Opinion: कोरोना संकट के समय दरकता संघीय ढांचा, कई राज्यों में केंद्र विशेष शक्तियों के द्वारा सीधे दखल दे!

Opinion: कोरोना संकट के समय दरकता संघीय ढांचा, कई राज्यों में केंद्र विशेष शक्तियों के द्वारा सीधे दखल दे!
शुरू में लापरवाही दिखाने वाले देश आज कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.

देश की शासन व्यवस्था और इसके तमाम घटकों को यह समझना होगा कि 1.3 अरब की आबादी वाले इस देश को संभावित खतरों से बचने के लिए विशेष प्रावधानों का इस्तेमाल करना ही होगा. देश इस स्थिति में नहीं हैं की वह इस समय कुछ गलतियों को झेल पाए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 11, 2020, 9:23 PM IST
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(रामानंद नंद)

नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus) से संक्रमितों की संख्या संपूर्ण विश्व में लगातार बढती ही जा रही है. विश्व का शायद ही कोई देश हो जो इस महामारी की प्रकोप से बचा हो. तमाम अनुमानों के बावजूद इससे लड़ने में सभी देशों की अक्षमता लगातार सामने आ रही हैं. शुरू में लापरवाही दिखाने वाले देश आज इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. अमेरिका, यूके आदि जिन देशों ने प्रारंभ में इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई वह अब इस संकट से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं. कोरोना से बचने का जो सबसे बड़ा उपाय जो सामने आया है वह है इससे बचाव के तरीकों का सख्ती से पालन. इसमें भीड़ से दूरी, मास्क का उपयोग, हाथ की लगातार सफाई आदि. बचाव के तरीकों पर प्रारम्भ में कुछ असहमति थी मगर हाल के अनुभवों से इसमें सहमति होती दिख रही हैं.

लोकतांत्रिक देशों ने असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग किया
इस संकट से लड़ने के लिए दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों ने असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग किए हैं. इजरायल और यूके जैसे देशों ने भी इस महामारी से का उत्तर देने के लिए अपने यहां केंद्रीकृत व शक्तिशाली शासन हेतु न्यायिक शक्तियों को सीमित किया है. फिलिपिन्स, थाईलैंड आदि देशों ने भी अपनी सरकारों को इस महामारी से निपटने के लिए अत्यधिक शक्तियां प्रदान की हैं. इसके अलावा कई देशों ने लोगों की गतिविधियों को सीमित करने और महामारी के संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए सेना की सहायता ली हैं.
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इस संकट से लड़ने के लिए दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों ने असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग किए हैं. (फाइल फोटो)




भारत जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं और जो शासन में संघीय व्यवस्था को अपनाएं हुए हैं, इसने शुरूआती दौर में बचाव के आक्रामक तरीके अपनाएं मगर संघीय व्यवस्था होने के नाते एक सामान तरीके से नियमों का पालन सभी राज्यों में नहीं हो पाने के नाते अभी सक्रमितों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही हैं.

ताकतवर और आर्थिक संपन्न देशों के पास भी उपाय नहीं
चीन से शुरू हुई यह महामारी अब इटली, स्पेन, यूके, अमेरिका और ईरान आदि देशों में हजारों लोगों की जान ले चुकी हैं. दुनिया के सबसे ताकतवर और आर्थिक संपन्न देशों के पास भी इस संकट से बचने का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा हैं. दुनिया के तमाम देश जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में दूसरे देशों पर हद से ज्यादा निर्भर थे वह आज अपने को असहाय पा रहे हैं, ज्यादातर देशों में या तो आपात काल जैसे नियम लागू कर दिए गए हैं या लागू करने की तैयारी हो रही हैं.

भारत उन प्रारम्भिक देशों में से हैं जिन्होंने शुरुआती दौर में कठोर कदम उठा लिए थे, मगर राज्य सरकारों की लापरवाही और राज्य केंद्र में कुछ विषयों पर पर्याप्त सहमति और एकमत नहीं होने के कारण यह संख्या बढती जा रही हैं. सबसे पहली लापरवाही लॉकडाउन के तुरंत बाद सामने आई जब तमाम राज्यों ने प्रवासी कामगारों के पलायन के सम्बन्ध में उदासीनता का परिचय दिया. कुछ राज्यों ने बाद में इसे काबू किया मगर अधिकतर राज्य इस समस्या को राजनीतिक दृष्टि से देखने में ज्यादा मशगूल दिखाई दिए. दिल्ली जो देश की राजधानी हैं वहां लापरवाही और समन्वय का अभाव साफ दिखाई दिया.

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दिल्ली जो देश की राजधानी हैं वहां लापरवाही और समन्वय का अभाव साफ दिखाई दिया.


भारत में भी परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं
एक देश के रूप में हमें यह समझना होगा की यह परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं. अतः इसके लिए प्रावधान भी सामान्य नहीं होंगे. निर्णयों को लेने के लिए केंद्रीकृत संस्था की नितांत आवश्यकता हो रही हैं मगर राज्य सरकारों का रवैया और उनके पार्टी को सर्वोपरि मनाकर किये जाने वाले फैसले सम्मिलित लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं.

