OPINION: बंगाल की 292 में से 3 सीटें जीतने वाली BJP कैसे हासिल करेगी 22 का आकंड़ा

बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी के लिए बंगाल में 22 सीटों का लक्ष्‍य रख दिया है. लेकिन जिस तरह के हालात हैं उससे अभी तक तो बीजेपी के लिए रास्‍ता कांटों भरा है.

News18Hindi
Updated: February 12, 2019, 11:16 PM IST
OPINION: बंगाल की 292 में से 3 सीटें जीतने वाली BJP कैसे हासिल करेगी 22 का आकंड़ा
बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह
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Updated: February 12, 2019, 11:16 PM IST
सिबाजी प्रतिम बासु

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक पंडित इस तोलमोल में लगे हुए हैं कि कोलकाता के पुलिस कमिश्‍नर राजीव कुमार की कथित गिरफ्तारी के प्रयास और इसके बाद पुलिस व सीबीआई की झड़प और मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी के धरने से किस पार्टी को फायदा हुआ. 2019 के आम चुनावों से पहले बंगाल में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) एक दूसरे पर काफी हमलावर हैं.

बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी के लिए लोक सभा चुनाव में बंगाल में 22 सीटों का लक्ष्‍य रख दिया है. लेकिन जिस तरह के हालात हैं उससे अभी तक तो बीजेपी के लिए रास्‍ता कांटों भरा है. वैसे 2014 के लोक सभा चुनावों के बाद से बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है. पिछले आम चुनावों में बीजेपी को यहां पर 16.8 प्रतिशत वोट मिले थे जो कि बंगाल में उसका सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन है. लेकिन दो साल बाद यानी 2016 के विधानसभा चुनावों में वोट शेयर घटकर 10.2 प्रतिशत रह गया.



इन चुनावों में कांग्रेस और वामपंथी मोर्चा साथ उतरा था. इसके तहत कांग्रेस को 44 और लेफ्ट को 26 मिली थी. वहीं बीजेपी के खाते में महज तीन सीट आई हालांकि यह उसका विधानसभा में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन था.

क्‍या ऊपर के आंकड़ों से कोई इशारा मिलता है? आसान भाषा में कहें तो कांग्रेस ने राज्‍यों के कुछ हिस्‍सों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्‍तर दिनाजपुर में अच्‍छी पकड़ बनाई है. इसका फायदा उसे मिला और कम वोट शेयर के बावजूद उसे अच्‍छी सीटें मिलीं. यहां तक कि 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस ने 9.58 प्रतिशत वोट शेयर के बावजूद चार सीटें जीती थी. वहीं लेफ्ट 29.71 प्रतिशत वोट लेकर भी केवल दो सांसद हासिल कर सका.

इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि लेफ्ट के पास पूरे राज्‍य में संगठन है फिर भी वह वोटों को सीटों में नहीं बदल पाया. लेकिन 2016 के विधानसभा चुनावों के आधार पर बीजेपी कहां खड़ी है? उसने 291 सीट पर चुनाव लड़ा और 10.2 प्रतिशत वोट के साथ तीन सीटें जीती. उसके पास काफी कमजोर समर्थन/सांगठनिक ढांचा है लेकिन फिर भी वह काफी महत्‍वाकांक्षी है. तो पिछले तीन साल में ऐसा क्‍या हुआ जो वह लोक सभा चुनाव में 22 सीटें जीतने का लक्ष्‍य लेकर उतर रही है? आइए नजर डालते हैं-

बीजेपी को 2018 के पंचायत चुनावों के चलते उम्‍मीद की किरण नजर आई है. सभी विपक्षी दलों ने इन चुनावों को 'लोकतंत्र का मजाक' करार दिया था. ग्राम पंचायत, जिला परिषद और पंचायत समिति की 58962 सीटों में से 20159 पर कोई चुनाव ही नहीं हुआ था. आरोप है कि टीएमसी कार्यकर्ताओं ने विपक्षी नेताओं को चुनाव नहीं लड़ने दिया. लेकिन 31812 ग्राम पंचायतों पर हुए चुनाव में 64.2 फीसदी वोट के साथ तृणमूल कांग्रेस पहले और 17.1 प्रतिशत वोट के साथ बीजेपी दूसरे नंबर पर रही थी. इससे बीजेपी को निसंदेह बूस्‍ट मिला क्‍योंकि एक तो, उसने कांग्रेस और लेफ्ट को पीछे छोड़ा और दूसरा, उसने ताकतवर टीएमसी के सामने लड़ने का जज्‍बा दिखाया. इसके चलते उसकी उम्‍मीदें जगीं.
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यदि हम त्रिकोणीय मुकाबले(टीएमसी, लेफ्ट+कांग्रेस और बीजेपी) में बीजेपी के वोट शेयर को देखते हैं तो सामने आता है कि 2016 की तुलना में उसके वोट शेयर में सात प्रतिशत का इजाफा हुआ जो कि काफी प्रभावशाली है. लेकिन यह अतिरिक्‍त सात प्रतिशत वोट आए कहां से? कुछ हद तक नाराज टीएमसी समर्थकों के एक वर्ग के वोट बीजेपी को मिले लेकिन ज्‍यादातर वोट लेफ्ट के समर्थकों के थे.
लेफ्ट समर्थकों को टीएमसी के बढ़ते प्रभाव के चलते काफी कठिनाइयों को सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में बीजेपी ने उन्‍हें 'सुरक्षा' का भरोसा दिलाया. ऐसे में ग्रामीण बंगाल में 'बाम' के समर्थक 'राम' के समर्थक बन गए. लेकिन यहीं पर पार्टी के लिए थोड़ी बुरी खबर है.


