Hindi Diwas 2020: देश की शिक्षा नीति ने की हिंदी की दुर्गति

Hindi Diwas 2020: देश की शिक्षा नीति ने की हिंदी की दुर्गति
अंग्रेजी भाषा में ऐसे कई शब्द हैं जो कि हिंदी से लिए गए हैं.

शिक्षा-जगत में ऐसी राहजनी हुई कि अंग्रेजी के वर्चस्व के आगे निरीह आदमी हारने लगा. यह बात दिमाग में बैठ गई कि बिना अंग्रेज़ी पढ़े कुछ नहीं मिलने वाला. दूसरी भाषा यानी विदेशी भाषा द्वारा किया जाने वाला इससे ज्यादा अन्याय दुनिया की किसी भाषा के साथ नहीं हुआ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 14, 2020, 11:36 PM IST
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  • कृष्ण बिहारी


1947 से पहले या यूं कहें कि 1900 से लेकर 1947 तक जो हिन्दी भारतेंदु युग में विकसित हुई, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तराशा, जिसमें महात्मा गांधी ने देश को संबोधित किया, बंगाल रहा हो या दक्षिण भारत, हिन्दी में ही जनांदोलन हुए. गांधी और सुभाष ने कई बार कहा कि हिन्दी ही वह भाषा है जिसमें इस देश की भाषा बनने की पूरी संभावनाएं हैं और इसे हमने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन तक सही पाया भी लेकिन 47 से 73 के बीच न जाने कितना मवाद भाषायी विवाद में बहा, जिसने हिन्दी के प्रति ज़हर का समंदर उगल दिया. एक ओर हिन्दी वाचिक स्थिति में पसरती गई तो दूसरी ओर लिखित रूप में बिसरती गई. नेताओं ने जान लिया कि हिन्दी को बस उस समुदाय की भाषा के रूप में जीवित रखो जो उनकी चाकरी करते हुए मरें, मगर उनके वोट बैंक बने रहें. शिक्षा-जगत में ऐसी राहजनी हुई कि अंग्रेजी के वर्चस्व के आगे निरीह आदमी हारने लगा. यह बात दिमाग में बैठ गई कि बिना अंग्रेज़ी पढ़े कुछ नहीं मिलने वाला. दूसरी भाषा यानी विदेशी भाषा द्वारा किया जाने वाला इससे ज्यादा अन्याय दुनिया की किसी भाषा के साथ नहीं हुआ. कुकुरमुत्ते की तरह अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल खुले जिन पर नवधनिकों का कब्ज़ा होता गया. विधायक,  सांसद, मंत्रियों के स्कूलों की चेन खुलती चली गई. विद्यालयों में हिन्दी को अछूत और कुष्ठरोगी की हैसियत मिली. हिन्दी परीक्षा से पहले वन नाइट स्टैंड का वह पात्र हुई जिसे परीक्षा के तुरंत बाद तीन तलाक़ दिया जाने लगा.
अब प्रश्न है कि यदि क्षेत्रीय बोलियां आठवीं सूची में आईं तो हिन्दी की भूमिका क्या सौतन की नहीं हो जाएगी? दशा सौतन की तो तब होती जब पति से प्यार, सुरक्षा और सम्मान मिला होता. यहां तो हालत ही परित्यक्ता की है तो सौतन वाली बात या स्थिति नदारद है. निज भाषा उन्नति अहै, की बात तो पिछली सदी के आठवें दशक से ही राम नाम सत्य हो गई. पिछली सरकारों ने शिक्षा-नीति को अकर्मण्य और देश-विरोधी लोगों के हाथों में इस तरह थमा दिया जैसे वह टूटा हुआ खिलौना हो, जिसे और तोड़ने में आनंद मिलता है. अब सरकार के स्तर पर या जन-आंदोलन के ज़रिए कुछ भी नहीं होने वाला. जब किसी देश के नागरिक का राष्ट्रीय चरित्र मर जाता है तब उस देश की केवल दुर्दशा होती है.