यद्यपि राजस्थान, ओड़िसा, असम, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्णाटक, तेलंगाना के प्रयास सराहनीय हैं मगर अन्य राज्यों से उस प्रकार के परिणाम और गतिशीलता नहीं मिल रही हैं जिसकी अपेक्षा हैं. इस महामारी से बचाव से बचने में गति का बड़ा महत्व हैं क्योंकि संक्रमित मरीज के से संपर्क में आये व्यक्तियों की पहचान और उनको एकांत में भेजने की प्रक्रिया में जितनी गति होगी. इस महामारी का प्रभाव उतना ही कम होगा.

आरोप-प्रत्यारोप लगातार लगायें जा रहे हैं यह आरोप कभी प. बंगाल से तो कभी छत्तीसगढ़ से तो कभी महाराष्ट्र से लगातार लगाये जा रहे हैं. इन आरोपों का मकसद इस संकट कला में राजनीतिक लाभ लेना या अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करना हैं यह राजनीतिक परिदृश्य व्यवस्था में लगे लोगों और स्वास्थ्यकर्मियों का ह्रदय तोड़ने वाला हैं.

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एक बात जो इस पूरे लड़ाई में और निकल कर आई हैं वह हमारे नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था की जीवंतता


नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था की जीवंतता
एक बात जो इस पूरे लड़ाई में और निकल कर आई हैं वह हमारे नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था की जीवंतता, खासकर जिला और तहसील स्तर के अधिकारियों की कार्यदक्षता. नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था ने न केवल अदम्य साहस का परिचय दिया है अपितु संकट की इस घडी में हर वह कदम उठाया जो आम जनमानस के जीवन में सुगमता और सुरक्षा के लिए हितकर था.

राज्य सरकारें कई मौकों पर केंद्र के साथ कदम ताल में बिठाने में विफल रही हैं अतः अब कई वर्गों से यह आवाज उठ रही हैं की कई राज्यों में केंद्र विशेष शक्तियों के द्वारा सीधे दखल दे. मगर मोदी सरकार इस प्रकार के फैसले अभी तक नहीं ले पाई हैं और इसमें भी संदेह हैं की वह किसी भी आकस्मिक प्रावधान का इस्तेमाल करेगी. इस दौर में केंद्र से राज्य के मध्य संवाद की भाषा एक होनी चाहिए, संवाद के स्तर पर थोड़े से अंतर से लड़ाई का स्वरूप बदल सकता हैं.

इन आकस्मिक परिस्थितियों में केंद्रीय सरकार से अपेक्षा है कि वह राजनीतिक संतुलन से आगे बढ़कर, भारत के हित को सुरक्षित करे. भाजपा सरकार जिसका मौजूदा नेतृत्व स्वयं कांग्रेस के आपात काल के विरुद्ध संघर्ष से निकल कर आया है और जिसका पूरा राजनीतिक विमर्श संवैधानिक आदर्शों के आस-पास घूमता हैं वह संवैधानिक दुविधा से आगे निकलकर जल्द ही इस दिशा में कोई निर्णय करें ऐसी अपेक्षा हैं.

आगामी सदी की दशा और दिशा के बारे में निर्णय करना है
आज का समय किस युद्ध से कम नहीं हैं आज भारत उस पड़ाव पर हैं जिसमें उसे अपने आगामी सदी की दशा और दिशा के बारे में निर्णय करना हैं. किसी भी प्रकार की राजनीतिक दुविधा को भारत के भविष्य के निर्माण में आड़े नहीं आना चाहिये. हमारे पास जो भी विकल्प हैं चाहे वह सेना का प्रयोग हो या आकस्मिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए सत्ता का केंद्रीकृत स्वरूप. इस समय सभी का प्रयोग में होना चाहिए क्योंकि इस महामारी के बाद के विश्व की संरचना और इसका क्रम इस महामारी से देशों के लड़ने की क्षमता और उनके बचने की क्षमता से निर्धारित होगा.

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इस देश को संभावित खतरों से बचने के लिए विशेष प्रावधानों का इस्तेमाल करना ही होगा.


देश की शासन व्यवस्था और इसके तमाम घटकों को यह समझना होगा की 1.3 अरब की आबादी वाले इस देश को संभावित खतरों से बचने के लिए विशेष प्रावधानों का इस्तेमाल करना ही होगा. देश इस स्थिति में नहीं हैं की वह इस समय कुछ गलतियों को झेल पायें. विश्व के अन्य देशों का उदाहरण हमारे सामने हैं जिन देशों ने प्रारंभ में कठोर कदम नहीं उठाये वह देश इस बीमारी की विभीषिका का सामना कर रहे हैं.

भारत में शासन प्रणाली कई मामलों में अलग
भारत का जनसंख्या घनत्व और इसकी शासन प्रणाली कई मामलों में अलग हैं अतः यदि भारत एक भी हिस्सा इस बीमारी की चपेट में आया तो अन्य राज्यों के चपेट में आने की संभावना अपने आप बढ़ जायेगी इसके लिए आवश्यक हैं की भारत सरकार अपने नैतिक दुविधा से आगे निकलते हुए आकस्मिक प्रावधानों का इस्तेमाल करें. इसमें ही संपूर्ण राष्ट्र का हित हैं. संघीय ढांचा एक अच्छी व्यवस्था हैं मगर संकट के समय परीक्षण करना बुद्धिमत्ता नहीं हैं. केन्द्र सरकार को चाहिए की वह देश के नागरिकों की रक्षा और भारत के भविष्य के रक्षण हेतु हर वह कदम उठाने को तत्पर रहे चाहे उसके राजनीतिक निहितार्थ कुछ भी हो.

(लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस के निदेशक हैं. ये इनके निजी विचार हैं)

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