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  • THE DISADVANTAGED SECTIONS WILL HAVE TO BEAR THE LOSS DUE TO THE DIGITAL GAP SAYS SUPREME COURT

केंद्र ने कहा- कोर्ट नीतियों में दखल नहीं दे सकता, SC की दो टूक- अधिकारों पर खतरा हो तो खामोश नहीं रहेंगे

सुप्रीम कोर्ट में कोरोना रोधी टीकाकरण पर सुनवाई हुई.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि क्या उसने को-विन वेबसाइट की पहुंच और आरोग्य सेतु जैसे ऐप का ऑडिट किया है कि दिव्यांग लोगों की कैसे उन तक पहुंच हो.

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    नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कोरोना वायरस महामारी (Covid-19 Pandemic) के समय दवा, इलाज, ऑक्सीजन और वैक्सीनेशन को लेकर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. सरकार ने इस दौरान कोर्ट के अधिकारों पर सवाल उठाया. केंद्र ने कहा कि कोर्ट सरकारी नीतियों में दखल नहीं दे सकता. इसपर अदालत ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि जब लोगों के अधिकारों पर हमला हो, तो वह खामोश नहीं रह सकता.

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'संविधान ने हमें जो भूमिका सौंपी है, हम उसका पालन कर रहे हैं. संविधान के मुताबिक, जब कार्यपालिका लोगों के अधिकारों का उल्लंघन करे, तो न्यायपालिका मूकदर्शक न रहे.'

    शीर्ष अदालत ने कहा है कि 18 से 44 साल के उम्र के लोगों के लिए डिजिटल पोर्टल ‘को-विन’ (Co-win) पर पूरी तरह आश्रित टीकाकरण नीति (Vaccination Policy) 'डिजिटल खाई' के कारण सार्वभौमिक टीकाकरण के अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएगी. इससे समाज के वंचित वर्ग को 'पहुंच में अवरोध' का नुकसान झेलना होगा.

    शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह की नीति समानता के मौलिक अधिकार और 18 से 44 वर्ष के उम्र समूह के लोगों के स्वास्थ्य के अधिकार पर गंभीर असर डालेगी. शीर्ष अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि डिजिटल रूप से शिक्षित लोगों को भी को-विन पोर्टल के जरिए टीकाकरण स्लॉट पाने में मुश्किलें आ रही हैं.

    कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि क्या उसने को-विन वेबसाइट की पहुंच और आरोग्य सेतु जैसे ऐप का ऑडिट किया है कि दिव्यांग लोगों की कैसे उन तक पहुंच हो. न्यायालय ने कहा कि उसके संज्ञान में आया है कि को-विन प्लेटफॉर्म तक दृष्टिबाधित लोगों की पहुंच नहीं है और वेबसाइट तक पहुंच में कई अवरोधक हैं.

    जज ने दिया सर्वेक्षण का हवाला
    जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली विशेष बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा 2019-20 के लिए कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) की वार्षिक रिपोर्ट और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की एक रिपोर्ट तथा राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण 'घरेलू सामाजिक उपभोग : शिक्षा’ का भी हवाला दिया.

    बेंच ने कहा, 'उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत में खासकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल खाई है. डिजिटल साक्षरता और डिजिटल पहुंच में सुधार की दिशा में जो प्रगति हुई है, वह देश की बहुसंख्यक आबादी तक नहीं पहुंच पाई है. बैंडविड्थ और कनेक्टिविटी की उपलब्धता डिजिटल पहुंच के लिए और चुनौतियां पेश करते हैं.'

    बेंच में जस्टिस एल एन राव और जस्टिस एस आर भट भी थे. बेंच ने कोविड-19 महामारी के दौरान आवश्यक सेवाओं और आपूर्ति के स्वत: संज्ञान लिए गए मामले पर 31 मई के आदेश में यह टिप्पणी की थी. आदेश को बुधवार को शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया.

    बेंच ने कहा, 'इस देश की महत्वपूर्ण आबादी 18-44 साल के उम्र के लोगों के टीकाकरण के लिए पूरी तरह डिजिटल पोर्टल पर आधारित टीकाकरण नीति ऐसी डिजिटल खाई के कारण सार्वभौमिक टीकाकरण के लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पएगी. पहुंच में अवरोध का सबसे नुकसान समाज के वंचित तबके को उठाना पड़ेगा.' बेंच ने कोविड-19 टीका हासिल करने में समाज के वंचित सदस्यों की क्षमता संबंधी चुनौतियों को रेखांकित करते हुए 30 अप्रैल के आदेश में यह टिप्पणी की थी.