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क्या कश्मीर में हताशा के चलते पुलिस वालों को निशाना बना रहे हैं आतंकी?

प्रतीकात्मक फोटो

प्रतीकात्मक फोटो

आतंकियों को लग रहा है कि वो जितना इन्हें परेशान करेंगे, आतंक उतना ही चलेगा. सूत्र बताते हैं कि राज्यपाल शासन को कश्मीर के पुलिस वालों और उनके परिवार की पूरी चिंता है और उनकी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल भी रख रही है.

  • News18Hindi
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कश्मीर घाटी में आतंकियों के हाथों एक के बाद पुलिसवालों की हो रही हत्याओं ने केन्द्र सरकार को और चौकन्ना कर दिया है. केन्द्र सरकार के सूत्र बता रहे हैं कि आतंकियों को खिलाफ चल रहे सारे अभियान पिछले दिनों में जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान ही चला रहे हैं. इन्ही स्थानीय जवानों का ग्राउंड इंटेलिजेंस भी होता है और ऑपरेशन भी वही कर रहे हैं. इसलिए आतंकियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन दिनों जम्मू-कश्मीर पुलिस ही है.

आतंकियों को लग रहा है कि वो जितना इन्हें परेशान करेंगे, आतंक उतना ही चलेगा. सूत्र बताते हैं कि राज्यपाल शासन को कश्मीर के पुलिस वालों और उनके परिवार की पूरी चिंता है और उनकी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल भी रख रही है. इसलिए हिम्मत हारने का सवाल ही नहीं उठता है.

केन्द्र सरकार आंतकियों के खिलाफ मुहिम बड़ी सख्ती से चला रही है
सूत्रों के मुताबिक कश्मीर के तीन जिलों अनंतनाग, पुलवामा और शोपियां में सबसे ज्यादा आतंकी हैं. खुफिया सूत्र बताते हैं कि अगस्त तक 350 से ज्यादा सक्रिय आतंकी कश्मीर घाटी में घटनाओं के अंजाम देने में लगे थे और केन्द्र सरकार आंतकियों के खिलाफ मुहिम बड़ी सख्ती के साथ चला रही है. इसी सख्ती का नतीजा है कि एक के बाद एक आतंकी मारे जा रहे हैं और तिलमिला कर वो स्थानीय पुलिस वालों को ही निशाना बनाने में लगे हैं.

सूत्रों का मानना है कि सबसे बड़ी समस्या गवर्नेंस डिफिसिट की थी और साथ ही राजनीतिक गतिविधियां भी बंद ही थीं. ऐसे में आम कश्मीरी को राजनिति की मुख्यधारा में शामिल करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी. केन्द्र सरकार ने पंचायत चुनावों का ऐलान भी कर दिया.

'जो लोग चुनाव बहिष्कार में लगे हैं नुकसान उनका ही होगा'
अब पंचायत चुनावों का बहिष्कार करने का ऐलान भले ही पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कर लिया हो लेकिन केन्द्र सरकार ने इस प्रक्रिया को रोका नही हैं. उनका मानना है कि जो बहिष्कार में लगे हैं नुकसान उनका ही होगा. आरोप ये है कि विधायक नहीं चाहते कि स्थानीय स्तर पर नेतृत्व उभरे.

केन्द्र सरकार ने तय किया है कि 20 लाख रुपये हर पंचायत को हर साल मिलेंगे ताकि वो अपने स्तर पर ही अपने काम निबटा लें. सूत्र बताते हैं कि परिवारवाद और भ्रष्टाचार से जूूझ रहे राजनीतिक तंत्र को शायद ये मंजूर नहीं कि पंचायत स्तर पर लोगों को इतनी ताकत मिले. इसलिए बहिष्कार का षड़यंत्र किया जा रहा है.

हिंसा 3-4 जिलों तक ही सीमित लेकिन चुनाव 16 जिलों में
दरअसल संविधान के 73-74वें संशोधन के बाद देश के तमाम इलाकों में तीन-टीयर स्तर पर स्थानीय निकायों का गठन तो हो गया लेकिन कश्मीर में यह संशोधन लागू ही नहीं किया गया. अब राज्यपाल शासन में इसे लागू करने की तैयारी पूरी हो चुकी है. केन्द्र जानता है कि हिंसा 3-4 जिलों तक ही सीमित है लेकिन कुल 16 जिलों मे चुनाव होंगे. पूरे जम्मू और लद्दाख इलाकों में कोई अड़चन नहीं आने वाली और एक बार प्रकिया शुरू हुई तो आतंकियों की हिंसा उन्हें डरा नहीं पाएगी.

'बीजेपी-पीडीपी की साझा सरकार नहीं बनेगी'
अब बात राज्यपाल शासन की. दिसंबर तक राज्यपाल शासन बरकरार है और केन्द्र की कोशिश यही है कि इस दौरान न सिर्फ गवर्नेंस दिखे, भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और गिनाने के लिए थोड़ी उपलब्धियां भी हों. ताकि आने वाले दिनों मे विकल्पों पर विचार किया जा सके. एक विकल्प है विधानसभा भंग कर के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ ही चुनाव करा दिए जाएं. दूसरा विकल्प है सरकार बनाने की कोशिश.

सूत्रों के मुताबिक सरकार बनाने के प्रयास जारी हैं जिसमें एक बात तो पक्की है कि बीजेपी-पीडीपी की साझा सरकार नहीं बनेगी. अगर आगे कोई विकल्प बनता है तो या तो बीजेपी या फिर पीडीपी ही शामिल होंगे.

पंचायत चुनाव आम कश्मीरी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लाएगा
कश्मीर की मुश्किल ही यही है कि केन्द्र सरकार 1989 से अब तक एक नीति नहीं रख पाई है. मोदी सरकार के दौरान राजनीतिक प्रक्रिया के साथ-साथ सुरक्षा बलों की कारवाई भी साथ साथ चलती रही. अब सरकार गिरने से राजनितिक प्रक्रिया बंद हो गई हैं. रैलियां और चुनाव हैं जो लोगों को मुख्यधारा में जोड़े रखते हैं. इसलिए सरकार को भरोसा है कि आतंक के खिलाफ चल रही सख्त कार्रवाई के बीच पंचायत चुनाव आम कश्मीरी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लाएगा और कश्मीरियों के हिंसा के रास्ते से यह प्रक्रिया दूर ले जाएगी.

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