह KCR का चुनावी जुमला है. नौकरी और रोजगार के मुद्दे ने जरूर थोड़ा असर दिखाया होगा, लेकिन इसके लिए कांग्रेस को पहले से जैसा आंदोलन खड़ा करना चाहिए था, वैसा नहीं किया गया था. कमजोर जमीनी तैयारी के साथ उतरी कांग्रेस नौजवानों को बड़े पैमाने पर आंदोलित नहीं कर पाई और ये सोचना भी हास्यास्पद होगा कि राहुल गांधी के हिंदी में दिए भाषणों का मंच से किसी और कि जुबान से तेलुगु में तर्जुमा सुनकर तेलंगाना का युवा आंदोलित हो जाता। राहुल गांधी अब तक खुद लोकप्रिय युवा नेता बनने का संघर्ष कर रहे है, तो ऐसे में तेलंगाना का नौजवान उनपर कैसे भरोसा कर सकता था.

तीसरा- कांग्रेस ने चुनावी रेवड़ी बांटने को बनाया. राहुल गांधी ने कहा कि किसानों का 2 लाख तक का कर्ज माफ करेंगे, 2 लाख तक ब्याज मुक्त कर्ज देंगे, 3 हजार प्रतिमाह बेरोजगारी भत्ता देंगे और दलित-आदिवासियों को 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली देंगे. कर्जमाफी के वादे ने कांग्रेस को किसानों के कुछ वोट इकट्ठा करने में जरूर मदद की होगी, लेकिन तेलंगाना में जहां KCR पहले से किसानों को बहुत कुछ मुफ्त बांट रहे हैं, वहां शायद जनता ने उसपर भरोसा करना बेहतर समझा होगा, जो पहले से बांट रहा है.

इसलिए अगर एग्जिट पोल के आंकड़े सही माने तो, TRS का वोटबैंक बांटने या उनको कांग्रेस की तरफ इकट्ठा करने का चक्रव्यूह कामयाब नहीं हुआ है.

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