साफ-साफ कहा जाए तो बंगाल में बीजेपी की कामयाबी नरेंद्र मोदी की 2014 की जबरदस्‍त जीत से ही जुड़ी हुई है. उस चुनाव में उसका वोट शेयर 5-6 प्रतिशत से बढ़कर 16.8 प्रतिशत हो गया था. इसके चलते पार्टी की राज्‍य इकाई में माहौल बन गया जिससे वे खुद को 2016 के विधानसभा चुनाव में जीत का दावेदार मानने लगे.
इसी समय में केंद्रीय नेतृत्व ने भी बंगाल में भगवा दल के प्रसार का मौका देखा. ऐसे में केंद्रीय नेतृत्‍व ने पूरी ताकत से राज्‍य इकाई को मजबूत बनाने का फैसला किया. इसके लिए दोतरफा नीति बनाई गई. पहले, राज्‍य इकाई और इसके कार्यक्रमों को पूरी तरह से प्रशिक्षित आलाकमान के जरिए नियंत्रित किया और दूसरा, सीबीआई, ईडी जैसी केंद्रीय इकाइयों को सारधा व रोज वैली जैसे घोटाले की जांच में लगाकर ममता बनर्जी पर दबाव बनाया. इन दोनों मामलों में तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं के शामिल होने का आरोप है.

सीबीआई ने अपना काम 2014 में शुरू किया और जल्‍द ही परिवहन मंत्री मदन मित्रा को सलाखों के पीछे डाल दिया. इसके बाद वह टीएमसी के नंबर दो नेता मुकुल रॉय पर शिकंजा कसने ही वाली थी. वे अब बीजेपी में शामिल हो गए थे. इन घटनाओं से खुश होकर राज्‍य के बीजेपी ऑब्‍जर्वर सिद्धार्थ नाथ सिंह ने 23 दिसंबर 2014 को कोलकाता में एक मीटिंग के दौरान गरजते हुए कहा था, 2014 में 'भाग मदन भाग' था, 2015 में यह 'भाग मुकुल भाग' होगा और 2016 में 'भाग ममता भाग' हो जाएगा. लेकिन 2016 में लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन मुख्‍य विपक्षी दल के रूप में उभरा और बीजेपी की संभावनाओं पर पानी फेर दिया.

जब सिद्धार्थ नाथ सिंह उत्‍तर प्रदेश में मंत्री बन गए तो उनकी जगह मध्‍य प्रदेश के दिग्‍गज नेता कैलाश विजयवर्गीय आए. उनके समय में दिलीप घोष को राज्‍य अध्‍यक्ष बनाया गया. इसके बाद बीजेपी ने हिंदुत्‍व पॉलिटिक्‍स के रूप में तीसरा मोर्चा खोला.
इसके चलते रामनवमी पर तलवारों के साथ झांकियां निकाली गई, दूरदराज के इलाकों में हनुमान मूर्ति लगाई गई. इन सबने राज्‍य में धार्मिक आधार पर बंटवारा और चौड़ा हो गया. राज्‍य में इस दौरान कई दंगे भी हुए. पार्टी ने ममता पर मुस्लिमों के तुष्‍टीकरण और हिंदुओं की उपेक्षा का आरोप लगाया. असम की तरह ही बंगाल से भी घुसपैठियों को भगाने और हिंदुओं व मुस्लिमों के अलावा दूसरे अल्‍पसंख्‍यकों को शरण देने की नीति लागू करने का ऐलान किया गया.

इस तिहरे हमले से कुछ इलाकों में बीजेपी के वोट बढ़ सकते हैं. जैसे कि दक्षिण-पश्चिमी जिलों झारग्राम व पुरुलिया और सीमावर्ती जिलों नदिया, मालदा और कूच बिहार में पार्टी वोट बटोर सकती है. इन क्षेत्रों में उसे 2-3 सीटें मिल सकती है और कई सीटों पर वह दूसरे नंबर पर आ सकती है. लेकिन क्‍या वह गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बिना दार्जिलिंग सीट बचा पाएगी? गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का नेतृत्‍व अब ममता समर्थक बिनय तमांग कर रहे हैं. क्‍या वह साम्‍प्रदायिक दंगों के बावजूद केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो की सीट आसनसोल को बचा पाएगी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब बीजेपी को लोक सभा चुनाव से पहले ढूंढना होगा. बंगाल में चुनावी सफलता के लिए जमीनी स्‍तर पर मजबूत संगठन की जरूरत होती है.

(लेखक विद्यासागर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं और पश्चिम बंगाल की राजनीति के मशहूर जानकार हैं)

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