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OPINION: 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर': अभिव्यक्ति की आज़ादी के नियम व शर्तें लागू

OPINION: 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर': अभिव्यक्ति की आज़ादी के नियम व शर्तें लागू

'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' का पोस्टर

'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' का पोस्टर

हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी को भी पालतू बना दिया है. कई राजनीतिक लोग ही नहीं बल्कि बुद्धिजीवी कलाकार भी इसे ‘मीठा-मीठा गप और कड़वा कड़वा थू की तरह इस्तेमाल करते हैं.’ यानि जब तक अभिव्यक्ति आपकी मंशा के मुताबिक हो तब तक आजादी की बात की जाए और गर ऐसा न हो तो चुप्पी साध लें या पाला बदल लें.

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ज्यादा पीछे न भी जाएं तो हाल ही में रिलीज फिल्म ‘केदारनाथ’ से मंदिर के पुजारियों की भावनाएं आहत हो रही थीं. फिल्म जीरो से सिख भावनाएं आहत हो रही हैं. थोड़ा और पीछे जाए तो पद्मावत से राजपूतों की भावनाएं आहत हो रही थीं. अनुराग कश्यप ने जब ‘उड़ता पंजाब’ बनाई थी तो इस फिल्म को भी पॉलिटिकली मोटिवेटेड बताते हुई कईयों का पेट दुख रहा था.

यानी फिल्मों को लेकर कुछ लोगों का पेटदर्द पुराना है जिसकी कोई दवा नहीं है और भावनाओं के आहत होने का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं होगा. इस तरह का पेटदर्द ‘भगवा ब्रिगेड’ को ज्यादा होता रहा है या फिर यूं कहें की उसकी चर्चा ज्यादा होती हैं. लेकिन इसबार बदहजमी की शिकायत कांग्रेस को हो गई है और विरोध करने वालों के पाले बदले हुए दिखाई दे रहे हैं.

संजय बारु का कहना है कि उन्होंने अपनी किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में जितना जानते थे उसका आधा ही लिखा है. किताब तो काफी पहले ही प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन किताब पर आधारित फिल्म का ट्रेलर जारी होते ही हंगामा मच गया है. कांग्रेस शासित राज्यों में फिल्म का डिब्बा बंद करने की तैयारी हो रही है. कांग्रेसियों  की त्यौरियां चढ़ी हुई है. तीन राज्यों में हाल ही में मिली जीत से कांग्रेस का आत्मविश्वास भी चरम पर हैं और पार्टी के छुटभैये नेता भी फिल्म रिलीज न होने देने का दावा कर रहे हैं. उधर, अनुपम खेर इसे अपने कैरियर की सबसे कठिन फिल्म बताते हुए इसके जरिए ऑस्कर के सपने संजोए हुए हैं.

मजेदार बात ये है कि कल तक ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ के पैरोकार बनने वालों के तेवर तल्ख़ी लिए हुए है और सिनेमाघरों में तोड़फोड़ कर पोस्टर जलाने वाले अभिव्यक्ति की आजादी की बात कर रहे हैं.

दरअसल, हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी को भी पालतू बना दिया है. कई राजनीतिक लोग ही नहीं बल्कि बुद्धिजीवी कलाकार भी इसे ‘मीठा-मीठा गप और कड़वा कड़वा थू की तरह इस्तेमाल करते हैं.’ यानि जब तक अभिव्यक्ति आपकी मंशा के मुताबिक हो तब तक आजादी की बात की जाए और गर ऐसा न हो तो चुप्पी साध लें या पाला बदल लें.

गुजरात दंगों पर केन्द्रित फिल्म परजानियां भी भगवा ब्रिगेड के निशाने पर रही और काफी मशक्कत के बाद इसे रिलीज किया जा सका. बाद में फिल्म ने कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते. मोहल्ला अस्सी को लेकर भी कुछ लोगों को आपत्ति थी कि इसमें धर्म को गलत ढंग से दिखाया गया है.

सेंसर बोर्ड ने जब अनुराग अश्यप की उड़ता पंजाब के पर कतर दिए थे तो आहत अनुराग ने भारत की तुलना तानाशाह राष्ट्र नार्थ कोरिया से कर डाली थी. अनुराग ने ट्वीट कर लिखा था कि- ‘मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि उत्तर कोरिया में रहने पर कैसा महसूस होगा, अब तो प्लेन पकड़ने की भी जरूरत नहीं है.’ जबकि सेंसर बोर्ड फिल्मों में कांट-छांट करने के लिए अधिकृत संस्था है. खैर, अनुराग ने कानूनी लड़ाई लड़ी और चूंकि हमारे देश में ‘तानाशाही’ नहीं है, इसलिए कोर्ट के दखल से फिल्म रिलीज भी हुई. लेकिन कला, लेखन, फिल्म निर्माण में असीमित आजादी के पैरोकार ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के मामले में अब तक चुप है और अवार्ड वापस करने वाले भी खामोश है.

‘द एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर’ कैसी फिल्म है इसमें पूर्व प्रधानमंत्री की छवि को सही ढंग से पेश किया है या नहीं ये विवाद का विषय हो सकता है. विरोध करने वाले फिल्म के खिलाफ अदालत की शरण में जा सकते हैं और शायद जाएंगे भी. लेकिन बुद्धिजीवियों का अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सिलेक्टिव सपोर्ट समझ से परे हैं.

रूपहले पर्दे पर अपराजित मराठा योद्धा बाजीराव पेशवा को नाचते हुए दिखाना अभिव्यक्ति की आजादी है. मेवाड़ी राजपूत जिसे मां मानकर पूजते हैं उसे रोमांस करते दिखाना भी कहानी की मांग हो सकती है. वीरांगना रानी झांसी को अंग्रेज अफसर से प्रेम करते (तथाकथित रूप से विवाद तो इसी को लेकर है) दिखाया जा सकता है. तो फिर मनमोहन सिंह का मौन तो हमेशा से चर्चा का विषय रहा है. इस विषय पर फिल्म बनाने का तार्किक रूप से विरोध कैसे किया जा सकता है.

बाल ठाकरे और एन टी रामाराव की बायोपिक भी जल्द ही रिलीज होने वाली है. हो सकता है कि आने वाले समय में बीजेपी और कांग्रेस या अन्य पार्टियों के वर्तमान राजनेताओं पर भी फिल्में बनें, जिसमें निर्माता उस राजनेता की छवि अपने मर्जी के मुताबिक पॉजीटिव या नेगेटिव गढ़ दे. फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के पैरोकार तर्क के आधार पर इसे कैसे रोक सकेंगे.

किस व्यक्ति की बायोपिक बने और किसकी नहीं इसका फैसला करने का भी कोई पैमाना नहीं हो सकता है. हसीना पारकर की बायोपिक हम पहले ही देख चुके हैं. अब नाथूराम गोड़से, ओसामा बिन लादेन, कर्नल गद्दाफी, दाउद इब्राहिम जैसे लोगों की बायोपिक सामने आए तो भी कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. गैंगस्टर्स को नायक बनाने का चलन तो खैर हमारी इंडस्ट्री में काफी पुराना है ही.

फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का बूमरेंग अब फेंकने वालों की ओर उल्टा भी आने लगा है. अब लिखने और बोलने की आजादी का मजा लेने वालों को चाहिए की ये मजा दूसरों को भी लेने दिया जाए. या फिर अभिव्यक्ति की आजादी की हद सभी के लिए तय की जाए. आप क्या कहते हैं...?

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Tags: Dr. manmohan singh, Rahul Gandhi Coronation, The Accidental Prime Minister

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