हम एक मरती हुई भाषा के देश के उन नागरिकों में शामिल हो गए जिनके सामने भाषा एक कंकाल के रूप में अपने अंत की ओर जाती दिखती रही और हम आत्मविस्मृति कहें, मानसिक गुलामी कहें या आवश्यकता की मार से पीड़ित, अंग्रेज़ी के अजगर के मुंह में उसका ग्रास बनते गए. धीरे-धीरे हिन्दी बाज़ार की ज़रूरत तो बनी लेकिन वह केवल व्यवसाय का प्रचार-प्रसार और उसके हित साधन का टूल बनती गई. रोज़गार के लिए अंग्रेज़ी वास्तविकता बनती गई और फिर यहीं से शुरू हुआ हिन्दी के नाम पर मुंह बिचकाने का सिलसिला- हमारे बच्चे को हिन्दी नहीं आती. यह कहने में गर्व का अनुभव करने वाले और कोई नहीं, हम भारतीय ही थे. हिन्दी के मामले में अब इद्दत की मुद्दत भी ख़त्म हो गई है. अब तो यह दया की पात्र भी नहीं रही. उपहास की निर्जीव सामग्री हो गई है.



अपनी बोली-भाषा के प्रति थोड़ा-बहुत लगाव बंगालियों, मलयालियों, तमिलों और पंजाबियों में बचा है, वह भी अब अंग्रेज़ी के नशे की पिनक में आने लगे हैं. मृत्यु का उत्सव मनते हुए देखना या जन्नत की हक़ीक़त बयान करने के लिए अब अपना मरना ज़रूरी नहीं क्योंकि मौत तो उसकी होती है जो जिंदा रहा हो. हम तो हिन्दी की लाश लिए सबसे आगे खड़े हैं इस होड़ के साथ कि हमसे आगे कोई न निकल जाए.
जिस चंद्रकांता संतति को पढ़ने के लिए करोड़ों लोगों ने हिन्दी सीखी, वही हिन्दी अब हिन्दी भाषी परिवारों से छड़ी मारकर दुर दुराई जा रही है और हम उसके निर्वासन को अपने मूर्खतापूर्ण ठहाकों में भूले पड़े हुए मगन हो रहे हैं.

एक-एक कर हिन्दी की बड़ी और व्यावसायिक पत्रिकाएं बन्द होती गईं. बड़े घरानों ने हिन्दी में व्यापार तो सौ गुना बढ़ाया लेकिन उसी अनुपात में भाषा को बर्बाद भी किया. यहां ठंडा माने कोकाकोला होता गया और शरबत और मट्ठा छूटता गया. अब यह सब आयुर्वेद की औषधि के तरह हैं जिसके बारे में बात करते हुए हम कहते हैं कि इनसे लाभ तो है मगर ...यह जो ' मगर' है, अब असली मगर है जिसने हिन्दी भाषा को लगभग निगल लिया है. आदमी को मगर के मुंह में जाते हुए देख शायद हमें कुछ पीड़ा हो तो हो भी सकती है किंतु वहीं हमारे ही परिवार का कोई सदस्य उसके कान और मुंह के पास माइक सटाते हुए पूछता दिखेगा कि मगर के पेट में जाते हुए आपको कैसा लग रहा है?

जिस देश में चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, रिश्वत, शराब, पैसा, औरत सब साधन माने जाते हों वहां अब अगर बोलियों को भी मुद्दा बना लिया जाए तो क्या आश्चर्य! भाषा को आधार बनाकर भोजपुरी को आठवीं सूची में स्थान दिए जाने की बात और मांग काफी दिनों से हो रही है. पूर्वांचल को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने की भी मांग की जा रही है. यह मांग अगर पूरी हुई तो झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड की तरह ही पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भी जाट लैंड जैसी मांग उठ सकती है. ऐसी मांगों से देश का कितना भला हुआ वह तो आपदा को अवसर में बदलने वाले नेता ही जानते होंगे लेकिन जनता ने तो यही जाना कि हिन्दी की दुर्गति और हो गई. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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